The Mysterious Bell – Chapter 641
गली के लोग पहले से वहाँ थे। उस्ताद की कही बात सच निकली — कोई सोया नहीं था। शबनम आपा, हबीब चाचा, रज़िया, भवानी प्रसाद, रामलाल, बंसीलाल — सब वहाँ थे। औरतें आगे थीं। बुज़ुर्ग आगे थे।
कोई नारा नहीं। कोई शोर नहीं।
बस खड़े थे।
और मनोज मुस्कुरा रहा था।
"अंकुश भाई," उसने कहा। "समय बदल गया। साहब ने कहा — सुबह का इंतज़ार क्यों? जब काम हो सकता है रात में, तो रात में क्यों नहीं?"
मैं उसके पास गया।
मेरी साँस फूल रही थी। मेरे हाथ में ज़ंग लगी चाबी थी, जो पापा ने दी थी। मेरी जेब में घंटी थी, जो अभी चुप थी।
"मनोज भाई," मैंने कहा। "अंदर मरीज़ हैं।"
"मरीज़ों को कोई नहीं छू रहा," उसने कहा। "हम बाहर की दीवार गिराएँगे। बस।"
"बाहर की दीवार में भी मरीज़ हैं," मैंने कहा। "उस दीवार के उस पार दवा की खिड़की है। उस खिड़की के नीचे एक बूढ़ी औरत तीन महीने से बैठी है, अपनी बहू की पर्ची लिए। अगर वो दीवार गिरी, तो पहली ईंट उसी के सिर पर गिरेगी।"
मनोज की मुस्कान थोड़ी हिली।
फिर वो वापस आ गई। वो मुस्कान बनी रही, पर उसके पीछे कुछ और था — थकान।
"मैं मज़दूर हूँ, अंकुश भाई," उसने कहा। "मुझे हुक्म मिला है। मेरे बच्चे हैं।"
"मेरे भी हैं," शबनम आपा ने पीछे से कहा। "पूरी गली के। और उन्हें इस दीवार के नीचे नहीं दबने दूँगी।"
मशीन का इंजन गरजा।
और मेरी जेब में घंटी बजी।
इस बार ज़ोर से। इतनी ज़ोर से कि मेरी जाँघ काँपी।
और घंटी ने कहा —
"देख, मशीन के पीछे।"
मैंने देखा।
मशीन के पीछे, अंधेरे में, एक आदमी खड़ा था।
सफ़ेद कुर्ता। सफ़ेद जूते। काले बाल।
और वो हिल नहीं रहा था।
बस खड़ा था।
और मुस्कुरा रहा था।
"मनोज भाई," मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी। "ये मशीन आपकी है?"
"हाँ।"
"तो मुझे बताइए," मैंने कहा। "जो आदमी आपकी मशीन के पीछे खड़ा है, वो कौन है?"
मनोज ने पीछे देखा।
और उसका चेहरा — मैंने देखा — एक पल के लिए खाली हो गया।
"वहाँ कोई नहीं है," उसने कहा।
"आप झूठ बोल रहे हैं," मैंने कहा।
"मैं…"
"आप झूठ बोल रहे हैं," मैंने दोहराया। "क्योंकि आपने पीछे देखा और आपकी गर्दन काँपी। आपने उसे देखा। आप उसे पहचानते हैं।"
मनोज ने अपनी जीभ से होंठ गीले किए।
और तभी, बहुत धीरे, बहुत साफ़, उसने कहा —
"मैंने उसे पहले नहीं देखा था।"
"कब से?"
"जब से शाम को वो मंच पर आया," मनोज ने कहा। "तब से।"
एक पल सब चुप रहे।
और उस चुप्पी में, पीछे की तरफ़ से, एक आवाज़ आई।
लकड़ी के जूते।
खट। खट। खट।
धीमे। बराबर।
मशीन के पीछे खड़ा सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी, अंधेरे में, एक कदम आगे आया।
और मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई।
बिल्कुल ठंडी।
जैसे किसी ने उसे बर्फ़ में दबा दिया हो।
और घंटी ने कहा — इतने धीमे कि मैंने ही सुना —
"ये वो नहीं है।"
मैंने आँखें झपकाईं।
"क्या मतलब?"
"ये वो नहीं है," घंटी ने कहा। "ये उसका पहला हिस्सा है।"
और फिर मशीन की लाइटों के बीच, उस आदमी ने अपना हाथ उठाया।
बहुत धीरे।
जैसे कोई पुराना दोस्त हाथ हिलाता हो।
और मैंने देखा —
उसकी कलाई पर कोई चीज़ बँधी थी।
धागा।
पुराना। फीका। पर बँधा हुआ।
॥
उसने हाथ उठाया।
धीरे-धीरे। जैसे कोई बहुत पुराना दोस्त हाथ हिलाता हो — जिसे देखकर तुम सोचते हो, ये यहाँ कब आया? हमेशा से यही था क्या?
