The Mysterious Bell663 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 663

7 min read November 5, 2026

मैं सीधा अस्पताल के अंदर गया।

नीचे वाले कमरे में डॉक्टर इसरानी मरीज़ों के बीच एक-एक बेड पर जा रहे थे, और उनके हाथ में एक मोमबत्ती थी — पीतल के पुराने स्टैंड पर जमी हुई, जिस पर धूल परत जमी थी। वो किसी की चादर सीधी कर रहे थे, किसी का माथा देख रहे थे, किसी को पानी दे रहे थे। और हर बेड पर वो एक ही बात कह रहे थे, धीरे से, हर बार नए ढंग से।

"डर को कमरे से बाहर नहीं घुसने देना," वो कह रहे थे। "डर आता है तो बाहर रहता है। अगर वो अंदर आ गया, तो दवा भी काम नहीं करती।"

माँ पाँचवें बेड से चौथे बेड पर आ चुकी थीं — या शायद वो चौथे पर पहले से थीं और मैंने ध्यान नहीं दिया। काजल उनके पास बैठी थी। दोनों की आँखें डॉक्टर साहब पर थीं।

मैंने देखा — इलियास भाई पाँचवें बेड के पास खड़े थे, हाथ में एक पुराना पीला मुड़ा काग़ज़, और उनकी नौ साल की बेटी माही की आँखें आधी बंद थीं, बुखार उतर रहा था, चेहरे पर पसीना था। इलियास भाई उसे एक पल के लिए भी नहीं छोड़ रहे थे। वो मेरी तरफ़ देखकर सिर्फ़ सिर हिलाया — मतलब, मैं यहीं हूँ, अंदर, मैंने अपनी जगह नहीं छोड़ी।

डॉक्टर इसरानी ने मुझे देखा, फिर अपनी मोमबत्ती एक मरीज़ की मेज़ पर रख दी और मेरे पास आए।

"कुछ मिला?" उन्होंने पूछा।

"दीवार पर हाथ का निशान," मैंने कहा। "गीली राख का। पापा कहते हैं वही हाथ पाँच साल पहले भी था।"

डॉक्टर साहब ने कुछ देर मुझे देखा। फिर उन्होंने अपना पुराना स्टेथोस्कोप जेब में रखा — वही, जिसकी नली पर टेप लिपटा था — और कहा, "तुम जानते हो, अंकुश, मैंने इस अस्पताल में तीन हज़ार से ज़्यादा बच्चे पैदा कराए हैं?"

मैंने सिर हिलाया, नहीं जानता था पर सुन रहा था।

"और उनमें से एक भी रात में नहीं रोया," उन्होंने कहा। "क्योंकि मैंने उन्हें आवाज़ से पहले रोशनी दिखाई। जब बच्चा रोता है, तो वो डर से नहीं रोता, वो रोशनी से रोता है — क्योंकि रोशनी आँखों को झकझोरती है। डर भी वैसा ही है। उसे पहले रोशनी मिले, तो वो रोता है और चला जाता है।"

मैं उनके चेहरे को देखता रहा।

"आप डर को कमरे से बाहर निकालने की बात कर रहे हैं," मैंने कहा।

"मैं डर को रोशनी देने की बात कर रहा हूँ," उन्होंने कहा। "क्योंकि डर अंधेरे में ही रहता है। जिसे रोशनी मिल गई, उसने डर को उसी रात के लिए बाहर कर दिया।"

वो अपनी मोमबत्ती उठाकर पाँचवें बेड की तरफ़ बढ़ गए। उन्होंने माही का माथा छुआ, फिर इलियास भाई को कुछ कहा। इलियास भाई ने सिर हिलाया, और उनकी आँखें मेरी तरफ़ उठीं, फिर वापस माही पर झुक गईं।

मैं बाहर लौट आया।

मैंने पूरे आँगन को एक बार देखा। भोला भाई की पटिया पर बच्चे बैठ गए थे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — और सानिया अपनी लाल कवर वाली कॉपी में कुछ लिख रही थी, गुड्डू उसके कंधे के ऊपर से देख रहा था, रफ़ीक़ अपना टूटा चश्मा ठीक कर रहा था, चिंटू मिट्टी में कोई चीज़ खोद रहा था। उनके बीच वो छोटी सी चीज़ें चल रही थीं जो बड़े कभी नहीं देखते।

टिंकू फाटक पर था। उसने सीटी होंठों पर रखी थी, पर अभी बजाई नहीं थी। वो सिर्फ़ देख रहा था — दूर, पीछे के प्लॉट की तरफ़, जहाँ मशीन की तैयारी हो रही थी। वहाँ कुछ था जो उसे खींच रहा था।

मैं फाटक के पास गया और उसके बगल में खड़ा हो गया।

"कुछ दिखा?" मैंने पूछा।

"नहीं," उसने कहा। फिर — "पर उस्ताद, वहाँ कुछ है। वो कुछ है जो मुझे नहीं दिख रहा, पर जो मेरे पैरों के तलवे को ठंडा कर रहा है।"

मैंने उसके पैरों के तलवे की तरफ़ देखा। ज़मीन वहाँ सूखी थी। पर उसकी चप्पलों के किनारे जो धूल थी, वो ऐसे थी जैसे कोई उसे पीछे की तरफ़ धकेल रहा हो — जैसे हवा उस धूल को हमारी तरफ़ से दूर कर रही हो।

मैंने बाहर देखा — फाटक के पीछे, प्लॉट की तरफ़ जाने वाला रास्ता।

और वहाँ कुछ था।

हवा नहीं, पानी नहीं, राख नहीं। कुछ और। कुछ ऐसा जो हवा में धीरे-धीरे इकट्ठा हो रहा था — धुएँ जैसा, पर हवा से हिलता हुआ नहीं। हवा उसे छू रही थी और वो टस से मस नहीं हो रहा था। वो अपनी जगह पर जमा हुआ था, जैसे किसी ने उसे वहीं बाँध दिया हो।

मैंने मीरा को इशारा किया। वो फाटक के पीछे आ गई। पापा भी आए। बंसीलाल लालटेन लेकर आए। टिंकू पीछे रह गया पर उसकी सीटी अब होंठों पर नहीं, हाथ में थी। वो तैयार था।

हम सब फाटक के पास खड़े थे।

धुआँ इकट्ठा होता रहा।

वो एक आकार ले रहा था — पहले एक लंबी लकीर सी, फिर कंधों जैसा उभार, फिर एक सिर जैसा गोला। उसका कोई चेहरा नहीं था। आँख नहीं, नाक नहीं, मुँह नहीं — बस एक औरत या आदमी जैसा आकार, जो किसी भी इंसान से कम नहीं लग रहा था, बस बहुत ज़्यादा खाली लग रहा था।

मीरा ने कैमरा ऊपर किया। बटन दबाया — क्लिक।

धुआँ हिला।

किसी चीज़ को थोड़ा सा जाना, और फिर एक ऐसी हरकत जो इंसान करता है जब कोई उसकी आवाज़ के पीछे आ जाए।

"ये जगह छोड़ो," पापा ने मेरे कान में कहा।

"नहीं," मैंने कहा। मेरी आवाज़ खुद मेरे कान में इतनी साफ़ लगी कि मैं चौंक गया। "इसी के लिए तो खड़े हैं।"

धुएँ का आकार अब पूरा बन चुका था — एक बिना चेहरे का साया, जो हमसे करीब दस कदम दूर, फाटक के बाहर हवा में खड़ा था। वो न ज़मीन पर था, न हवा में — बस उस पल के बीच था जहाँ दोनों चीज़ें मिलती हैं।

और फिर उसने अपना हाथ उठाया।

धीरे से। बिना जल्दी के। जैसे कोई बहुत पुराना इंसान किसी बहुत पुरानी चीज़ की तरफ़ इशारा करता है।

उसकी उँगली हमारी तरफ़ नहीं थी। मेरी तरफ़ नहीं थी। पापा की तरफ़ नहीं।

वो सीधे मेरी दुकान की तरफ़ उठी हुई थी।

जहाँ शटर बंद था। जहाँ आज शाम कोई नहीं था।

मैंने वो उँगली देखी, और मेरे पेट में एक ठंडी सी चीज़ घूम गई, क्योंकि मुझे पता था — उस उँगली की दिशा में बस एक ही चीज़ थी।

दुकान।

और उसके पीछे, घर का पिछला हिस्सा।

और उस घर में, चूल्हे के पीछे, वो दरवाज़ा जो पाँच साल से नहीं खुला।

घंटी मेरी जेब में ठंडी हो गई।

फिर उसने धीरे से कहा, जैसे किसी पुराने रिश्तेदार की आवाज़ जो बहुत साल बाद घर लौटा हो —

"अंकुश, ये आग का आदमी नहीं है। ये वो है जो आग को देखता है।"

मैंने साँस ली।

"और जो आग को देखता है," मैंने धीरे से कहा, "वो आग जलाता नहीं। वो आग को बुलाता है।"

धुएँ का आकार एक पल और खड़ा रहा।

फिर वो टूट गया — ऊपर की तरफ़, बिना शोर, बिना धमाके, जैसे कोई कपड़ा हवा में फट जाए — और गायब हो गया।

फाटक के बाहर ज़मीन पर सिर्फ़ एक चीज़ बची थी।

गीली राख।

और उसमें, बिल्कुल बीचों-बीच, एक उँगली का निशान — जो सीधे मेरी दुकान की तरफ़ इशारा कर रहा था।

मैंने पीछे देखा। मीरा का कैमरा अभी भी चालू था। टिंकू की सीटी अभी भी उसके हाथ में थी। पापा की आँखें अभी भी उस जगह पर थीं, और उनके होंठ धीरे से हिल रहे थे — मैंने उन्हें कभी प्रार्थना करते नहीं देखा था।

मैंने घंटी को जेब से निकाला और उसे अपनी हथेली पर रखा।

वो अब भी ठंडी थी।

पर उसमें एक कंपन था — जैसे किसी दूर की आवाज़ को पकड़ रही हो।

"कितना बचा?" मैंने पूछा।

घंटी ने कहा, "एक सौ अठारह से ग्यारह कटे। ग्यारह अपनी जगह पर हैं। बाकी बचा — एक सौ सात।"

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