The Mysterious Bell – Chapter 640
"माँ," मैंने कहा। "आप आज रात यहाँ नहीं रह सकतीं।"
"मैं यहीं रहूँगी," उन्होंने कहा।
"माँ…"
"अंकुश," उन्होंने कहा। और अपनी आवाज़ वैसी कर ली जैसी सिर्फ़ माँ कर सकती है — न गुस्से की, न प्यार की, बस ऐसी कि बहस खत्म। "जिस अस्पताल की ज़मीन के लिए ये सब हो रहा है, वो तेरी माँ का इलाज करता है। जिस आँगन में तू खड़ा है, वहीं से मुझे दवा मिलती है। तू मुझे कहीं और भेज देगा, तो मैं सुबह का मुँह देखूँगी कि क्या हुआ होगा। और मुझे वो नहीं चाहिए। मुझे यहाँ होना है।"
मैंने काजल की तरफ़ देखा।
काजल ने कंधे उचकाए। मतलब — मैंने कोशिश की थी।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक शर्त है।"
"बोल।"
"अगर यहाँ कुछ भी गड़बड़ लगे, आप काजल के साथ अंदर चली जाएँगी। बहस नहीं।"
वो मुस्कुराईं। असली मुस्कान, थकी हुई।
"ठीक है," उन्होंने कहा। "अब जा। और हाँ — जाते वक़्त अपनी जेब देख ले।"
"क्यों?"
"क्योंकि काजल ने तेरी घंटी को धागे में दो गाँठ लगा दी हैं और मुझे शक है कि दूसरी गाँठ ढीली है।"
मैं हँसा। एक छोटा सा हँसना, जो इस रात में ज़रूरी था।
मैंने जेब टटोली। घंटी वहीं थी। दो गाँठ। दूसरी गाँठ सच में ढीली थी।
काजल ने धीरे से कहा, "तू जब अंधेरे में दौड़ता है, तो तुझे कुछ दिखता नहीं। कम से कम घंटी तो बताए कि तेरे पास है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा।
क्योंकि कभी-कभी तुम्हारी बहन जो चीज़ें कहती है, वो शुभकामनाएँ होती हैं जिन्हें वो सीधे नहीं कह सकती।
अब मैंने मीरा को इशारा किया।
वो आई, कैमरा कंधे पर।
"कितने लोग चलेंगे?" उसने पूछा।
"जितने दिखेंगे नहीं," मैंने कहा। "छह। मैं, तू, उस्ताद, टिंकू, सानिया, चिंटू।"
"रफ़ीक़ और गुड्डू?"
"वो गली के मोड़ पर तैनात रहेंगे," मैंने कहा। "अगर कोई गाड़ी, कोई आदमी, कोई लकड़ी के जूते वाला अचानक आए, वो सीटी बजाएँगे। रात में सीटी सबसे तेज़ खबर होती है।"
रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा आँख पर चढ़ाया। "भैया, सीटी में दम है?"
"तू अपने फेफड़ों में दम रख," मैंने कहा। "सीटी मैं दूँगा।"
वो हँसा।
बच्चों को हँसाना इस रात में सबसे ज़रूरी काम था। क्योंकि डर हँसी से छोटा हो जाता है।
मैं उस्ताद के पास गया।
"आप आ रहे हैं?"
"हाँ," उन्होंने कहा।
"आपकी कमर…"
"मेरी कमर ने पचास साल में बहुत कुछ सहा है," उन्होंने कहा। "एक रात और सह लेगी।"
हम निकल पड़े।
स्कूल की गली में घुसते वक़्त रात लगभग तीन बजे का वक़्त था। हवा ठंडी थी और उसमें वो हल्की सी गंध थी जो पुरानी इमारतों से आती है — चूना, धूल, और बहुत पुरानी बारिश।
गेट आधा खुला था। वैसा ही, जैसा मैंने दूर से देखा था।
मैंने उसे छुआ।
ज़ंग लगा लोहा। ठंडा नहीं, बस बेअसर।
"घंटी," मैंने बहुत धीरे कहा। "कुछ बताओ।"
घंटी चुप रही।
फिर बोली — "अंदर कोई नहीं है।"
"कैसे पता?"
"क्योंकि अंदर डर नहीं है," उसने कहा। "जो अंदर जाता है, वो अपना डर पीछे छोड़ जाता है।"
मैंने पीछे देखा।
सानिया और चिंटू एक-दूसरे का हाथ पकड़े थे। मीरा का चेहरा पत्थर जैसा था, पर उसकी उँगलियाँ कैमरे पर सफ़ेद हो रही थीं। टिंकू ने अपनी जेब से वो छोटा पेचकस निकाल लिया था — जिसे वो रात में सोते हुए भी नहीं छोड़ता था।
और उस्ताद — उस्ताद सबसे शांत थे। जैसे वो इस जगह को पहले से जानते हों।
"उस्ताद," मैंने कहा। "आप यहाँ पहले आए हो?"
"पचास साल पहले," उन्होंने कहा। "जब ये स्कूल नया था।"
"और तब टैंक?"
