The Mysterious Bell – Chapter 662
"आ गया," मैंने कहा।
मेरे पीछे पापा आए। उस्ताद आए। भोला भाई अपनी लंबी पटिया उठाकर लाए और उसे ज़मीन पर बिछाकर उस पर बैठ गए, जैसे कोई पुराना चौकीदार अपनी चौकी सजा रहा हो। मंसूर और हबीब चाचा दोनों तरफ़ खड़े हो गए। हबीब चाचा ने आज इमरान के लिए वो पीला रूमाल जेब से निकाला और उसे अपनी हथेली पर रखकर देखते रहे, फिर धीरे से वापस जेब में रख लिया।
मैंने आँगन को देखा।
जगह-जगह मोमबत्तियाँ जल रही थीं, और हर मोमबत्ती के पीछे कोई एक चेहरा था, जो अब डरा हुआ नहीं था। थका हुआ था, पर डरा हुआ नहीं। यही फ़र्क़ था इस शाम में और पिछली सब शामों में।
माँ व्हीलचेयर में आँगन के कोने पर थीं, पास में काजल बैठी थी। दोनों के हाथ में-हाथ में एक पुराना ताँबे का लोटा था, जिसमें गुड़ और कुछ सूखा धनिया रखा था — माँ का कहना था कि घर की चीज़ें घर के कोने पर रहती हैं, तभी घर संभलता है।
पापा ने अपनी जेब से चाबी एक बार फिर निकाली, उसे हथेली पर रखा, फिर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"आज रात," उन्होंने कहा, "ये तुम्हारे पास रहेगी।"
मैंने उसे लिया।
मैंने टिंकू को इशारा किया कि वो चारों बच्चों को लेकर पीछे के फाटक के बाहर वाले हिस्से में जाए और वहाँ के कोने-कोने को देखे। वो सीटी होंठों पर रखकर चला गया — मुझे पता था कि वो बासठ बार सीटी बजाने की सोच रहा है, पर मैंने उसकी शरारत पर ध्यान नहीं दिया।
दस मिनट भी नहीं बीते होंगे कि टिंकू दौड़ता हुआ वापस आया।
उसके हाथ में एक पुराना थैला था — जूट का, फटा, जिसका रंग कभी सफ़ेद रहा होगा, अब गंदा पीला और भूरा हो चुका था। और उसमें से एक गंध आ रही थी, जो मैंने पहचानी — मिट्टी का तेल। वही गंध, जो पुराने स्टोव से आती है, जो माचिस की डिब्बी के पास रखे कपड़े से आती है।
"उस्ताद!" टिंकू ने कहा, हाँफते हुए। "ये फाटक के बाहर बोरी के नीचे पड़ा था। और अंदर देखो — कपड़ा है, आधा जला हुआ।"
मैंने थैला उसके हाथ से लिया और उसे फाटक के दीये के पास ले गया। पापा भी आए। उस्ताद आए। मैंने थैले का मुँह खोला तो अंदर से एक कपड़ा निकला — सस्ता सा, खाकी या भूरा रंग का, जो कभी किसी मज़दूर की कमीज़ का हिस्सा रहा होगा। उसका एक कोना पूरी तरह जल चुका था, किनारे काले थे, और जहाँ जला था वहाँ कपड़ा ऐसा सख़्त हो गया था जैसे कोई पकी हुई चीज़।
उस्ताद ने उसे सूँघा। उनका चेहरा बदला।
"तेल इसमें नहीं है," उन्होंने कहा। "तेल थैले में है। कपड़ा सिर्फ़ जला हुआ है।"
"मतलब?" टिंकू ने पूछा।
"मतलब," उस्ताद ने धीरे से कहा, "कि किसी ने तेल वाले कपड़े को जलाया, फिर उसे इस थैले में रखा, फिर थैला यहाँ छोड़कर चला गया।"
मेरा पेट कड़ा हुआ।
"क्यों छोड़कर जाएगा कोई?" टिंकू ने पूछा।
"क्योंकि," मैंने कहा, "उसे कोई ऐसा चाहिए जो इसे ढूँढे। और वो जानता है कि हम ढूँढेंगे।"
तभी पीछे से पैरों की आवाज़ आई। मैंने मुड़कर देखा — बबलू।
वो आज कुछ और लग रहा था। चेन नहीं थी, पानदान नहीं था, चमकीली शर्ट नहीं थी। एक सादी सफ़ेद कमीज़ थी, जिस पर धूल थी, और उसका दाहिना हाथ रूमाल से बँधा था। वही सफ़ेद रूमाल, जो कल मंदिर के पीछे उसकी हथेली पर लिपटा था।
वो मेरे सामने आकर रुका। उसने पहले पापा की तरफ़ देखा, फिर उस्ताद की, फिर मेरी।
"बोलो," मैंने कहा।
"मैंने देखा," उसने कहा। उसकी आवाज़ अब वो घमंडी आवाज़ नहीं थी। वो किसी ऐसे आदमी की आवाज़ थी जिसने बहुत देर तक अपनी आँखों पर विश्वास नहीं किया हो। "अस्पताल की पिछली दीवार के पास। तीन-चार मिनट पहले। एक आदमी — कपड़ा जला हुआ उसका, कमीज़ का हिस्सा, और हाथ में कुछ। वो कुछ फेंक रहा था।"
"क्या?" मैंने पूछा।
"मुझे नहीं पता," बबलू ने कहा। "मैंने आवाज़ सुनी तो वहाँ पहुँचा, पर वो जा चुका था। जब मैं वापस लौट रहा था, मुझे धुआँ जैसी गंध मिली। और मैं — " वो रुका। उसने अपना बँधा हुआ हाथ उठाया। "मैं आज पहली बार सच बोलने आया हूँ, अंकुश भाई। मुझे लगा अगर आज नहीं बोला, तो कल कोई और नहीं बोलेगा।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। वहाँ डर था, पर वो डर अपनी जान का नहीं था। अपनी नौकरी का था, अपने अंगूठे वाले काग़ज़ का था, उस पूरी गली की गलती का था।
मीरा मेरे पीछे आ चुकी थी। उसने बबलू को देखा और कुछ नहीं कहा, बस अपना कैमरा जेब में रख लिया — जैसे अब ये वक़्त काग़ज़ या गवाही का नहीं, बस बात का है।
"दीवार की तरफ़ चलो," मैंने कहा।
मैं, मीरा, बबलू और पापा — चारों अस्पताल की पिछली दीवार की तरफ़ गए। उस्ताद पीछे फाटक पर रुके, क्योंकि कोई तो रुकना था। टिंकू को हमने फाटक के बाहर रखा, देखने के लिए कि कोई भागता हुआ दिखे।
दीवार के पास पहुँचकर मीरा ने टॉर्च जलाई।
दीवार वैसी ही थी — पीली, उखड़ती, नीचे काई जमी, ऊपर पुरानी बारिश की लकीरें। पीली हुई दीवार पर कोई चेहरा नहीं, कोई साया नहीं, कोई कपड़ा नहीं।
पर फिर मेरी नज़र नीचे गई।
दीवार के बीच में, ज़मीन से करीब चार हाथ ऊपर, एक हाथ का निशान था। गीली राख से बना। पूरी हथेली का, पाँचों उँगलियों का, और उँगलियों के निशान ऐसे साफ़ थे जैसे किसी ने हाथ रखकर दबाया हो।
मीरा ने आगे जाकर उसे देखा। फिर उसने मुझे देखा।
"ये किसी ने अभी छोड़ा है," उसने कहा। "राख गीली है।"
मैंने उस हथेली के निशान के नीचे देखा। ज़मीन पर पैरों के निशान थे, जो वहाँ से दीवार के साथ-साथ दक्षिण की तरफ़ जाते थे — जहाँ सूखी नाली और टूटी बाउंड्री वाला रास्ता है। पर वो निशान साफ़ नहीं थे, जैसे उन्हें किसी ने पैर से पोंछने की कोशिश की हो।
"बबलू," मैंने कहा, "तुमने वो आदमी किस तरफ़ जाते देखा?"
"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "मैंने सिर्फ़ पीठ देखी। वो जाता हुआ दिखा — बस।"
मैंने घंटी को जेब से निकाला। उसे हथेली पर रखा। वो ठंडी थी, बस उतनी ही गरम जितनी किसी चीज़ की आख़िरी याद होती है। मैंने उसे हिलाया।
आवाज़ नहीं आई।
मैंने फिर हिलाया।
तब आवाज़ आई, धीरे से, जैसे कोई मुझसे दूर खड़ा हो और होंठ हिला रहा हो।
"राख रास्ता नहीं है," घंटी ने कहा। "राख दरवाज़ा है।"
"किसका दरवाज़ा?" मैंने पूछा।
"जिसे खोलने के लिए हाथ चाहिए।"
और फिर चुप हो गई।
पापा ने वो हथेली का निशान देखा और उनका चेहरा ऐसा हुआ जैसे किसी ने उनके सामने कोई पुराना दरवाज़ा खोल दिया हो।
"मैंने ये हाथ पहले देखा है," उन्होंने कहा।
"कब?" मैंने पूछा।
"पाँच साल पहले।" उनकी आवाज़ धीमी थी। "उस रात भी दीवार पर ऐसा ही हाथ मिला था। तब मुझे लगा कि किसी मज़दूर का होगा। पर उँगलियों के निशान वही थे — अंगूठा थोड़ा नीचे, और सबसे छोटी उँगली का निशान पूरा नहीं।"
मैंने उस निशान को फिर देखा। सच में — सबसे छोटी उँगली का निशान पूरा नहीं था। जैसे उस आदमी की सबसे छोटी उँगली कहीं टूटी हो या मुड़ी हो।
मीरा ने फोटो ली।
वो हमें कुछ देर चुपचाप खड़े देखते रहे, फिर पीछे मुड़ी और कहा, "अब अंदर चलो। डॉक्टर साहब को बताते हैं। मरीज़ों के बीच भी कुछ तो हो रहा होगा।"
हम लौटे।
आँगन में मोमबत्तियों की संख्या बढ़ गई थी। किसी ने दीवारों पर पुराने दीये रख दिए थे, और अब पूरा आँगन एक पुरानी तस्वीर जैसा लग रहा था — पीला, धुँधला, और फिर भी ज़िंदा। भोला भाई अपनी पटिया पर बैठे कुछ गुनगुना रहे थे, शायद अपनी बीवी की बात कर रहे थे, जो अब चलने लगी है।
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