The Mysterious Bell – Chapter 667
"सुन रही हूँ।"
"कौन है?"
"जो आदमी चलकर आता है और नाम नहीं बोलता," घंटी ने कहा, "वो अपना नाम छोड़ता नहीं। वो अपने जूतों के निशान छोड़ता है।"
"तो मैं शटर के पास जाऊँ?"
"जा," घंटी ने कहा। "पर हाथ में कुछ लेकर जा। और जब जाए, तो पीछे मत देख। पीछे देखने से आदमी कमज़ोर दिखता है।"
मैंने ट्रंक के ऊपर से लोहे की मोटी रिंच उठाई। हाथ में उसका वज़न आया, तो छाती थोड़ी ठंडी हुई।
"तुम तीनों यहीं रहो," मैंने पापा और मीरा से कहा। "टिंकू, मेरे पीछे।"
"मैं आगे चलूँगा," टिंकू ने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि मैं छोटा हूँ। मुझे शटर के नीचे से झाँकने में कम झुकना पड़ेगा।"
मैं हँसा नहीं। मेरा मन कर रहा था हँसने का, पर गला सूखा था। मैंने उसके सिर पर हाथ रखा और खुद आगे बढ़ा।
शटर के पास पहुँचकर मैंने उसे थोड़ा और ऊपर धकेला। लोहा चरचराया। बाहर की हवा आई — ठंडी, नम, और उसमें एक गंध थी। मिट्टी के तेल जैसी हल्की गंध।
बाहर कोई नहीं था।
सिर्फ़ धूल में लकड़ी के जूतों के निशान थे। और वो निशान सीधे गली के मोड़ की तरफ़ नहीं गए थे। वो घूमकर, पीपल को छोड़कर, हमारे घर की पिछली गली की तरफ़ गए थे। जिधर चूल्हे के पीछे वाला बंद दरवाज़ा खुलता है।
मेरे पीछे टिंकू ने धीरे से कहा, "भैया, सानिया कह रही है कि उसने मोड़ पर एक परछाईं देखी थी। पर वो रुकी नहीं, चलती रही।"
"कब?"
"तभी। जब आवाज़ आई।"
मैंने रिंच नीचे की और बाहर झाँका। गली सुनसान थी। पीपल का पत्ता भी नहीं हिल रहा था। इतनी चुप्पी थी कि दूर किसी ट्रक का हॉर्न भी दबा हुआ, रुई में लिपटा हुआ लगा।
घंटी ने जेब में हिलकर कहा, "अब अंदर।"
"पहले ये बताओ कि वो गया कहाँ?"
"वो जहाँ गया, वहाँ तू अभी नहीं जा सकता," घंटी ने कहा। "पहले वो सुन ले जो ट्रंक बोलने वाला है। देर करेगा, तो वो और बोलेगी। जल्दी करेगा, तो बात छोटी रहेगी।"
"तुमने कहा था कि आज ट्रंक बोलेगा।"
"हाँ। और उसके बोलने से पहले तेरे हाथ में जो है, वो मुझे दे।"
"क्या?"
"रिंच नहीं," घंटी ने कहा। "गले में जो पहने है, वो।"
मेरा हाथ अपने आप गले पर गया। पुरानी चाबी। धागे में पिरोई, छोटी, पीतल जैसी, जिसकी चमक बरसों पहले खत्म हो चुकी थी। पापा ने यह चाबी मुझे पंद्रह-सोलह साल की उम्र में दी थी और कहा था कि यह किसी चीज़ की है, और जब वक़्त आएगा, खुद पता चल जाएगा। मैंने उस दिन पूछा था, "किसकी चाबी है?" और वो मुस्कुराकर बोले थे, "जो अब तक खुला नहीं, उसकी।"
मैं अंदर लौटा।
पापा वहीं खड़े थे। उनका चेहरा पीला पड़ गया था और उनकी उँगलियाँ कमीज़ के पल्ले को पकड़े हुई थीं, जैसे कोई बच्चा रास्ता भूल जाने पर अपनी माँ का पल्लू पकड़ता है।
"पापा," मैंने कहा, "ये चाबी किसकी है?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर ट्रंक की तरफ़ देखा। फिर अपने जूतों की तरफ़।
"मैंने ये तुझे इसलिए दी थी," उन्होंने धीरे से कहा, "कि मैं इसे अपने पास नहीं रख सकता था। और फेंक भी नहीं सकता था।"
"क्यों?"
"क्योंकि ये ट्रंक की है।"
कमरा एक पल के लिए रुक गया। मीरा ने कैमरा थोड़ा नीचे किया और मेरी तरफ़ देखा। टिंकू ने दरवाज़े से गर्दन घुमाई।
"मतलब," मैंने कहा, "ये ट्रंक मैं खोल सकता हूँ?"
