The Mysterious Bell – Chapter 665
फिर भी ताला खुला था।
पापा ने ताला उठाया। उसके की-होल में ज़ंग का बारीक बुरादा भरा था, जैसे अंदर कोई चीज़ घुमाई गई हो — पर चाबी से नहीं, किसी और चीज़ से। किसी नुकीली चीज़ से।
"मैंने इसे बंद किया था," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ में वो कंप थी जो बहुत सालों से दबी हुई थी। "अपने हाथ से। चाबी मेरी जेब में थी।"
"जानता हूँ," मैंने कहा।
"तो फिर?"
मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि जवाब मेरे पास नहीं था। और जब जवाब नहीं होता, तो सबसे अच्छी बात चुप रहना है — वरना आदमी झूठ बोल देता है। मुझे उस रात झूठ नहीं बोलना था।
बक्से के अंदर मेरे औज़ार वैसे ही रखे थे, जैसे मैंने रखे थे। पर एक जगह खाली थी। बीच में, जहाँ मेरी पुरानी रेती रखी थी।
रेती गायब थी।
मैं कमरे के बीच में खड़ा था, और तभी आवाज़ आई।
धीमी, दबी, टूटी — जैसे कोई पुराना रेडियो जिसकी आवाज़ अंदर ही अंदर फँसी हो।
"…मैंने लगाया…"
मैं पत्थर हो गया।
पीछे टिंकू के हाथ से सीटी छूट गई। वो फ़र्श पर गिरी, लुढ़की, और रुक गई। टिंकू ने उसे उठाया भी नहीं।
"…डर के मारे लगाया… मेरे बेटे को नहीं पता… उसे पता न चले…"
आवाज़ मेरे पिता की थी।
पर पिता मेरे ठीक पीछे खड़े थे।
मैंने मुड़कर देखा। पापा का चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उनके अंदर की सारी हवा खींच ली हो। उनका मुँह खुला था, आँखें फैली हुईं, और उनके हाथ — जो हमेशा किसी न किसी औज़ार पर टिके रहते थे — अब खाली थे, और काँप रहे थे।
"पापा," मैंने कहा।
वो सुनते नहीं थे।
आवाज़ आगे बढ़ी।
"…मैंने सोचा था, बस एक अंगूठा… एक अंगूठा लगा दूँ, तो सब रुक जाएगा… दवा आ जाएगी… वो ठीक हो जाएगी…"
और फिर आवाज़ रुकी।
कमरे में सिर्फ़ बल्ब की गुनगुनाहट बची। और फिर वो भी ऐसे लगी जैसे कोई साँस रोककर बैठा हो।
मैंने रेडियो देखा।
वो ट्रंक के पास, फ़र्श पर पड़ा था। वही पुराना, टूटा हुआ, जिसका बटन मेरे गुस्से में गिरा था। उसका तार कटा हुआ था। उसका प्लग दीवार से दूर, ज़मीन पर। उसके अंदर की पीली परत बाहर निकली हुई। उसके पीछे की जाली टूटी हुई।
और वो बज रहा था।
मीरा ने अपना कैमरा निकाला। उसने बटन दबाया। लाल बत्ती जली।
"अंकुश," उसने कहा। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। "इधर देख।"
उसने कैमरे की छोटी स्क्रीन मेरी तरफ़ घुमाई।
स्क्रीन पर कमरा दिख रहा था। ट्रंक, खुला औज़ारदान, फ़र्श पर पड़ा रेडियो, और पीछे की दीवार।
दीवार पर एक परछाईं थी।
मैंने अपनी आँखों से दीवार देखी। कुछ नहीं था। सिर्फ़ पीली, धूल भरी दीवार, जिस पर बल्ब की रोशनी पड़ रही थी।
मैंने फिर स्क्रीन देखी।
परछाईं वहीं थी। बिना चेहरे की। बिना शक्ल की। सिर्फ़ एक काला आकार, जैसे किसी ने धुएँ को दीवार पर चिपका दिया हो। और उसका एक हाथ — अगर उसे हाथ कहा जा सके — ट्रंक की तरफ़ उठा हुआ था। उँगली सीधी ट्रंक पर थी।
मेरी गर्दन के पीछे ठंडी सुई चुभी।
"तू इसे अपनी आँख से देख रहा है?" मैंने पूछा।
"कैमरे में है," मीरा ने कहा। "आँख से नहीं।"
"तो कैमरा झूठ नहीं बोलता," मैंने कहा।
"कैमरा सच दिखाता है," उसने कहा। "बस हमारी आँख से ज़्यादा सच।"
टिंकू मेरे पास आया। उसने स्क्रीन देखी और उसका मुँह खुल गया। फिर उसने बहुत धीरे कहा, "भैया… वो ट्रंक की तरफ़ इशारा कर रहा है।"
"दिख रहा है," मैंने कहा।
"तो फिर ट्रंक खोल दो ना!"
"नहीं," पापा ने कहा।
हम सब उनकी तरफ़ घूम गए।
उनकी आवाज़ अभी भी काँप रही थी, पर उसमें अब कुछ और था। ज़िद। वो ज़िद जो बूढ़े लोग तब पकड़ते हैं जब उन्हें कोई पुरानी चीज़ वापस छूने से रोकना हो।
"ये ट्रंक नहीं है," पापा ने कहा। "ये… ये मेरा पुराना बक्सा है। इसके अंदर सिर्फ़ औज़ार हैं। पर आज नहीं।"
"तो क्या है?" मैंने पूछा।
"मैं नहीं जानता," उन्होंने कहा। और फिर, इतना धीरे कि सिर्फ़ मैं सुन सका, "और यही सबसे डरावना है।"
रेडियो फिर बोला।
इस बार आवाज़ पापा की नहीं थी। इस बार आवाज़ किसी सूखी सुई जैसी थी, जो हड्डी के ऊपर से खींची जा रही हो।
"बोल, शंकर। बोल। सबको बोल दे।"
पापा ने आगे हाथ बढ़ाया — रेडियो बंद करने के लिए। उनकी उँगलियाँ हवा में काँपीं। वो रेडियो के पास पहुँचीं और रुक गईं। उन्होंने आगे बढ़ने की कोशिश की, पर हाथ ने साथ नहीं दिया।
मैंने अपना हाथ बढ़ाकर उनका हाथ थाम लिया।
उनकी हथेली ठंडी थी, और पसीने से भीगी हुई। उनकी उँगलियों में वो कंप थी जो आँखों से नहीं छुपती।
"साथ," मैंने कहा। "मेरे साथ।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था। मैंने उनका हाथ रेडियो के ऊपर रखा और अपना हाथ उनके ऊपर।
और दोनों ने साथ दबाया।
रेडियो नहीं बंद हुआ। बटन था ही नहीं। मैंने तार खींचा, कुछ नहीं हुआ। मैंने उसके अंदर हाथ डाला, तो उसके अंदर की पीली परत गरम थी — जैसे किसी ने उसे अभी छोड़ा हो।
"पापा," मैंने कहा। "ये आपकी आवाज़ थी।"
पापा ने कोई जवाब नहीं दिया।
"पापा।"
"हाँ।"
"ये आपकी आवाज़ थी।"
वो फिर चुप रहे। फिर उन्होंने अपनी ज़ुबान को इतना दबाकर बोला जैसे चीज़ अंदर से फट रही हो, "मेरी थी।"
मीरा ने कैमरा थोड़ा नीचा किया। टिंकू ने अपनी सीटी उठा ली और उसे जेब में डाल लिया। बच्चे दरवाज़े पर खड़े थे; सानिया ने अपनी कॉपी से कुछ लिखना शुरू कर दिया था और फिर रोक दिया, क्योंकि उसकी कलम नहीं चल रही थी।
"कब की आवाज़ है?" मैंने पूछा।
पापा ने आँखें बंद कर लीं।
"पाँच साल पुरानी," उन्होंने कहा। "जब रणवीर के दफ़्तर में मैंने… जब मैंने वो किया। उसके बाद मैं कुछ दिन टूटा-सा रहा। उसी वक़्त की।"
"आपने वहाँ क्या कहा था?"
"मैंने कुछ नहीं कहा था," उन्होंने कहा। "मैंने सिर्फ़ अंगूठा लगाया था। पर जब आदमी अंदर से टूटता है, तो उसके अंदर बोलना शुरू हो जाता है। जो बात मुँह से नहीं निकलती, वो कहीं और निकलती है। शायद ये उसी आवाज़ है।"
रेडियो फिर बोला।
"…मेरे बेटे को नहीं पता…"
पापा ने अपने होंठ कस लिए।
मैंने अपना हाथ उनके कंधे पर रखा।
"पापा," मैंने कहा, "मुझे पता है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में डर था, और उस डर के नीचे वो चीज़ थी जिसे आदमी सबसे ज़्यादा छिपाता है — शर्म।
"कब से?" उन्होंने पूछा।
"बहुत पहले से," मैंने कहा। "मैंने सिर्फ़ बोला नहीं। क्योंकि मैं इंतज़ार कर रहा था कि आप खुद बोलें।"
"मैं नहीं बोलता," उन्होंने कहा।
"तो अब हम दोनों सुन रहे हैं," मैंने कहा। "ये रेडियो हमारी जगह बोल रहा है। और मुझे नहीं पसंद कि मेरे घर की बात कोई और बोले।"
मैंने रेडियो उठाया। वो मेरे हाथ में गरम था, जैसे अभी किसी ने उसे सीने से उतारा हो। मैंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा और दीवार पर पटकने की तरह उठाया।
और तभी घंटी बजी।
सिर्फ़ एक बार। छोटी, साफ़।
मैं रुक गया।
"मत तोड़," घंटी ने कहा। "टूटी चीज़ जो बोल रही हो, उससे गुस्सा नहीं करते। उससे पूछते हैं।"
मैंने रेडियो नीचे रख दिया। हाथ में रोशनी की गरमी बची रह गई।
"क्या पूछूँ?" मैंने फुसफुसाकर कहा।
"ये नहीं," घंटी ने कहा। "ये कब से बज रहा है, ये नहीं। ये किसने बजाया, यहाँ तक कि बंद क्यों नहीं होता — ये मत पूछ।"
"तो क्या?"
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