The Mysterious Bell – Chapter 646
ढक्कन पूरा खुला नहीं था। वो हिल रहा था — जैसे कोई अंदर से, दोनों हाथों से, बराबर का ज़ोर लगा रहा हो।
मैंने घंटी मुट्ठी में कस ली। वो मेरी हथेली की चमड़ी जला रही थी, पर मैंने छोड़ी नहीं।
"टिंकू, पीछे।"
"उस्ताद—"
"पीछे, बोला ना।"
टिंकू पीछे हटा, पर दो कदम ही। पापा टैंक के ठीक सामने खड़े थे, उनकी हथेली अब भी उस ज़ंग लगे ढक्कन पर टिकी थी, और मैं देख रहा था कि उनकी उँगलियाँ काँप नहीं रही थीं। वो स्थिर थीं। डर से नहीं, किसी और चीज़ से।
ढक्कन एक और बार हिला। छोटा, तेज़ झटका। और अंदर से आती खुरचने की आवाज़…
रुक गई।
नहीं रुकी — कट गई।
जैसे किसी ने नाखून से दीवार पर लकीर खींचते-खींचते बीच में हाथ उठा लिया हो। आधी लकीर। अधूरी। और फिर उस अधूरेपन से ज़्यादा डरावना सन्नाटा।
हवा भी रुक गई थी। मुझे पता है हवा ऐसे नहीं रुकती। पर उस वक़्त लगा, साँस लेने वाला भी रुक गया हो।
"टॉर्च," मैंने कहा।
टिंकू ने मेरी जेब से टॉर्च निकाली। उसके हाथ काँप रहे थे, इसलिए उसने दोनों हाथों से पकड़ी और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"तुम रोशनी मेरे कंधे के ऊपर से डालो," मैंने कहा। "मैं अंदर नहीं, ढक्कन के किनारे से देखूँगा।"
पापा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। ज़ोर से नहीं, बस पकड़ लिया।
"अंदर मत जाना," उन्होंने कहा।
"नहीं जा रहा, पापा।"
"वादा कर।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर था जो मैंने बहुत कम देखा था — घर के कोने में बैठे पापा का डर नहीं, बल्कि उस आदमी का डर जो पाँच साल पहले किसी मेज़ पर अंगूठा लगाकर आया था और आज भी उसी मेज़ की तरफ़ देखता है।
"वादा," मैंने कहा।
टिंकू ने रोशनी डाली।
ढक्कन के किनारे से अंदर की तरफ़ मैंने झाँका — सिर्फ़ आँख से, दो इंच पीछे रहकर — और पहले कुछ भी समझ नहीं आया। अंदर अंधेरा था, घना। फिर रोशनी धीरे-धीरे फैली और मुझे दीवार दिखी।
टैंक की अंदरूनी दीवार।
वो लाल-भूरी थी, ज़ंग की परत से, पर उस पर, ऊपर से नीचे तक, कुछ चिपका हुआ था।
काग़ज़।
पर काग़ज़ जैसे काग़ज़ नहीं होते।
ये काग़ज़ नहीं थे। ये काग़ज़ की परतें थीं — एक के ऊपर एक, दबी हुई, गीली, भूरी-काली, जले किनारों वाली। जैसे किसी ने ढेर सारे काग़ज़ जलाए हों, आधे जले हों, और फिर उन्हें गीले हाथों से टैंक की दीवार पर चिपका दिया हो। या जैसे वो खुद चिपक गए हों। बरसों में। बारिश में। धूप में। ज़ंग के पानी में।
और उनके बीच से, बहुत नीचे, टैंक के तल से, मुझे एक हल्की भाप उठती दिखी।
टिंकू ने भी देखा। उसने रोशनी थोड़ी नीचे की और फिर ऊपर।
"अंदर कोई नहीं है," उसने फुसफुसाकर कहा।
"नहीं है," मैंने कहा।
"तो आवाज़ किसकी थी?"
मुझे नहीं पता था।
मैंने अपनी हथेली टैंक के किनारे पर रखी — बिना सोचे — और वो किनारा गरम था। नहीं, गरम नहीं। गुनगुना। जैसे बहुत देर पहले किसी ने इसे हाथ से पकड़ा हो और हाथ की गरमी अब भी बची हो।
मैंने हाथ खींच लिया।
"पापा।"
वो पास आए। ढक्कन के किनारे से उन्होंने अंदर झाँका — एक लंबी नज़र — और फिर वो पीछे हटे, और उन्होंने अजीब काम किया।
उन्होंने आँखें बंद करके, नाक से, बहुत गहरी साँस ली।
फिर एक और।
फिर उनका चेहरा बदल गया। रंग नहीं उतरा — उलटा, कुछ ऊपर आया। जैसे कोई बहुत पुराना नाम याद आ गया हो, जिसे वो बोलना नहीं चाहते थे।
"ये गंध…" उन्होंने कहा। आवाज़ बैठी हुई थी।
"कैसी गंध?"
"जला काग़ज़।"
"वही तो, पापा — काग़ज़ जले हैं, गंध तो आएगी।"
"नहीं।" उन्होंने आँखें खोलीं। "ये गंध मैंने बहुत पहले सुनी है। सिर्फ़ एक बार।"
"कब?"
