The Mysterious Bell – Chapter 655
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
वो औरत — जिसकी गोद में बच्चा था — उसने पहले अपने पति की तरफ़ देखा, फिर डॉक्टर की तरफ़, फिर अपने बच्चे की तरफ़। और फिर उसने बच्चे को कसकर पकड़ लिया, पर इस बार जाने के लिए नहीं — रुकने के लिए।
कुछ लोग अभी भी बाहर जाने की सोच रहे थे। मैं उनके चेहरों पर देख सकता था — कुछ लोग गिन रहे थे कि कितने लोग जा रहे हैं और कितने रुक रहे हैं, क्योंकि भीड़ का फ़ैसला हमेशा गिनती से होता है, सच से नहीं।
मैं इलियास भाई की तरफ़ मुड़ा।
"भाई साहब," मैंने कहा, "एक बात पूछूँ?"
उसने बोरी उठा ली थी। हाथ में लटकी हुई।
"पूछो।"
"आपने अभी कहा कि आप डर के मारे नहीं जा रहे। क्या ये सच है?"
उसने मेरी आँखों में देखा।
और उस आदमी की आँखों में — जिसके हाथ अभी भी काँप रहे थे, जो बोरी उठाए खड़ा था, जिसकी बेटी पाँचवें बेड पर सो रही थी — मुझे कुछ दिखा।
डर नहीं।
कुछ और।
वो कुछ ऐसा था जो बोलने से पहले हाथ कँपाता है। जो आदमी को रात में जगाता है और दिन में चुप करा देता है। जो उसे मजबूर करता है कि वो ये सब करे — बोरी बाँधे, बेटी को उठाए, और ये कहे कि मैं डर के मारे नहीं जा रहा।
मैंने एक कदम पीछे हटकर उसकी कमीज़ की जेब की तरफ़ देखा। एक काग़ज़ का कोना बाहर निकला हुआ था — पीला, मोड़ा हुआ, और उस पर कुछ नीली स्याही की लकीर।
वो काग़ज़ किसी भी लिस्ट जैसा नहीं लग रहा था। वो किसी हाथ से लिखी चिट्ठी जैसा लग रहा था। और उस कोने पर — हल्का सा, बहुत हल्का — एक गोल निशान था।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और घंटी को मसला। उसकी गरमी मेरी हथेली में फैल गई।
फिर मैंने धीरे से, सिर्फ़ अपने लिए, कहा — ना घंटी से, ना मीरा से, ना डॉक्टर से। बस अपने आप से।
"यहाँ कोई सिर्फ़ डरा हुआ नहीं है। कोई चुपचाप कुछ छिपा भी रहा है।"
और ठीक उसी वक़्त मेरी उँगलियों के नीचे घंटी ने एक छोटी, ठंडी आवाज़ की।
जैसे किसी ने दूर से, बहुत दूर से, हाँ कहा हो।
॥
भीड़ का शोर पानी की तरह बह रहा था — किसी की खाँसी, किसी का बच्चा, किसी की चप्पल का घिसटना। पर उस शोर के नीचे एक और आवाज़ थी, बहुत पतली, जो सिर्फ़ मेरे कान सुन रहे थे। घंटी की आवाज़। ठंडी। दूर से आती हुई, जैसे कोई खिड़की से झाँककर हाँ कह रहा हो।
मैंने हाथ जेब से बाहर निकाला और इलियास भाई के चेहरे को देखा।
वो अब भी वहीं खड़े थे। कंधे पर बोरी, हाथों में वो कँपकँपी, और आँखों में वो चीज़ जो डर से ज़्यादा थकान जैसी थी। जैसे कोई आदमी रात भर किसी गड्ढे को ढकने की कोशिश करता रहे और सुबह पता चले कि गड्ढा और बड़ा हो गया है।
"भाई साहब," मैंने धीरे से कहा, "ज़रा इधर आइए। दो मिनट।"
वो नहीं हिले।
"मेरी बच्ची अंदर है," उन्होंने कहा।
"मुझे पता है," मैंने कहा। "और इसीलिए यह बात बाहर नहीं, वहाँ होगी जहाँ सिर्फ़ हम दो होंगे। बस दो मिनट।"
कुछ देर वो मेरी तरफ़ ऐसे देखते रहे जैसे तय कर रहे हों कि मैं आदमी हूँ या सिर्फ़ एक और बात करने वाला लड़का।
फिर उन्होंने बोरी कंधे से उतारी, ज़मीन पर रखी, और धीरे से गरदन हिलाई।
मैं अस्पताल की पिछली दीवार के साथ-साथ चला और वो मेरे पीछे चले। दस कदम पर वही नीम का पेड़ था जिसकी छाया में वो मोटा पान चबाने वाला आदमी खड़ा था, उस रात जब वह अपना नाम नहीं बता रहा था। पेड़ की जड़ पर पान की पीक का पुराना दाग अभी भी था, जैसे ज़मीन ने उसे धोना ही छोड़ दिया हो।
मैं वहाँ रुका। दीवार से दस कदम दूर, भीड़ की आवाज़ इतनी धीमी कि उसके बीच से भी एक आदमी की साँस अलग सुनाई दे।
"भाई साहब," मैंने कहा, "अभी आपने बरामदे में कहा कि आप डर के मारे नहीं जा रहे।"
"हाँ कहा।"
"मुझे आपसे एक ही सवाल पूछना है और सच का जवाब चाहिए, क्योंकि आपके हाथों में एक काग़ज़ है जो मुझे सही नहीं लग रहा।" मैंने उनकी जेब की तरफ़ देखा। "उस काग़ज़ पर जो गोल निशान है… वो महीने के आख़िर में किसी तरह गिरने के काम आएगा क्या? या वो पहले से गिरा हुआ है?"
