The Mysterious Bell – Chapter 648
"और भैया… नाम के नीचे एक लाइन है। जो कल सुबह के लिए है।"
मैंने पूछा, "क्या लिखा है?"
काजल ने कहा, "लिखा है — सुबह सात बजे, दीवार के साथ ये नाम भी गिरेगा।"
मैंने फोन धीमे से नीचे किया।
टैंक के अंदर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। छत पर सिर्फ़ हवा थी। और उस हवा में, नीचे से, मीरा की आवाज़ आई — "अंकुश! नीचे आ!"
मैंने अपनी हथेली में घंटी को कसा।
वो अब भी गरम थी।
और उसने, बहुत धीरे से, इतना ही कहा:
"अब वो नाम जानता है।"
॥
"नीचे आ!"
मीरा की आवाज़ दूसरी बार आई, इस बार और तेज़, और उसमें वो चीख नहीं थी जो डर से आती है — उसमें वो ज़िद थी जो कहती है कि अब बस, नीचे आ जाओ।
मैंने टैंक की तरफ़ आख़िरी बार देखा। ढक्कन अब हिल नहीं रहा था। खुरचने की आवाज़ भी बंद हो चुकी थी। जैसे किसी ने अंदर से कान टेककर सुन लिया हो कि ऊपर भी कोई सुन रहा है, और फिर अपना हाथ रोक लिया हो।
मैं सीढ़ी की तरफ़ बढ़ा। पापा मेरे पीछे आए, उनका हाथ मेरे कंधे पर था, और उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं — पर हटी नहीं।
"क्या हुआ?" उन्होंने पूछा।
"काजल का फोन था," मैंने कहा। "अस्पताल की पिछली दीवार पर।"
पापा रुक गए। फिर उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस सीढ़ी उतरने लगे।
टिंकू पीछे-पीछे आ रहा था, उसकी टॉर्च की रोशनी सीढ़ियों पर काँप रही थी। बंसीलाल सबसे आगे थे, और उनकी चाल में जो था, वो बुढ़ापे की चाल नहीं थी — वो किसी का कर्ज़ उतारने वाली चाल थी।
नीचे आँगन में उस्ताद बैठे थे, पीतल का दीया उनके आगे जल रहा था। दीये की लौ सीधी थी, हवा नहीं थी, और फिर भी मुझे लगा कि वो काँप रही है।
"देख लिया?" उस्ताद ने पूछा, बिना ऊपर देखे।
"अभी नहीं देखा," मैंने कहा। "देखने जा रहा हूँ।"
उस्ताद ने दीया उठाया और खड़े हो गए।
"चलो," उन्होंने कहा। "रात में दीवार देखना ठीक नहीं, पर जिस दीवार पर तेरा नाम लिखा हो, उसे सुबह तक अकेला नहीं छोड़ते।"
हम पाँच लोग अस्पताल की पिछली तरफ़ चले — मैं, पापा, उस्ताद, टिंकू और बंसीलाल। मीरा आगे-आगे थी, उसका कैमरा बंद था, पर हाथ में वो कसा हुआ था, जैसे कोई हथियार पकड़ा हो।
पीछे की गली में अंधेरा मोटा था। सिर्फ़ दीये की लौ और टिंकू की टॉर्च। दीवार दूर से काली दिख रही थी, फिर पास गए, और टॉर्च की रोशनी दीवार पर पड़ी।
पहले मुझे लगा कि दीवार पर कुछ लिखा ही नहीं है। बस काला धब्बा है। फिर रोशनी सरकी, और अक्षर उभरने लगे।
बड़े अक्षर। कोई जल्दी में नहीं लिखे गए। हर अक्षर अलग-अलग, जैसे लिखने वाले ने एक-एक अक्षर लिखकर रुककर देखा हो कि ठीक बन रहा है या नहीं।
अंकुश यादव।
मेरा पूरा नाम।
और उसके नीचे, छोटे अक्षरों में, एक लाइन।
"पढ़ो," बंसीलाल ने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी।
टिंकू ने टॉर्च सीधी की। मैंने पढ़ा।
सुबह सात बजे, दीवार के साथ ये नाम भी गिरेगा।
कोई कुछ नहीं बोला। दीये की लौ हिली, और उस हिलने में मुझे अपनी साँस सुनाई दी।
"मिटा दो," टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ बच्चों जैसी थी, और मुझे पता था कि वो अब भी बच्चा ही है। "उस्ताद, इसे मिटा दो ना। पानी डालकर—"
"ये स्याही नहीं है," उस्ताद ने कहा, और उन्होंने दीया दीवार के और पास किया। "देख।"
लौ के पास जाते ही दीवार से एक गंध उठी। ऐसी गंध मैंने सुबह टैंक में सूँघी थी, और पापा ने कहा था कि यह जले काग़ज़ की गंध है।
उस्ताद ने उँगली आगे की। मैंने हाथ बढ़ाकर उन्हें रोका।
"मत छुओ," मैंने कहा।
"छूना ज़रूरी है," उन्होंने कहा, और उँगली दीवार पर लगा दी।
उँगली निकली, और उस पर कुछ भी नहीं लगा। कोई स्याही नहीं, कोई कालिख नहीं। सिर्फ़ हल्की राख, जो उन्होंने मेरी हथेली पर झाड़ दी।
"देख," उन्होंने कहा। "काग़ज़ नहीं जला, सिर्फ़ शब्द जले हैं।"
"इसका क्या मतलब है?"