"तब भी था," उन्होंने कहा। "पर तब उसका ढक्कन खुलता था।"
हम अंदर गए।
आँगन खाली था। रोशनी अब नहीं थी — जो मैंने दूर से देखी थी, वो कहीं और से आ रही थी, या फिर बुझ गई थी।
हम सीढ़ी की तरफ़ बढ़े।
आधे रास्ते में मैंने उस्ताद को रोका।
"आपने आँगन में गिनते वक़्त क्या सोचा था?"
वो रुके।
"मैं सोच रहा था," उन्होंने कहा, "कि अगर फूट जागा है, तो उसे एक जगह चाहिए। एक ऐसी जगह जहाँ से वो पूरे मोहल्ले को देख सके। और जहाँ से कोई उसे न देख सके।"
"टैंक।"
"पर टैंक तक पहुँचने के लिए," उन्होंने कहा, "उसे एक रास्ता चाहिए था। और स्कूल की छत बंद हो गई थी। तो उसने छत बंद क्यों करवाई?"
मैंने सोचा।
"ताकि कोई ऊपर न आए?"
"नहीं," उन्होंने कहा। "ताकि छत की मरम्मत का काम शुरू हो सके। और मरम्मत का काम मतलब — मज़दूर, रस्सियाँ, सीमेंट, और ऊपर आने-जाने की पूरी छूट।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"मतलब वो छत को इसलिए बंद नहीं करवा रहा कि वो खतरनाक है। वो छत पर इसलिए जाना चाहता है कि वहाँ कुछ है।"
"और मरम्मत के नाम पर," उस्ताद ने कहा, "ये गली की सबसे बड़ी चोरी है। वो छत गिराएगा, नहीं। वो उसके नीचे से कुछ निकालेगा। और जब निकाल लेगा, तब छत गिरेगी — ताकि कोई कभी ढूँढ न सके कि नीचे क्या था।"
हम सीढ़ी के पास पहुँचे।
लोहे की सीढ़ी। जंग लगी। दीवार से टिकी हुई।
सानिया ने धीरे से कहा, "भैया, टैंक उस कोने के पीछे है। दीवार के साथ। वहाँ से सीढ़ी सीधी जाती है।"
"तू पीछे रह," मैंने कहा।
"भैया —"
"सानिया। तू मेरी आँखें है। अगर मैं ऊपर जाऊँ और तू नीचे रह जाए, तो अगर कोई पीछे से आए, तू मुझे बता देगी।"
वो कुछ देर मुझे देखती रही।
फिर उसने सिर हिलाया।
"ठीक है," उसने कहा। "पर अगर तू ऊपर से चुप हो गया, तो मैं ऊपर आ जाऊँगी। और मुझे रोकने की कोशिश मत करना।"
"मैं नहीं करूँगा," मैंने कहा।
वो मुस्कुराई।
मैं सीढ़ी पर चढ़ने लगा।
पहली सीढ़ी। दूसरी। तीसरी।
और तभी —
तभी गली के मोड़ से एक आवाज़ आई।
बहुत दूर से। भारी। धातु की। और लगातार।
मैं रुक गया।
"ये क्या है?" मीरा ने कहा।
मैंने सुना।
धीमी, भारी चरचराहट। जैसे कोई बहुत बड़ी लोहे की चीज़ ज़मीन पर खींची जा रही हो।
और फिर वो आवाज़ करीब आई।
और फिर मैंने उसे पहचान लिया।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और उसका चेहरा उतर गया।
"ये मशीन है," उसने कहा।
"हाँ," मैंने कहा।
"पर मशीन तो सुबह सात बजे आनी थी।"
मैंने घंटी को जेब में पकड़ा। वो ठंडी थी।
"वो सात बजे आती है," मैंने कहा, "ताकि हम तैयार मिलें।"
और फिर आवाज़ दूसरी तरफ़ से आई — अस्पताल के फाटक की तरफ़ से।
धड़ाम।
एक भारी धातु का गिरना।
और उसके बाद इंजन की आवाज़। मोटी। बेपरवाह। जैसे कोई आदमी यह कह रहा हो कि मुझे कोई रोक नहीं सकता।
मैं सीढ़ी से नीचे उतरा। दो सीढ़ियाँ एक बार में।
"मीरा, टिंकू — चलो।"
"अंकुश," उस्ताद ने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"ये खेल है," उन्होंने कहा। "वो जानता है कि हम यहाँ हैं। वो चाहता है कि हम दौड़ें।"
"और अगर हम न दौड़ें," मैंने कहा, "तो वो अस्पताल गिरा देगा।"
उस्ताद कुछ देर चुप रहे।
"हाँ," उन्होंने कहा। "इसीलिए हम दौड़ेंगे। पर तेज़ नहीं। और अंधे में नहीं।"
हम गली की तरफ़ भागे।
अस्पताल के फाटक पर रोशनी थी।
दो बड़ी लाइटें। पीली। और उनके बीच एक भारी मशीन खड़ी थी — जो पहाड़ जैसी दिख रही थी, जिसका एक हाथ ऊपर उठा हुआ था।
और मशीन के आगे, सफ़ेद कुर्ते में, हाथ जोड़े, मुस्कुराता हुआ — मनोज।
वो काग़ज़ों का बंडल सीने से चिपकाए खड़ा था।
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