The Mysterious Bell – Chapter 664
"किस चीज़ के?"
"पूछने की ज़रूरत नहीं," घंटी ने कहा। "जब वक़्त आएगा, तू खुद गिन लेगा।"
मैंने उसे जेब में रखा।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"अभी तेरे पास जो फुटेज है," मैंने कहा, "उसे छुपा। अभी किसी को मत दिखाना। न गली को, न अख़बार को, न किसी को।"
"क्यों?"
"क्योंकि उस साये ने मेरी दुकान की तरफ़ इशारा किया है," मैंने कहा। "और मैं नहीं चाहता कि जो चीज़ मेरी दुकान में है, उसे कोई और पहले देख ले।"
मीरा ने मेरी आँखों में देखा। फिर उसने कैमरा बंद कर दिया और उसे अपने बैग के अंदर रख लिया।
"तू क्या करने वाला है?" उसने पूछा।
मैंने उस चाबी को जेब से निकाला, जो पापा ने मुझे दी थी। ज़ंग लगी, छोटी, पुरानी।
"मैं वो दरवाज़ा खोलने वाला हूँ," मैंने कहा। "जो चूल्हे के पीछे है। आज रात।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था — डर नहीं, कुछ और। कुछ ऐसा जो बहुत सालों से अंदर दबा हुआ था और अब बाहर आने को तैयार था।
"मैं साथ चलूँगा," उन्होंने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "आप यहाँ रहिए। फाटक पर। अगर मैं एक घंटे में न आऊँ — "
"तो मैं आऊँगा," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने उनके अंदर की चुप्पी की दरवाज़े पर ताला खोल दिया हो।
मैंने सिर हिलाया।
टिंकू आगे आया।
"मैं भी चलूँगा," उसने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "तू यहीं रहेगा। सीटी पकड़े। अगर कोई चीज़ तेरे अंदर आए — किसी भी तरह की — तू बजा देगा।"
"और अगर कोई चीज़ बाहर आए?" उसने पूछा। "दुकान की तरफ़ से?"
"तो फिर भी बजा देगा," मैंने कहा।
मैंने मुड़कर आँगन को आख़िरी बार देखा। माँ अभी भी व्हीलचेयर में थीं, काजल उनके पास थी, दोनों के हाथ में वो ताँबे का लोटा था। माँ ने मुझे देखा। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस अपना हाथ उठाकर मेरी तरफ़ बढ़ाया — जैसे कह रही हों, जा, पर लौटकर आ।
मैंने उनका हाथ थामा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर उनमें वही गरमी थी जो घंटी में है।
"माँ," मैंने कहा, "अगर वो दरवाज़ा खुले और मैं लौटूँ, तो मुझे बताइएगा कि उसके पीछे क्या था।"
उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा।
"मुझे पता है क्या था," उन्होंने धीरे से कहा। "पर मैं चाहती हूँ कि तू खुद देखे। क्योंकि जो मैंने देखा, वो मेरी आँखों का सच था। तेरा सच तेरी आँखों का होगा।"
मैंने सिर हिलाया।
फिर मैं मुड़ा।
फाटक के बाहर, धूल में, वो गीली राख का उँगली का निशान अभी भी मेरी दुकान की तरफ़ था।
मैंने उसे देखा, और मुझे लगा जैसे वो निशान मुझे नहीं, मेरी दुकान को बुला रहा हो। जैसे कुछ अंदर बैठा हो, बहुत सालों से, और कह रहा हो — अब बहुत देर हो गई, अंकुश यादव।
मैंने चाबी को अपनी मुट्ठी में कस लिया।
और चल पड़ा — उस अंधेरे की तरफ़, जहाँ आज रात एक दरवाज़ा खुलने वाला था, जो पाँच साल से बंद था, और जिसके पीछे शायद वो सब था जो मैं ढूँढ रहा था — या शायद वो सब जो मैंने अब तक नहीं ढूँढा था।
रास्ते में घंटी ने एक बार फिर बजकर कहा, इतना धीरे कि सिर्फ़ मैं सुन सका —
"जब वो दरवाज़ा खुलेगा, तो दो घर खुलेंगे। एक तेरा, और एक उसका। पता नहीं दोनों में से कौन सा पहले खुलेगा।"
मैं रुका नहीं।
मैं चलता रहा।
॥
घंटी ने कहा, "अब तेरा घर।"
बस इतना कहा। न कोई सवाल, न कोई हिदायत। जैसे किसी ने मेरे कान में उँगली रखकर धीरे से धक्का दिया हो — जा।
मैं दौड़ा।
पीछे पापा की साँसें थीं, टूटी और तेज़। टिंकू की चप्पलें धूल में चटक रही थीं। मीरा का बैग उसके कंधे से टकराकर ऐसी आवाज़ कर रहा था जैसे कोई बंद कमरे में कोई चीज़ गिर रही हो।
गली में बत्तियाँ बुझी थीं। पीपल का पेड़ अंधेरे में इतना बड़ा लग रहा था कि आसमान का आधा हिस्सा उसने खा लिया हो। चबूतरी खाली थी। नाली के पत्थर का पुल चुप था। और उस चुप्पी के बीच, दूर, मेरी दुकान की तरफ़ से एक हल्की-सी आवाज़ आ रही थी।
रेडियो की आवाज़।
मैं रुका नहीं। पर मेरे भीतर कुछ रुक गया। क्योंकि मेरी दुकान में रेडियो नहीं था। जिस पुराने रेडियो की आवाज़ आ रही थी, वो तीन महीने पहले मैंने खुद गुस्से में उठाकर मेज़ पर पटका था। उसकी तार बाहर लटक गई थी। उसका बटन टूटकर गिर गया था। उसके अंदर का लोहा ऐसा बजा था जैसे कोई हड्डी चटके।
गली के मोड़ पर चारों बच्चे मिले।
सानिया आगे थी, हाँफती हुई, हाथ में उसकी लाल कवर वाली कॉपी।
"भैया!" उसने कहा। "भैया, दुकान से रेडियो बज रहा है!"
"कौन सा रेडियो?" मैंने कहा।
"वही पुराना," गुड्डू ने कहा, "जो काका छोड़ गए थे, जिसका बटन गिर गया था।"
"उस रेडियो में बटन ही नहीं है," रफ़ीक़ ने कहा। उसने अपना टूटा चश्मा आँख पर चढ़ाया, जिसका एक काँच गायब था। "मैंने अंदर झाँककर देखा। अंदर कोई तार नहीं, कोई बैटरी नहीं। फिर भी बोल रहा है।"
"क्या बोल रहा है?" मीरा ने पूछा।
चारों एक साथ चुप हो गए। फिर चिंटू ने कहा, बहुत धीरे, "कुछ समझ नहीं आ रहा दीदी। आवाज़ ऐसी है जैसे कोई रो रहा हो, और उसके ऊपर कोई खुरच रहा हो।"
मेरे पैरों के नीचे ज़मीन कुछ महसूस नहीं हुई।
"तुम चारों घर जाओ," मैंने कहा।
"नहीं," सानिया ने कहा। "हमने सीटी बजानी है।"
"सीटी तब बजानी है जब कोई बाहर से आए," मैंने कहा। "अभी बाहर से कोई नहीं आ रहा। अभी जो है, वो अंदर है।"
"तो हम बाहर खड़े रहेंगे," चिंटू ने कहा। "बाहर से अंदर देखेंगे। अगर कुछ निकले, तो हम सबसे पहले देखेंगे।"
मैंने उसकी बात काटी नहीं। कभी-कभी बच्चों को रोकना सबसे बड़ी गलती होती है।
दुकान का शटर आधा खुला था।
एक फुट से ज़्यादा नहीं। इतना कि कोई छोटा आदमी रेंगकर अंदर जा सके, या कोई बड़ा आदमी झुककर बाहर आ सके। शटर के नीचे की धूल में लकीरें थीं, पर वो पैरों की नहीं थीं। जैसे कोई चीज़ घसीटकर निकाली गई हो — और फिर वापस रख दी गई हो।
मैंने शटर को हाथ से उठाया। लोहा चरचराया, और वो आवाज़ गली में फैल गई, जैसे किसी बूढ़े ने कराह दी हो।
अंदर घुसते ही पहले गंध आई।
ग्रीस की, मिट्टी के तेल की, पुराने रबर की — और उसके ऊपर, बहुत हल्की, जले काग़ज़ की गंध।
मेरा पेट कड़ा हो गया।
"अंकुश," पापा ने पीछे से कहा। उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने गला दबा दिया हो।
मैंने पीछे देखा। उनका चेहरा शटर के नीचे आधा अंधेरे में था, आधा मेरी टॉर्च की पीली रोशनी में। उनकी आँखें उस जले काग़ज़ की गंध पर अटक गई थीं।
"रुकिए," मैंने कहा। "पहले देख लूँ।"
मैंने टॉर्च घुमाई।
कुछ चोरी नहीं हुआ था।
औज़ार अपनी जगह पर टँगे थे। पेचकस, रिंच, हथौड़ा, प्लायर, तार काटने वाली कैंची, पुराना पंप, ट्यूब वाला टब — सब वहीं। नई रिंच अभी भी ट्रंक पर रखी थी, वैसे ही, जैसे मैंने छोड़ी थी। मेज़ पर पैसे का डिब्बा खुला था, और उसमें जितने पैसे थे, उतने ही थे। दुकान के बोर्ड पर लगी धूल भी वैसी ही थी।
पर दुकान के पीछे वाले कमरे का दरवाज़ा खुला था।
मैं वहाँ गया।
कमरे में बल्ब गुनगुना रहा था, हल्का पीला, जैसे बुखार में जल रहा हो। फ़र्श पर औज़ारों का लंबा लोहे का बक्सा खुला पड़ा था। उसका ताला लटक रहा था, खुला हुआ।
पापा मेरे पीछे आए। उन्होंने अपनी कमीज़ की जेब में हाथ डाला, और वो ज़ंग लगी चाबी निकाली। वही चाबी, जिससे उन्होंने शाम को बक्सा बंद किया था। वो अभी भी उनकी जेब में थी।
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