इलियास भाई ने अपनी जेब की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। उनका हाथ खुद-ब-खुद जेब पर चला गया, जैसे कोई कोई चीज़ छिपाने की कोशिश करता हो, और फिर वो हाथ वहीं का वहीं रुक गया — न जेब के अंदर, न बाहर।
"ये हिसाब का काग़ज़ है," उन्होंने कहा।
"हिसाब का काग़ज़ आदमी की जेब में मुड़ा हुआ नहीं रहता, भाई साहब," मैंने कहा। "वो दुकान में गल्ले के नीचे रहता है। जेब में वो काग़ज़ रहता है जिसे आप किसी को दिखा नहीं सकते।"
उनकी साँस अटकी।
और उसी अटके हुए पल में मैंने अपना हाथ जेब में डाला और घंटी पकड़ ली।
तुम सोच रहे होगे कि बस एक काग़ज़ का कौना है, इतनी जल्दी क्या है। तो सुनो — मेरे पास ऐसे सवालों का इंतज़ार करने का वक़्त नहीं था। अगर वो आदमी इलियास भाई की जेब के ज़रिए अस्पताल के अंदर घुस आया है, तो उसका मतलब यह है कि आज रात कुछ होने वाला है। और मैं इस बार पहले जानना चाहता था।
मैंने घंटी को हथेली में मसला और धीरे से कहा, जैसे कोई दुकानदार अपने ही खाते की तरफ़ देखकर बड़बड़ाता है, "सुन, मुझे चालीस अंक वाली चीज़ चाहिए। छिपा दर्द।"
पहले कुछ नहीं हुआ।
फिर घंटी की गरमी मेरी हथेली से निकलकर कलाई तक गई और वहीं घूमकर एक तार की तरह ऊपर चढ़ी।
"बोलने से पहले तोल," घंटी ने कहा। इतना ही। छोटा, रूखा।
"तोल लिया," मैंने कहा। "चालीस अंक। उतर जाएँ।"
"एक सौ अठ्ठावन में से चालीस," घंटी ने कहा। "एक सौ अठारह बचे। और ये तेरा काम नहीं है, ये तेरा रास्ता है। याद रख — दर्द देखना, दर्द ठीक करना नहीं होता।"
"पता है," मैंने कहा।
"नहीं पता," घंटी ने कहा।
और फिर वो चुप हो गई, और अंधेरा मेरी आँखों के सामने एक झटके से बदल गया।
मैं अब नीम के नीचे नहीं था।
मैं अस्पताल की पिछली गली में था — वही सूखी नाली, वही टूटी बाउंड्री, वही लोहे का फाटक जो रात को किसी ने खुला छोड़ दिया था। दिन का वक़्त था या शाम का, पता नहीं। धूप पीली थी, इतनी पीली कि दीवारें भी पीली लग रही थीं।
इलियास भाई वहाँ खड़े थे। कंधे झुके हुए, हाथ जोड़े हुए, बोरी पैरों के पास पड़ी थी।
और उनके सामने वो आदमी था।
सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद जूते, और बाईं कलाई पर एक फीका धागा। चेहरा मुझे साफ़ नहीं दिख रहा था — जैसे कोई तस्वीर में से चेहरा मिटाने की कोशिश कर रहा हो। पर आवाज़ साफ़ थी। बहुत साफ़। और उस आवाज़ में वो मिठास थी जो डर को सबसे ज़्यादा डराती है — क्योंकि डर जब चीखता है तो आदमी बच निकलता है, पर जब वो मुस्कुराकर बोलता है, तब आदमी खुद ही अपनी बोरी बाँध लेता है।
"इलियास भाई," उसने कहा, "आप बहुत सीधे आदमी हैं। सीधे लोगों को कुछ नहीं देना पड़ता, बस मौन रहना पड़ता है।"
"मेरी बेटी अंदर है," इलियास भाई ने कहा। आवाज़ रुँधी हुई।
"आपकी बेटी अंदर है, और इसीलिए आपकी जगह मेरे दिल में बहुत बड़ी है," आदमी ने कहा। "आज रात इस अस्पताल में आग लगेगी। पुरानी इमारत है, तारें पुरानी हैं, क्या पता कहाँ से निकले। और आग जब लगती है तो पहले वही जाते हैं जो ऊपर के कमरों में दवा के साथ सोते हैं।"
मैंने देखा — इलियास भाई का पूरा शरीर काँपा। एक झटके में।
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