The Mysterious Bell – Chapter 653
"ये बिटिया ठीक कह रही है," उन्होंने कहा। "मैं पचास साल से ठीक यही कह रही हूँ, बस मुझे कोई सुनने वाला नहीं मिला। रिकॉर्ड कर, बिटिया। रिकॉर्ड कर। अब मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। मैं सत्तर की हूँ, मुझे नौकरी नहीं बचानी, न घर, न नाम।"
मीरा ने अपना कैमरा निकाल लिया।
और ठीक उसी पल, उसके फोन की स्क्रीन अपने आप जल उठी।
मीरा ने फोन देखा, और उसका चेहरा एक पल में बदल गया।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"मैंने कुछ किया नहीं," उसने कहा। "मैंने… मैंने छुआ भी नहीं।"
स्क्रीन पर एक लाल बिंदु जल रहा था, और उसके नीचे छोटे अक्षरों में वही चल रहा था जो इस वक़्त हमारे सामने चल रहा था — पीली दीवार, बरामदे का पत्थर, रामकली दाई का झुका हुआ कंधा, डॉक्टर इसरानी का सफ़ेद चेहरा।
"मीरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ खुद मुझे दूर से आती सुनाई दी, "ये सीधा प्रसारण है।"
"मैंने शुरू नहीं किया," उसने कहा। उसकी उँगलियाँ स्क्रीन पर दौड़ रही थीं। "मैं इसे बंद कर रही हूँ।"
वो बंद नहीं हुआ।
और स्क्रीन के नीचे, जहाँ लोग अपनी बात लिखते हैं, वहाँ लिखा आना शुरू हो गया।
पहले एक लाइन आई — "ये नूर अस्पताल है ना?"
फिर दूसरी — "ये वही अस्पताल है जहाँ कल रात कुछ जला था।"
फिर तीसरी — "मेरी बुआ के बेटे ने बताया कि वहाँ कोई बोलता है रात में।"
फिर चौथी — "भूत है वहाँ। मेरी दीदी ने कहा था।"
और फिर लाइनें ऐसी आईं जैसे बाँध टूट गया हो।
"अस्पताल में भूत है, इसलिए मरीज़ निकाल लो।"
"मेरी अम्मी को वहाँ भर्ती मत कराओ।"
"वो डॉक्टर भी मिला हुआ है।"
"अस्पताल बंद करो।"
"दीवार पर नाम लिखा है, मतलब वहाँ कुछ गड़बड़ है।"
"बच्चों को मत भेजो वहाँ।"
मीरा ने स्क्रीन देखते हुए धीरे से कहा, "ये मेरे दर्शक नहीं हैं।"
"क्या?"
"मेरे चैनल पर इतने लोग एक साथ नहीं आते," उसने कहा। "ये मेरे दर्शक नहीं हैं। ये… ये कहीं और से आ रहे हैं।"
मैंने स्क्रीन के ऊपर देखा। ऊपर एक नाम लिखा था — वो कोई नाम नहीं था जिसे मैं जानता हूँ। बस एक चिह्न था। एक मुड़ी हुई लकीर, और बीच में एक बिंदु।
"मीरा," मैंने कहा। "ये चिह्न तो…"
वो मेरी तरफ़ देखने लगी।
"हाँ," उसने कहा। "बबलू ने यही चिह्न घंटी के छल्ले पर देखा था।"
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। वो इतनी गरम थी कि हथेली जलने लगी थी, पर मैंने उसे नहीं छोड़ा।
रामकली दाई ने स्क्रीन की तरफ़ देखा और उनकी आँखें सिकुड़ गईं।
"ये लोग क्या कह रहे हैं?" उन्होंने पूछा।
"दाई माँ," मैंने कहा, धीरे से, "ये लोग कह रहे हैं कि इस अस्पताल में भूत है।"
रामकली दाई ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर मीरा की तरफ़, फिर उस स्क्रीन की तरफ़ जिसमें हमारा ही बरामदा चल रहा था।
और फिर उन्होंने वो कहा जो मुझे आज तक नहीं भूलना चाहिए।
"भूत?" उन्होंने कहा। "बेटा, भूत तो वो है जो पचास साल से ज़िंदा लोगों के बीच बैठा है। और वो आज सुबह इस दीवार के सामने चौबीस घंटे में खड़ा होगा।"
मैंने घंटी को कसकर दबाया।
"अंकुश," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो वो कभी नहीं दिखाती, "ये प्रसारण रुक नहीं रहा। ये बढ़ रहा है। और जो लिख रहे हैं, उनमें से आधे लोग ये भी कह रहे हैं कि वो अस्पताल के बाहर जमा हो रहे हैं।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
दीवार के बाहर, गली में, दूर किसी ने चिल्लाकर कुछ कहा। फिर दूसरी आवाज़ आई। फिर तीसरी।
और मेरी जेब में घंटी ने इतना ही कहा:
"अब वो सबको बुला रहा है। तेरे नाम से।"
