The Mysterious Bell – Chapter 647
"भाई, मैं पढ़ा-लिखा आदमी नहीं हूँ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मुझे चुप करा गया। "पर बत्तीस साल में एक बात सीखी है। काग़ज़ जलता है तो चुप नहीं रहता। वो चीख़ता है। हर पन्ना अपनी आवाज़ में चीख़ता है। और जब ढेर सारे पन्ने एक साथ जलते हैं, तो उनकी चीख़ बच्चों के रोने जैसी लगती है। मैंने वो सुना है। उस रात सुना था, अस्पताल के पीछे।"
पापा ने उनकी तरफ़ देखा।
"आप भी वहाँ थे?" पापा ने पूछा।
बंसीलाल ने उन्हें देखा, और कुछ देर तक कुछ नहीं कहा।
"मैं फाटक पर था," उन्होंने कहा। "अंदर नहीं गया।"
और फिर उन्होंने अपनी नज़र ज़मीन पर गिरा दी, और मैंने देखा कि उनकी उँगलियाँ उस चाबी को इतनी ज़ोर से दबा रही थीं कि उनके नाखून सफ़ेद हो गए थे।
मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था।
नहीं — मुझे यक़ीन हो रहा था, और यही सबसे बुरी बात थी। मुझे यक़ीन हो रहा था कि बंसीलाल झूठ नहीं बोल रहे थे। और मुझे यह भी यक़ीन हो रहा था कि जो आवाज़ मैंने सुनी, वो सिर्फ़ काग़ज़ों की नहीं थी। काग़ज़ों की आवाज़ मुझे पहले भी सुनाई दी थी — और उसमें एक शब्द नहीं होता।
उसमें मेरा नाम नहीं होता।
"नहीं," मैंने कहा।
"अंकुश—"
"नहीं, बंसीलाल भाई।" मैंने उनकी तरफ़ मुड़कर कहा। मेरी आवाज़ शांत थी, और मुझे पता था कि यह शांति मेरे अंदर के उस डर से आ रही थी जिसे मैं किसी को नहीं दिखाता। "काग़ज़ आपका नाम नहीं लेता। काग़ज़ किसी को नहीं बुलाता। मुझे ठीक से सुनाई दिया था। उसने मेरा पूरा नाम लिया। और मेरा नाम इस ढक्कन पर खुरचा हुआ है — नई खुरचाई में। मैं इस टैंक के अंदर पहले कभी नहीं आया। मैंने ये बक्सा पहले कभी नहीं छुआ।"
"तो फिर?"
"तो फिर कोई है," मैंने कहा। "जो जले काग़ज़ों से बोलता है।"
हवा फिर चली — छत पर, ऊपर से, धीमी — और मुझे लगा जैसे किसी ने मेरी बात सुन ली हो और मुस्कुरा दिया हो।
टिंकू मेरे बगल में खड़ा था, और उसने बहुत धीरे से कहा, "उस्ताद, मुझे डर लग रहा है।"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"अच्छा है," मैंने कहा। "डर बुरी चीज़ नहीं है। जो बिल्कुल नहीं डरता, वो या झूठ बोलता है या बेवकूफ़ है। तू दोनों नहीं है, इसलिए डर। बस डर के साथ चलते रहना।"
"कहाँ?"
"अभी तय नहीं।" मैंने बक्सा उठाया और अपनी जेब में रख लिया। "पहले ये बताना है कि यहाँ से क्या निकला।"
मैंने फिर टैंक के अंदर रोशनी डाली। इस बार और नीचे। दीवार पर चिपकी जली परतों के बीच, कुछ जगहों पर, मुझे पतली लकीरें दिखीं — सीधी, समानांतर, हाथ से खींची हुई। जैसे किसी ने दीवार पर कोई लिखा हुआ पढ़ा हो और अपनी उँगली से उन लाइनों के नीचे से गुज़रा हो।
"पापा," मैंने कहा। "यहाँ कुछ लिखा हुआ है। दीवार पर।"
पापा आगे आए और उन्होंने झाँका। फिर बहुत देर तक वो ऐसे ही झुके रहे, और मैंने देखा कि उनकी पीठ की माँसपेशियाँ कसी हुई थीं।
"पढ़ नहीं सकता," उन्होंने कहा। "जला हुआ है।"
"कुछ तो दिख रहा है?"
"एक शब्द।" वो सीधे खड़े हुए। "बस एक शब्द साफ़ है।"
"कौन सा?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"'यादव'।"
मेरे हाथ से टॉर्च फिसलकर टैंक के किनारे पर लगी और फिर सीधी हो गई।
यादव।
मेरा नाम।
मेरा पूरा नाम।
टैंक के ढक्कन पर, टैंक की दीवार पर, और टैंक के अंदर रखे बक्से पर भी।
और मैंने — उस पल, उस ठंडी छत पर, अपने पापा और एक डरे हुए बच्चे और एक बूढ़े चौकीदार के सामने — महसूस किया कि मेरा डर अब सिर्फ़ मेरा नहीं रहा। कुछ बाहर से आ रहा था, और वो मुझे नाम से जानता था।
मैंने गहरी साँस ली, और खुद को अंदर से वो बात कही जो मैं हर बार कहता हूँ — चीज़ें टूटती हैं तो यह मत सोच कि तू ही टूटा है।
"अंकुश।" पापा की आवाज़।
"हाँ?"