"मतलब ये कि जिसने लिखा, उसने पहले काग़ज़ पर लिखा, फिर उसे जलाया, और जली राख को दीवार पर मला।" उस्ताद ने दीया नीचे किया। "ये नाम दीवार पर लिखा नहीं गया। ये नाम दीवार पर जला गया है।"
मेरे पीछे पापा ने एक लंबी साँस ली, जैसे किसी ने उनके सीने से हवा खींच ली हो।
"पापा?"
"मैंने ये काम देखा है," उन्होंने कहा, बहुत धीमे। "पाँच साल पहले। उसी काग़ज़ पर।"
"कौन सा काग़ज़?"
वो नहीं बोले। बस दीवार देखते रहे, जैसे दीवार से कोई जवाब माँग रहे हों।
"बंसीलाल भाई," मीरा ने कहा। "आप रातभर यहीं रुकिए। कुछ भी हो, कोई इस दीवार को छुएगा नहीं, मिटाएगा नहीं। सुबह पूरी गली के सामने यही दीवार खुलेगी।"
बंसीलाल ने सिर हिलाया। फिर वो धीरे से दीवार के सामने ज़मीन पर बैठ गए, जैसे कोई बूढ़ा अपने बेटे की कब्र पर बैठता है।
मैं उनके पास बैठ गया। मेरी जेब में घंटी ठंडी थी, और ठंडी घंटी पहले से भी ज़्यादा डरावनी लगती है।
"बंसीलाल भाई," मैंने कहा, "आज रात कुछ और होगा?"
उन्होंने दीवार देखते हुए कहा, "जो नाम जानता है, वो सिर्फ़ नाम नहीं जानता। वो ये भी जानता है कि तू सुबह कहाँ होगा।"
और उस रात, उस दीवार के सामने, मैंने पहली बार सोचा कि अगर मेरा नाम किसी काग़ज़ पर दर्ज है, तो उसे मिटाने के लिए मुझे मरना नहीं पड़ेगा — मुझे बस वो काग़ज़ ढूँढना पड़ेगा।
सुबह गली में आवाज़ नहीं थी।
ये बात आपको छोटी लगेगी। गली में आवाज़ न होना क्या बड़ी बात है? पर साइकिलों की गली में सुबह का मतलब ही आवाज़ है। भोला भाई का शटर उठाते वक़्त गिरना, नसीमा बाई की दाल की बोरी खिसकना, हबीब चाचा का थूककर हैंडपंप चलाना, बच्चों की चप्पलें, और सबसे ऊपर — शबनम आपा की गुमटी से आती चाय की केतली की सीटी।
उस सुबह वो सीटी नहीं बजी।
मैं छह बजे उठा, मुँह धोया, और दुकान का शटर खोलकर बाहर आया। गली खाली थी। पीपल के नीचे चबूतरी खाली थी। बुज़ुर्ग नहीं आए थे। पक्षी थे, वो भी चुप थे, या मुझे चुप लग रहे थे।
मैं गुमटी की तरफ़ गया। शबनम आपा खड़ी थीं, केतली उनके हाथ में थी, चूल्हा जल रहा था, और वो किसी को चाय नहीं डाल रही थीं।
"आपा?"
"सुबह से कोई नहीं आया," उन्होंने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे। "छह बजे चूल्हा जलाया। अब सात का टाइम है। एक भी नहीं आया। और मैं जानती हूँ क्यों नहीं आया।"
"क्यों?"
"क्योंकि सबने दीवार देख ली है," उन्होंने कहा, और फिर मेरी तरफ़ देखा। "तूने देखी है?"
"मैं रात में देखकर आया हूँ।"
"तो तू यहाँ खड़ा है और चाय पीने वालों को कोस रहा है?"
"आपा, मैं—"
"मैं तुझे नहीं कोस रही," उन्होंने कहा, और केतली नीचे रख दी। "मैं इनको नहीं कोस रही। मैं खुद को कोस रही हूँ कि मैंने कल रात क्यों नहीं कहा कि अंकुश, इस दीवार पर कोई फिर लिखेगा। मैंने सोचा था, सोचा था और नहीं कहा।"
उन्होंने एक कटोरी उठाई, उसमें चाय डाली, और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"पी," उन्होंने कहा। "और सुन — दस बजे तक गली में चार लोग बोलेंगे कि अंकुश की वजह से अस्पताल पर निशान पड़ा। दो कहेंगे कि उसी के कारण मरीज़ जा रहे हैं। तैयार रह।"
चाय गरम थी और मेरे हाथ काँप रहे थे, इसलिए मैंने कटोरी दोनों हाथों से पकड़ी।
"और एक बात," शबनम आपा ने कहा। "रज़िया कल रात से चुप है। उसने सुबह उठकर बस इतना कहा — 'दीवार पर नाम देखा?' और फिर चूल्हे के पास बैठ गई।"
"उसे क्या पता?"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno