The Mysterious Bell – Chapter 661
मैंने माइक पकड़ा। मेरे हाथ में वो ठंडा था, और मेरी आवाज़ उसमें से निकलते हुए मुझे अपनी नहीं लगी। मैंने देखा कि पूरी गली मेरी तरफ़ देख रही है — रोशनी में, और उसके बाहर भी।
“मैं सिर्फ़ एक बात कहूँगा,” मैंने कहा। “आज रात अगर आग लगे, तो पहले नाम याद रखना — तेरा, मेरा, हमारा। घर का नाम बाद में। पहले आदमी। आज रात किसी को अकेले नहीं छोड़ना। आज रात किसी के पीछे नहीं खड़े रहना। और अगर कोई तुमसे कहे कि ‘तू चुप रह, मैं देख लूँगा’ — तो उससे कहना, आज नहीं भाई, आज दोनों देखेंगे।”
आँगन में कोई नहीं बोला। पर मुझे लगा कि सबने सिर हिलाया।
मैंने माइक पापा को लौटाया और उन्होंने उसे बंद कर दिया।
और ठीक उसी वक़्त, मैंने महसूस किया।
मेरी जेब में घंटी ठंडी हो रही थी। और उस ठंडक के साथ एक गंध आई — जली हुई काग़ज़ की गंध। बहुत हल्की, हवा से आती हुई, जैसे किसी ने घर के पीछे बहुत पुराना दरवाज़ा खोल दिया हो जिसके पीछे बरसों से जला हुआ कुछ रखा था।
मैंने हाथ जेब में डाला। घंटी बर्फ़ जैसी ठंडी थी।
“ये आग नहीं है,” घंटी ने कहा।
मैंने आँगन में चारों तरफ़ देखा। लोग हँस रहे थे। बच्चे अपने डिब्बों से पानी भर रहे थे। शबनम आपा बर्तन उठा रही थीं। कुछ भी गलत नहीं दिख रहा था।
“तो क्या है?” मैंने फुसफुसाकर पूछा।
घंटी ने एक पल सोचा, जैसे भीतर से कोई गिनती कर रहा हो।
“कोई पुरानी राख जगा रहा है,” घंटी ने कहा।
मैंने पीछे के फाटक की तरफ़ देखा। वहाँ मेरा भी अपना आधा आदमी खड़ा था, बंसीलाल, साथ में भोला भाई, मंसूर, हबीब चाचा — चारों।
पर गंध उसी तरफ़ से आ रही थी।
और उस पल मुझे समझ आया — आग अभी नहीं लगी थी। कोई पहले उस राख को जगा रहा था।
जो आदमी आग लगाने आएगा, उसे पहले उस पुराने आग की गंध से अपना रास्ता मिलेगा। और आज रात, मेरी गली में, वो गंध पहली बार हवा में थी।
मैंने घंटी को हाथ में निकालकर देखा। उसका पीतल अंधेरे में ज़रा भी चमक नहीं रहा था। वो एक मरा हुआ टुकड़ा लग रहा था।
“कौन जगा रहा है?” मैंने पूछा।
घंटी ने जवाब नहीं दिया।
“कहाँ से आ रही है?” मैंने पूछा।
“वहाँ से,” घंटी ने कहा, “जहाँ सबसे पहले अस्पताल ने साँस ली थी।”
मैंने पीछे के फाटक की तरफ़ देखा। चार आदमी। सभी अपनी जगह पर। सभी खड़े।
और मेरी जेब में घंटी धीमे से बजी — एक बार, जैसे कोई गहरी नींद से करवट बदल रहा हो।
“पापा,” मैंने कहा। मेरी आवाज़ सामान्य नहीं थी।
वो दौड़कर आए। “क्या हुआ?”
“गंध आ रही है,” मैंने कहा। “पीछे से।”
पापा ने एक गहरी साँस ली। उनकी आँखें बंद हुईं और फिर खुलीं। और मैंने उनके चेहरे पर वो पुराना, गहरा डर देखा, जो पाँच साल पहले उनके चेहरे पर था, और जो आज सुबह खुल गया था।
“ये वो ही गंध है,” उन्होंने कहा। “जो उस रात थी। पाँच साल पहले।”
मैंने पूरी गली को देखा। लोग अभी भी हँस रहे थे, चाय के प्याले उठा रहे थे, बच्चे बाल्टियाँ भर रहे थे।
मैं चाहता था कि वो हँसी कुछ और देर चलती रहे।
पर मैं जानता था कि जो आदमी राख जगा रहा है, वो मुझसे ज़्यादा जल्दी में है।
मैंने घंटी को जेब में रखा, टिंकू की तरफ़ देखा और इशारा किया। उसने अपनी सीटी होंठों पर रख ली।
“पहले बात करो,” मैंने धीरे कहा, “फिर बजाओ।”
और आँगन के बीच से मैंने पीछे के फाटक की तरफ़ चलना शुरू किया, मेरे पीछे पापा, साथ में उस्ताद, और पीछे-पीछे वो चार आदमी जो मुझे उस वक़्त सबसे ज़्यादा भरोसेमंद लगे।
रास्ते में मैंने आँगन के कोने पर रखी एक पुरानी मिट्टी की कटोरी उठाई। उसका एक कोना टूटा हुआ था। मैंने उसे हाथ में पकड़ा, और उस पल मुझे लगा जैसे मैं किसी और चीज़ को उठा रहा हूँ, किसी पुरानी याद को, जिसे न जाने कब किसी ने यहाँ छोड़ दिया था।
नीम के पत्ते हवा में हिले।
अस्पताल के पिछले हिस्से से फिर गंध आई — इस बार थोड़ी ज़्यादा साफ़, जैसे किसी ने कोई ढक्कन उठाया हो और फिर रख दिया हो।
और मेरी जेब से घंटी ने धीरे से, बहुत धीरे से, एक ऐसी बात कही जिसे मैं पूरी तरह समझ नहीं पाया, पर जिसने मेरे अंदर की हर चीज़ एक पल के लिए रोक दी।
“अंकुश,” घंटी ने कहा, “आज रात कोई काग़ज़ नहीं जलाएगा। आज रात कोई जले हुए काग़ज़ को नाम देगा।”
मैं रुक गया।
“मतलब?”
“मतलब ये,” घंटी ने कहा, “कि जो आदमी अपनी जगह छोड़कर भागेगा, वही आग का आदमी है।”
मैंने पापा की तरफ़ देखा। उन्होंने भी सुना। उन्होंने कोई सवाल नहीं पूछा, बस अपनी जेब में हाथ डाला और ज़ंग लगी वो चाबी निकाली, जो उन्होंने सुबह मुझे दी थी और जो अब उनके पास लौट आई थी।
“इसे अभी किसी को नहीं देना,” उन्होंने कहा। “ये चाबी उस दरवाज़े की है जिसे मैं पाँच साल से नहीं खोल पाया। और मुझे लगता है आज रात उसे खोलना पड़ेगा।”
मैंने वो चाबी ली। वो ठंडी थी, पर उसमें भी वो हल्की गरमी थी, ठीक जैसे घंटी में।
मैं आगे बढ़ा।
और पीछे आँगन में, माँ की आवाज़ आई, जो इस पूरी शाम में सबसे साफ़ और सबसे शांत थी।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “कुछ खाकर जाना।”
मैं मुड़ा। वो अपनी कुर्सी में बैठी थीं, हाथ में एक रोटी का टुकड़ा, जिस पर गुड़ लगा था। वो मुस्कुराईं। बिलकुल वैसे ही, जैसे बहुत साल पहले, जब मैं स्कूल से लौटकर कहता था — माँ, आज मैंने लड़ाई जीती है।
“एक टुकड़ा,” उन्होंने कहा। “बस।”
मैंने वो टुकड़ा खाया। उसमें गुड़ था, और उससे ज़्यादा कुछ था, जिसका कोई नाम नहीं।
और फिर मैं पीछे के फाटक की तरफ़ चल दिया, जहाँ उस शाम हवा में पहली बार एक पुरानी आग की गंध तैर रही थी।
मेरे पीछे पापा थे।
और मुझे लगा जैसे पहली बार, मैं अकेले नहीं जा रहा।
नीम के पेड़ से एक पत्ता और गिरा, इस बार मेरे सिर पर आकर रुका। मैंने उसे उतारा और देखा — वो सूखा था, पर उसके किनारे कोई जान-बूझकर जलाए गए थे, जैसे किसी ने उसे माचिस की आँच दिखाई हो।
मैंने उसे जेब में घंटी के साथ रख लिया।
और आगे बढ़ गया।
॥
अस्पताल का आँगन शाम को जैसा था, वैसा अब नहीं था।
हवा ठंडी हो चुकी थी। आसमान का रंग उस तरह का गहरा नीला हो गया था जो दिन में कभी नहीं दिखता, सिर्फ़ शाम ढलने के बाद आता है, जब सूरज जा चुका होता है पर रात अभी पूरी तरह आई नहीं होती। फाटक पर उस्ताद का सिला हुआ सफ़ेद कपड़ा हवा में हिल रहा था, और उस पर के नीले अक्षर आधी रोशनी में ऐसे चमक रहे थे जैसे कोई चीज़़ अंदर से जल रही हो।
अस्पताल हमारा है।
अंधेरा बढ़ते ही लोग अपनी-अपनी जगहों पर चले गए। कोई मोमबत्ती लेकर आया, कोई टॉर्च, कोई पुरानी लालटेन जिसकी काँच पर काई जमी थी। उस्ताद ने अपनी दुकान से पीतल का एक और दीया उठाया और फाटक के किनारे रख दिया, बत्ती जलाई, और उसकी पीली रोशनी में उनका चेहरा कुछ और पुराना लगा।
शबनम आपा ने गुमटी के पीछे से एक पुरानी स्टूल उठाकर दवा की खिड़की के नीचे डाल दी और उस पर बैठ गईं। हाथ में वही लोहे की चिमटी थी। रज़िया आपा उनके पास खड़ी थीं, कंधे पर माँ की वो रेशमी चुनरी डाले हुए, जो उन्होंने आज शाम गुमटी पर रखी थी।
मैं फाटक के पास पहुँचा तो बंसीलाल वहाँ पहले से खड़े थे। हाथ में वही लालटेन, जो उन्होंने अस्पताल की पिछली दीवार के पास जलाई थी, और उसकी रोशनी में उनकी छाया दीवार पर बहुत बड़ी हो रही थी।
"आ गए," उन्होंने कहा, जैसे किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहे थे।
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