"नीचे देख।"
मैंने नीचे देखा — स्कूल के आँगन में। पीली रोशनी में उस्ताद सीढ़ी के पास बैठे थे, दीया उनके सामने जल रहा था। और मीरा गेट पर खड़ी थी, कैमरा उठाए, ऊपर देखती हुई।
मैंने हाथ हिलाया कि सब ठीक है। मीरा ने हाथ नहीं हिलाया। उसने बस कैमरा सीधा किया, जैसे रिकॉर्ड कर रही हो कि मैं झूठ बोल रहा हूँ।
"अंकुश," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो मुझे तुरंत रुकने पर मजबूर करती है।
"क्या?"
"ये देखो।" उसने मेरी जेब से बक्सा निकाला — मेरी इजाज़त के बिना, और उस वक़्त मुझे उस पर गुस्सा नहीं आया — और उसे उलटा करके रोशनी के सामने रख दिया। "ढक्कन के अंदर जो नाम है…"
"हाँ?"
"वो ऊपर से खुरचा है।" उसने उँगली घुमाई। "पर नीचे, इसी जगह, पुराना कुछ और भी है।"
मैंने झुककर देखा।
नई खुरचाई के ठीक नीचे, ज़ंग के नीचे, मुझे कुछ लकीरें दिखीं। बहुत पुरानी। लगभग मिट चुकी।
"दादा की पट्टी," मैंने फुसफुसाकर कहा।
क्योंकि वो लकीरें मुझे जानी-पहचानी लगी थीं। वो वैसी ही थीं जैसी मुझे उस पीतल की टूटी पट्टी पर मिली थीं जो गड्ढे से निकली थी और जिस पर जगदीश यादव और साइकिल खुदा था।
"उस्ताद," बंसीलाल ने कहा, और उनकी आवाज़ अब टूट रही थी, "मैं नीचे जा रहा हूँ।"
"बंसीलाल भाई—"
"मैं बत्तीस साल इस जगह पर हूँ।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में पानी था — वो पानी नहीं जो डर से आता है, वो पानी जो शर्म से आता है। "आज तक मैंने किसी से ये नहीं कहा कि उस रात मैंने उन काग़ज़ों को जलते देखा था और चुप रहा। आज तक मैंने ये नहीं कहा कि मैं फाटक पर खड़ा था और मैंने अंदर नहीं जाकर अपनी नौकरी बचाई।"
"बंसीलाल भाई, रुकिए—"
"मैं नीचे जा रहा हूँ," उन्होंने कहा। "नीचे उस्ताद के पास। अगर मुझे कुछ हो, तो उन्हें बता देना कि मैंने कह दिया था।"
और वो सीढ़ी की तरफ़ मुड़ गए।
मैं उन्हें रोकता, उससे पहले मेरी जेब में फोन बजा।
नहीं — काँपा।
क्योंकि पहले वो काँपा, फिर बजा। और वो काँपना, उस छत पर, उस टैंक के सामने, किसी और चीज़ जैसा लगा।
मैंने निकाला। स्क्रीन पर नाम था — काजल।
मैंने उठाया।
"काजल?"
पहले मुझे सिर्फ़ साँस सुनाई दी। फटी हुई, तेज़, बेकाबू साँस। जैसे कोई भागकर आया हो और अब बोल नहीं पा रहा हो।
"काजल, बोल—"
"भैया—"
उसकी आवाज़ में जो था, वो मैंने पहले कभी नहीं सुना था। काजल रोती है, काजल चिल्लाती है, काजल गुस्सा करती है — पर काजल की आवाज़ में कभी ऐसा डर नहीं आया था। ऐसा डर जिसमें आदमी बच्चा बन जाता है।
"क्या हुआ? माँ ठीक है?"
"माँ ठीक है," उसने कहा, और फिर उसकी आवाज़ टूट गई। "माँ ठीक है, भैया, पर—"
"पर क्या?"
"अस्पताल की दीवार पर…"
मेरी छाती में कुछ जम गया।
"कौन सी दीवार?"
"पिछली। वो पीली वाली। जहाँ कालिख से लिखा था—'जोड़ना बंद करो'।"
"हाँ—"
"भैया, आज फिर लिखा है।"
मैंने आँखें बंद कर लीं। टैंक की गंध, जला काग़ज़, ज़ंग, और अब यह।
"क्या लिखा है?"
काजल ने कुछ कहना चाहा, पर उसकी आवाज़ फँस गई। फिर मुझे सुना कि वो फोन से दूर हटी, और फिर वापस आई, और उसकी आवाज़ अब बहुत धीमी थी, जैसे वो किसी के सुनने के डर से फुसफुसा रही हो।
"वहाँ नारा नहीं है, भैया।" उसने कहा। "दीवार पर एक नाम लिखा है। बड़े-बड़े अक्षरों में। कालिख से।"
"किसका नाम?"
और फिर वो रो पड़ी — वो रोना जिसमें शब्द नहीं होते, सिर्फ़ आवाज़ होती है — और उस रोने के बीच उसने कहा:
"तेरा, भैया। तेरा नाम। कालिख से। पूरा नाम।"
और फिर उसने कुछ और कहा। बहुत धीमे। इतना धीमे कि मुझे फोन कान से चिपकाना पड़ा।
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