The Mysterious Bell – Chapter 654
तभी दूसरी आवाज़ आई।
"डॉक्टर साहब!"
भीड़ को चीरती हुई एक बूढ़ी औरत आगे आई। साठ के पार, कमर झुकी हुई, हाथ में एक पुराना सूती थैला।
"मेरे पति तीसरे बेड पर हैं। उनको साँस की तकलीफ है। आप कह रहे थे तीन दिन और रखना है।" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "मैं तीन दिन नहीं रखूँगी। मैं अभी ले जाऊँगी।"
"अम्मा," डॉक्टर इसरानी ने कहा, "उनकी हालत में अगर हम ऑक्सीजन हटा दें—"
"तो मैं उन्हें घर ले जाकर भगवान से कहूँगी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। "पर इस जगह नहीं रखूँगी, जहाँ रात में कोई बोलता है।"
तीसरी आवाज़ औरत की थी, पर अलग थी — पतली, जैसे किसी बहुत थकी हुई लड़की की। वो अपने पति के पीछे खड़ी थी, जो पहले से भीड़ से बाहर निकल रहा था, हाथ में प्लास्टिक की थैली, जिसमें दवाएँ थीं।
"हमारा बच्चा आज सुबह ही आया है," उसने कहा। "हमने अभी पैसे जमा किए हैं। पर हमें रिफंड चाहिए। हम नहीं रुकेंगे।"
तीन परिवार। तीन अलग-अलग तरह के डर। और हर डर के पीछे वही एक चीज़ — कि रात में इस दीवार से कोई बोलता है।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी अब भी गरम थी, पर सहने लायक। मैंने उसे मसला।
बाहर, भीड़ के किनारे, मुझे टिंकू दिखा। वो सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू के साथ एक चबूतरी पर खड़ा था, और उसके हाथ में समोसे का काग़ज़ी पुड़ा था। पाँच पाँच समोसे, जो उसने शबनम आपा की गुमटी से उठाए थे, क्योंकि उस वक़्त शबनम आपा गुमटी में नहीं थीं — वो अस्पताल के अंदर माँ के पास थीं।
टिंकू की आँखों में वो चमक थी जो मुझे पसंद है और जिससे मुझे डर भी लगता है। उसने चुपचाप समोसे का पुड़ा एक बूढ़े आदमी की तरफ़ बढ़ा दिया, जो भीड़ के आगे खड़ा लाठी टेक रहा था और जिसकी आँखों में भी वही डर था।
"काका," टिंकू ने कहा, "ये गरम हैं। अभी निकले हैं।"
बूढ़े ने पुड़ा देखा। सूँघा। फिर टिंकू की तरफ़ देखा।
"बेटा," उसने कहा, "समोसे से मरीज़ ठीक नहीं होते।"
"पर मरीज़ के साथ जो बैठता है, वो भूखा रहे तो मरीज़ को कौन सँभालेगा?" टिंकू ने कहा। बिल्कुल सीधे मुँह से। जैसे कोई हिसाब बता रहा हो।
बूढ़ा एक पल रुका।
फिर वो हँसा। धीमी, खुरदरी हँसी, जैसे पुरानी अलमारी का दरवाज़ा खुला हो।
"तेरे उस्ताद ने तुझे ये सिखाया?" उसने पूछा।
"नहीं काका," टिंकू ने कहा, बड़ी ईमानदारी से। "ये मैंने खुद सोचा। उस्ताद तो कहते हैं कि सबसे पहले आदमी को बैठाओ, फिर बात करो।"
बूढ़े ने समोसा लिया। खाया। और उसके बाद उसने लाठी ज़मीन पर टेक दी, जैसे कोई फ़ैसला कर दिया हो।
उसी वक़्त शबनम आपा बाहर आईं।
उनके हाथ में बड़ी केतली थी, दूसरे हाथ में स्टील के कपों की ट्रे। गुमटी का चूल्हा उस रात बंद था — उन्होंने खुद कहा था कि सच खुलने तक चाय नहीं बनेगी। पर फिर उन्होंने देखा कि भीड़ बढ़ रही है और डर बढ़ रहा है, और शबनम आपा से ये बर्दाश्त नहीं हुआ।
"सुनो सब," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ गली के मुँह तक गई। "मैं भूत-वूत नहीं जानती। मैं इतना जानती हूँ कि डर को भूखा मत रखो। डर को भूखा रखोगे तो वो और बड़ा होगा। चाय पियो। हाथ गरम करो। फिर बात करो।"
उन्होंने कप भरकर पहले उस औरत को दिया जिसकी गोद में बच्चा था। औरत ने पहले मना किया, फिर लिया। फिर उसका पति लिया। फिर वो बूढ़ा लिया, जिसने समोसा खाया था।
और धीरे-धीरे — बहुत धीरे-धीरे — उस भीड़ का शोर, जो पहले एक झोंके की तरह आ रहा था, कम होने लगा। चाय का काम नहीं था ये। हाथ में गरम कप का होना था। जब आदमी के हाथ में कुछ गरम होता है, तो उसकी आवाज़ अपने आप नरम हो जाती है। ये मेरी माँ कहती है। और माँ की बातें बाज़ार में नहीं बिकतीं, पर सच होती हैं।
मैं भीड़ के बीच से गुज़रा। मुझे किसी से बहस नहीं करनी थी। मुझे बस देखना था।
और तभी मैंने उसे देखा।
बरामदे के दाएँ कोने में, बेंच के पास, एक आदमी झुका हुआ था। चालीस-पैंतालीस का, हल्की दाढ़ी, पहनी हुई सस्ती सफ़ेद कमीज़ जिसकी एक बाँह पर पुराना पैबंद था। वो चुपचाप एक बोरी बाँध रहा था — उस बोरी में कुछ कपड़े थे, एक स्टील का गिलास, और दवा के दो पत्ते।
उसके हाथ काँप रहे थे।
इतने काँप रहे थे कि वो गाँठ ठीक से नहीं बाँध पा रहा था। दो बार गाँठ खुल गई। तीसरी बार उसने दाँत से खींचकर बाँधी।
मैं रुक गया।
क्योंकि उस आदमी के चेहरे पर डर नहीं था। डर तो उस औरत के चेहरे पर था जो गोद में बच्चा लिए खड़ी थी। इस आदमी के चेहरे पर कुछ और था। शर्म। जैसे वो कोई काम कर रहा हो जो उसे नहीं करना चाहिए और जो वो कर ही रहा है।
मैंने धीरे से पूछा, "भाई साहब, आपका मरीज़ कौन है?"