"तू खोल सकता है," पापा ने कहा। "पर मैं नहीं कहूँगा कि तू खोल।"
"यही तो फ़र्क़ है, पापा," मैंने कहा। "आप खोलने से रोक रहे हैं, और ये चाबी मेरे गले में पंद्रह साल से लटकी है।"
उन्होंने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, फिर बंद कर दिया।
मैंने धागा उतारा। चाबी मेरी हथेली पर गिरी और उसका ठंडा धातु मेरी हथेली की गरमी से पहले चौंका, फिर बैठ गया।
ट्रंक के ताले में चाबी फिट हुई। पूरी। तीन चौथाई नहीं — पूरी। जैसे बरसों से इसका इंतज़ार कर रहा हो।
मैंने घुमाया।
क्लिक।
आवाज़ बहुत छोटी थी, पर कमरे में सबने सुनी। ट्रंक के नीचे की धड़कन एक पल के लिए तेज़ हुई, फिर बंद हो गई। जैसे किसी ने साँस रोक ली हो।
मैंने ढक्कन उठाया।
पहले मुझे लोहे की गंध आई — पुरानी, नम, गीली ज़ंग जैसी। फिर नैफ्थलीन की। फिर… फिर जला हुआ काग़ज़। वही गंध जो आज शाम हवा में तैर रही थी। वही, बस गाढ़ी।
ट्रंक के अंदर पापा की जवानी बंद थी।
एक फटी चमड़े की पेटी। दो पुरानी रिंचें, जिनके दाँते घिसे हुए थे। लकड़ी के हत्थे वाला एक हथौड़ा, जिस पर किसी ने टेप लपेट रखा था। एक टिन का डिब्बा, जिसमें कीलें और पेंच मिले-जुले पड़े थे। एक ऐनक, जिसका एक काँच फूटा था। और एक मैला सफ़ेद कपड़ा, जिसमें कुछ लिपटा था।
"वो मत खोल," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ तेज़ थी, फटी हुई।
मैंने हाथ रोक दिया।
"पहले नीचे देखता हूँ," मैंने कहा।
और फिर मैंने पेटी उठाई।
नीचे काग़ज़ था।
पर काग़ज़ नहीं था। काग़ज़ की राख थी — काली, भूरी, ठोस, दबी हुई। इतनी मोटी कि उसने ट्रंक के तले का पूरा आकार ले लिया था। जैसे किसी ने बहुत सारे काग़ज़ जलाए हों, और उनकी राख को जान-बूझकर इकट्ठा करके यहाँ बिछा दिया हो।
मैंने उसे छुआ। उँगली काली हुई।
"ये वही है," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो उसमें तभी आती है जब वो कुछ पकड़ लेती है। "ये वही राख है, अंकुश। दीवार वाली।"
"हो सकती है किसी और चीज़ की हो," मैंने कहा। पर मैं जानता था। वो गंध वही थी।
"पापा," मैंने कहा। "इस ट्रंक में राख कैसे आई?"
वो चुप रहे।
"पापा," मैंने फिर कहा। "मैं दस बार पूछ सकता हूँ, पर आप तीसरी बार में बोल देंगे तो मेरा गुस्सा कम रहेगा।"
वो ट्रंक के पास आए। उन्होंने घुटना टेका। बत्तीस साल का आदमी नहीं, एक थका हुआ बूढ़ा आदमी मेरे सामने ट्रंक के पास बैठ गया। उन्होंने राख को छुआ — मेरी तरह नहीं, धीरे से, जैसे किसी के चेहरे पर हाथ रखते हों।
"बाईस साल पहले," उन्होंने कहा।
मैं चुप हो गया।
"तेरी माँ बीमार थी। बहुत बीमार। तू दो साल का था। काजल पैदा नहीं हुई थी। डॉक्टर इसरानी ने उस वक़्त पूरी इमारत नहीं बनाई थी, बस दो कमरे थे। दवा के पैसे नहीं थे। हकीम साहब बाज़ार के सबसे पुराने आदमी थे, माँ-बाप जैसे। मैं उनके पास गया। रात में।"
उन्होंने साँस ली। उनकी साँस में सीटी बज रही थी, जैसे पुरानी केतली।
"मैं उनके घर की तरफ़ से जा रहा था, पर उनका दरवाज़ा बंद था। तब किसी ने कहा कि वो अस्पताल के पीछे हैं। मैं अस्पताल के पीछे गया।"
"और?"
"और वहाँ पीछे के फाटक के पास, बोरी के नीचे जो प्लॉट है न…"
"हाँ।"
"वहाँ आग जल रही थी।" उन्होंने कहा। "बड़ी नहीं। एक लोहे के बक्से जितनी। तीन आदमी थे। एक के हाथ में काग़ज़ों का बंडल था। वो एक-एक पन्ना निकालकर आग में डाल रहा था, और हर पन्ने को डालने से पहले वो उसे दोनों हाथों से सीधा करता था। जैसे कोई किसी का कपड़ा तह कर रहा हो।"
मीरा ने कैमरा नीचे किया।
"मैंने हकीम साहब की आवाज़ सुनी," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ टूट गई और वो रुक गए। फिर जैसे किसी तरह खुद को जोड़कर बोले, "वो कह रहे थे — ये ज़मीन मेरी नहीं है। ये ज़मीन गली की है। मैं इसे नहीं बेचूँगा। मैं मरीज़ों की दवा इस ज़मीन पर नहीं लिखवाऊँगा।"
"फिर?"
"फिर एक आवाज़ आई। बहुत शांत। बहुत मीठी। जैसे कोई बड़ा भाई अपने छोटे भाई को समझा रहा हो। उसने कहा — हकीम साहब, आपकी उम्र हो गई। आपको आराम चाहिए।"
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