मैंने एक बार पीछे देखा — डॉक्टर इसरानी अपनी कुर्सी से उठ रहे थे, पापा दरवाज़े की चौखट छोड़कर मेरी तरफ़ बढ़ रहे थे, काजल के हाथ से दवा की थैली फर्श पर गिर गई थी, और रामकली दाई अपनी साड़ी का पल्लू सीने पर कसकर दबाए बैठी थीं, जैसे वो अपने पचास साल के सन्नाटे को अब और नहीं ढो पा रहीं।
और बाहर, गली की तरफ़ से, कई पैरों की आवाज़ आने लगी।
धीमी नहीं। तेज़।
जैसे कोई पूरी बस्ती, भूत ढूँढने निकल पड़ी हो — और अभी उसे ये नहीं पता कि असली भूत कहाँ बैठा है।
॥
गली के मुँह से आती आवाज़ें पहले धुँधली थीं। फिर साफ़ हो गईं।
पहले जूतों की आवाज़। फिर लाठी के ठोकने की। फिर किसी औरत की तेज़ आवाज़ — "मेरा बच्चा अंदर है, मुझे जाने दो।"
मैं बरामदे से बाहर निकला। पीछे मीरा का फोन अभी भी चल रहा था। स्क्रीन पर वही मुड़ी लकीर और बीच में बिंदु, और नीचे लाइनें आ रही थीं, एक के बाद एक, जैसे कोई कुएँ में पत्थर फेंक रहा हो और गिनती नहीं कर रहा हो।
अस्पताल का गेट खुला था। बाहर, गली में, तीस-चालीस लोग खड़े थे। कुछ के हाथ में मोबाइल की बत्ती जल रही थी, कुछ के हाथ में लाठी। एक आदमी के हाथ में ईंट थी। मैंने वो ईंट देखी और मेरे पेट में कुछ ठंडा सा हो गया।
उस्ताद अली बक्श मेरे ठीक पीछे आकर खड़े हो गए। उनका मोटा चश्मा उतरा हुआ था। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और धीरे से कहा, "अंकुश, भीड़ को हाथ नहीं लगाना। भीड़ को बात देना।"
आगे एक औरत थी। पैंतीस के आसपास। सिर पर सूती दुपट्टा, गोद में छोटा बच्चा, जिसका सिर उसके कंधे पर टिका था। उसकी साँस सुनाई दे रही थी — छोटी, तेज़, घरघराहट वाली।
"मेरा बच्चा अंदर है," उसने कहा। मेरी तरफ़ नहीं देखा, सीधे डॉक्टर इसरानी की तरफ़ देखा, जो मेरे पीछे आ चुके थे। "मैं अभी ले जाऊँगी। रात भर यहाँ नहीं रहेगा।"
डॉक्टर इसरानी ने हाथ उठाया। पुराना हाथ, जिसमें स्टेथोस्कोप की नली लिपटी थी।
"बहन," उन्होंने कहा, "बच्चे को निमोनिया है। बुखार अभी उतरा है। अगर आप उसे रात में हिलाएँगी—"
"मुझे भूत से ज़्यादा निमोनिया प्यारा है?" उसने कहा। "डॉक्टर साहब, आप मुझे भूत वाले अस्पताल में अपना बच्चा रखने को कह रहे हैं? चाहे कुछ भी हो जाए, मैं इसे आज रात ले जाऊँगी।"
उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। डर था।
गुस्सा उसके पीछे खड़े आदमी की आवाज़ में था — उसका पति, जो पैंतालीस के आसपास, दुबला, हाथ में बंद मुट्ठी — और जो एक ही बात दोहरा रहा था। "हमने सुना है। वीडियो में देखा है। वहाँ कुछ है। हमारा बच्चा नहीं रहेगा इस जगह।"
मैंने देखा कि डॉक्टर इसरानी की गर्दन सख्त हो गई। उन्होंने एक गहरी साँस ली, फिर पीछे मुड़कर मीरा को देखा।
मीरा बरामदे के भीतर खड़ी थी। उसके हाथ में फोन था, जो अब भी चल रहा था। उसका चेहरा उस रोशनी में नीला-सफ़ेद लग रहा था।
"तुमने ये किया," डॉक्टर इसरानी ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वो चीज़ थी जो पचास साल की चुप्पी के बाद निकलती है। "तुमने बिना सोचे कैमरा चालू किया। तुम्हें पता था कि यहाँ क्या चल रहा है। तुम्हें पता था कि इस गली में डर बैठा है। और तुमने वो डर, अपने ही हाथों से, पूरे शहर के सामने खोल दिया।"
मीरा ने कुछ कहना चाहा।
"अभी मत बोलो," डॉक्टर ने कहा। "पहले मरीज़ बचेंगे, फिर बात होगी।"
और मीरा — मीरा तिवारी, जिसकी ज़ुबान मेरी ज़ुबान से भी तेज़ चलती है, जो हर बात का जवाब दो सेकंड में दे देती है, जो शबनम आपा से भी नहीं डरती — वो चुप हो गई।
एकदम चुप। जैसे किसी ने उसका स्विच बंद कर दिया हो।
मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुझे लगा कि मैंने उसे पहली बार सच में अकेला देखा है।
उसने फोन अपनी जेब में डाला, पर स्क्रीन की रोशनी उसकी जेब से बाहर आ रही थी, जैसे अंदर कोई जुगनू बंद कर दिया गया हो और वो बाहर निकलने के लिए टकरा रहा हो।
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