"पाँच साल पहले। नहीं—" उन्होंने सिर हिलाया, जैसे अपने ही हिसाब को ठीक कर रहे हों। "उससे भी पहले। बहुत पहले। जिस रात नूर अस्पताल के पीछे कुछ जलाया गया था।"
मेरे पीछे बंसीलाल खड़े थे। उनके हाथ में वो लोहे की बड़ी चाबी थी जो उन्होंने पिछले फाटक का ताला खोलने के लिए दी थी, और उस चाबी की आवाज़ अब उनके काँपते हाथों में बज रही थी, हल्की, धातु की, लगातार।
"पापा, आप क्या कह रहे हैं—"
"ये काग़ज़ नहीं हैं, अंकुश," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ छोटी हो गई थी। "ये जले काग़ज़ नहीं हैं। ये वो काग़ज़ हैं जिन्हें जलाया गया और पूरा जलने नहीं दिया गया।"
"क्यों नहीं जलने दिया?"
"क्योंकि जलाने वाले को यक़ीन नहीं था कि जल गया तो खत्म हो जाएगा।"
मैं कुछ कहता, उससे पहले टिंकू की आवाज़ आई।
"उस्ताद!"
वो टैंक के दूसरी तरफ़ गया था — बिना कहे, बिना पूछे, बच्चों की आदत। मैंने झटके से उसकी तरफ़ देखा और देखा कि वो टैंक के कोने में झुका हुआ है, दोनों हाथ फैलाए, ज़ंग भरी सतह को टटोल रहा है।
"टिंकू, वहाँ से हट—"
"मिल गया!"
मैं वहाँ पहुँचा। टैंक के कोने में, ज़ंग की मोटी परत के नीचे, एक छोटा सा लोहे का बक्सा फँसा हुआ था। ऐसा छोटा कि मेरी दोनों हथेलियों में आ जाए। उसका रंग वही टैंक वाला — काला, भूरा, ज़ंग से भरा — और इसीलिए वो अब तक नज़र नहीं आया। टिंकू ने पकड़कर खींचा। वो हिला नहीं। उसने ज़ोर लगाया, दोनों हाथों से, बच्चे की पूरी ताक़त से, और वो अचानक छूटकर उसके हाथ में आ गया। टिंकू पीछे गिरते-गिरते बचा।
"देखो!" उसने कहा, और मुझे बक्सा थमा दिया।
बक्से में ताला नहीं था। ढक्कन बस दबा हुआ था।
मैंने ढक्कन खोला।
अंदर कुछ नहीं था।
बिल्कुल कुछ नहीं। सूखा, साफ़, खाली। न काग़ज़, न कपड़ा, न कोई काग़ज़ का टुकड़ा। बस उसके तले पर ज़ंग की एक पतली परत और उस पर धूल।
"खाली है," टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ में निराशा थी, और डर भी — क्योंकि खाली चीज़ें भरी चीज़ों से ज़्यादा डराती हैं।
"रुक," मैंने कहा।
मैंने बक्से का ढक्कन उलटा किया — अंदर की तरफ़ ऊपर — और उस पर टॉर्च की रोशनी डाली।
और मेरी साँस रुक गई।
ढक्कन के अंदर, लोहे के तले पर, किसी नुकीली चीज़ से कुछ खुरचा हुआ था। नई खुरचाई। खुरची हुई जगह में लोहे की चमक अभी ज़िंदा थी, ज़ंग उसमें अभी नहीं बैठी थी। और उस खुरचाई में शब्द बने थे।
मेरा नाम।
अंकुश यादव।
पूरा नाम। दोनों शब्द। जैसे मैंने खुद लिखा हो। जैसे मेरा हाथ कहीं और हो और इस ढक्कन पर लिख रहा हो।
मैंने उँगली उस पर रखी। खुरची हुई जगह गरम थी।
नहीं — गुनगुनी।
"उस्ताद," टिंकू ने फुसफुसाया। "ये… ये हम अभी लाए?"
"नहीं।"
"तो—"
"पता नहीं।"
मैंने पीछे मुड़कर बंसीलाल को देखा।
वो दो कदम और पीछे हट गए थे। उनका चेहरा सफ़ेद था — असली सफ़ेद, उस तरह जैसे डर खून को ऊपर खींच लेता है — और उनके होंठ हिल रहे थे, बिना आवाज़ के।
"बंसीलाल भाई?"
"वो आवाज़ बच्चों की नहीं थी," उन्होंने कहा। आवाज़ फटी हुई थी।
"क्या?"
"वो आवाज़ बच्चों की नहीं थी," उन्होंने दोहराया, और इस बार वो रुके नहीं, बहते गए — "मैंने बत्तीस साल इस अस्पताल में रातें काटी हैं। मैंने बच्चों को रोते सुना है, खेलते सुना है, बुखार में बड़बड़ाते सुना है। जो आवाज़ टैंक से आ रही थी, वो बच्चों की नहीं थी।"
"तो किसकी थी?"
"जले काग़ज़ों की।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"बंसीलाल भाई—"
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