वो चौंका। बोरी पर हाथ रख दिया, जैसे उसे छिपाना चाहता हो।
"मेरी बेटी," उसने कहा।
"कौन सा बेड?"
"पाँचवाँ।"
मुझे याद आया। पाँचवें बेड पर नौ साल की एक बच्ची है जिसे पिछले हफ़्ते भर्ती किया गया था। डॉक्टर इसरानी ने कहा था कि उसका बुखार अब उतर रहा है, पर खून की जाँच बाकी है, और अगर दो दिन और रुक जाए तो बच जाएगी। मैंने उसे एक बार देखा था — पतली, बड़ी आँखें, और उसके सिरहाने एक पुरानी गुड़िया रखी थी जिसका एक हाथ टूटा था।
"आप उसे ले जा रहे हैं," मैंने कहा। सवाल नहीं, बस कह दिया।
उसने मेरी तरफ़ देखा। एक पल को लगा कि वो कुछ कहेगा।
फिर उसने कहा, "तुम अंकुश हो ना? साइकिल वाले?"
"हाँ।"
"मेरा नाम इलियास है।" उसने गाँठ फिर से खींची, ज़रूरत से ज़्यादा कसकर। "मैंने तुम्हारे बारे में सुना है। गली में सब कहते हैं कि तुम चीज़ें जोड़ते हो।"
"कोशिश करता हूँ," मैंने कहा।
"तो एक बात सुन लो।" उसने आवाज़ धीमी कर दी। "मैं डर के मारे नहीं जा रहा। मैं इसलिए जा रहा हूँ कि मेरी बीवी रात भर रो रही है। वो कहती है कि इस दीवार ने मेरी बच्ची का नाम लिया है। मैं उसे समझा नहीं सकता। और जब आदमी समझा न सके, तो वो हार मान लेता है। मैं हार गया हूँ भाई।"
उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था कि मैं कुछ देर बोल ही नहीं पाया।
फिर मैंने कहा, "आपकी बेटी का नाम क्या है?"
वो एक पल रुका।
"माही," उसने कहा।
और मुझे लगा कि उसने ये नाम उस तरह से लिया है, जैसे किसी बंद कमरे से कोई चीज़ बाहर निकाली जा रही हो, बहुत सँभालकर, कि कहीं गिर न जाए।
तभी डॉक्टर इसरानी की आवाज़ आई, और वो इतनी साफ़ थी कि भीड़ के पीछे खड़े लोग भी रुक गए।
"सुनो सब," उन्होंने कहा। "मैं तुम सबको एक बात साफ़ बता देता हूँ, और ये मैं डॉक्टर होने के नाते नहीं कह रहा, आदमी होने के नाते कह रहा हूँ।"
वो अपनी कुर्सी से उठ चुके थे। उनका सफ़ेद कोट टेढ़ा था, चश्मा नाक पर फिसला हुआ था, और उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो पचास साल की ड्यूटी के बाद आती है।
"इस अस्पताल में जो भी है — भूत, राख, दीवार पर लिखा नाम, जो भी है — वो रात में आता है और सुबह चला जाता है। पर तुम्हारा बच्चा, तुम्हारी माँ, तुम्हारी बेटी — उन्हें सुबह की ज़रूरत है। दवा की ज़रूरत है। ऑक्सीजन की ज़रूरत है। और अगर तुम आज रात उन्हें उठाकर ले जाओगे, तो मैं तुमसे एक बात कहूँगा, और बुरा मत मानना।"
उन्होंने रुककर सबको देखा।
"जो मरीज़ जान से ज़्यादा डर से मरता है, उसे कोई अस्पताल बचा नहीं सकता। कोई डॉक्टर नहीं बचा सकता। कोई दवा नहीं बचा सकती।"
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