मेरे पैर जम गए।
मशीन की दो पीली लाइटें उसके पीछे जल रही थीं। लाइटों के बीच उसका चेहरा आधा अंधेरे में था, आधा पीले में। पर मुस्कान साफ़ दिख रही थी। वैसी मुस्कान जो धमकी नहीं देती। बस इतना कहती है — मैं तुम्हें जानता हूँ, तुम मुझे नहीं जानते।
पीछे किसी ने साँस रोक ली। शबनम आपा की आवाज़ आई, धीमी, काँपती हुई — "अंकुश, पीछे आ जा।"
मैंने पीछे नहीं देखा।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी बर्फ़ जैसी ठंडी थी।
"अभी कुछ मत कर," घंटी ने कहा। "सिर्फ़ देख।"
मैंने देखा।
उसकी कलाई पर वो फीका धागा था। पुराना। धुला हुआ। गाँठ उभरी हुई, और धागे की एक तरफ़ रगड़ का निशान, जैसे बरसों से वहीँ पड़ा हो, कभी खोला ही न गया हो।
और तभी उसने दूसरा हाथ भी उठाया।
दोनों हाथ जोड़कर उसने धीरे से सिर झुकाया।
नमस्ते।
मेरी साँस अटक गई।
वो कुछ नहीं बोला। एक शब्द नहीं। कोई धमकी नहीं, कोई काग़ज़ नहीं, कोई वकील नहीं। बस सिर झुकाया, मुस्कुराया, और पीछे मुड़ गया।
लकड़ी के जूते। खट। खट।
धीमे। बराबर। जैसे कोई बूढ़ा आदमी चल रहा हो जिसे जल्दी न हो।
मैं एक कदम आगे बढ़ा।
"रुक," घंटी ने कहा। "वो जा रहा है। जाने दे।"
"कहाँ जा रहा है?"
"जहाँ से आया है," घंटी ने कहा। "काग़ज़ से।"
और वो अंधेरे में घुल गया।
बस इतना ही। कोई धुआँ नहीं, कोई रोशनी नहीं, कोई छलावा नहीं। गली के मोड़ पर अंधेरा था, और वो अंधेरे में उतना ही सहज हो गया जितना कोई अपने घर के कमरे में।
मशीन का इंजन फिर गरजा। मनोज ने अपनी जीभ से होंठ गीले किए और वो काग़ज़ों का बंडल और ज़ोर से सीने से चिपका लिया, जैसे उसकी छाती भी कोई काग़ज़ हो जिसे छिपाना है।
"मनोज भाई," मैंने कहा।
वो नहीं बोला।
"मनोज भाई," मैंने फिर कहा। "आपने उससे आँख मिलाई। मैंने देखा।"
"मैंने नहीं मिलाई।"
"आपने मिलाई," मैंने कहा। "और जब उसने हाथ जोड़ा, आपने भी हाथ जोड़ने की कोशिश की — आधा। फिर आपने हाथ नीचे कर लिया।"
मनोज ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैं अपनी दुकान पर रोज़ देखता हूँ — वो चीज़ जो आदमी के चेहरे पर तब आती है जब टूटी साइकिल का पहिया हाथ में देते वक़्त उसे पता होता है कि इसे ठीक नहीं करवाना, बस बहाना बनाना है।
"उसने पहले कभी मुझसे बात नहीं की," मनोज ने कहा। "ना मंच पर, ना साइट पर। बस खड़ा रहता है। साहब के पीछे।"
"और साहब क्या कहते हैं उसके बारे में?"
मनोज ने गला साफ़ किया।
"साहब कहते हैं — वो मेरा हिसाब रखता है।"
"कौन सा हिसाब?"
"जो मैं नहीं जानता," मनोज ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा था जो मुस्कान से नहीं आता — डर।
शबनम आपा मेरे पास आईं। उनके हाथ में लोहे की चिमटी थी, और चिमटी ठंडी थी। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "अब बोल। पूरी गली खड़ी है। कोई डरेगा तो मैं उसे चाय नहीं दूँगी, ये मेरी कसम।"
मैं मुड़ा।
गली वाकई खड़ी थी।
शबनम आपा, उनके पीछे रज़िया — रज़िया का दुपट्टा अब भी सर से खिसका हुआ, और वो उसे सीधा नहीं कर रही थी, जैसे उसे अब फ़र्क़ नहीं पड़ता। हबीब चाचा, जिनकी आँखों में आँसू सूखकर नमक की पतली लकीर बन गए थे। भवानी प्रसाद, जिनके हाथ में वही पीला पन्ना था जिसे उन्होंने किसी दफ़्तार की मेज़ पर रखकर कभी नहीं छोड़ा। रामलाल, जो अपनी रुकी घड़ी की तरफ़ बार-बार देख रहे थे, जैसे उम्मीद कर रहे हों कि आज वो चलेगी। बंसीलाल, हाथ जोड़े, राख से धुले हुए।
और औरतें। बहुत सी औरतें। कुछ के हाथ में पर्चियाँ थीं, कुछ के हाथ में बच्चे।
और बुज़ुर्ग — चबूतरी वाले बुज़ुर्ग, जो रात भर में कभी इतने सारे एक साथ नहीं खड़े हुए थे।
मैंने साँस ली।
"मनोज भाई," मैंने कहा। "मशीन आज नहीं चलेगी। सात बजे की जगह रात में लाए हो, ये आपकी गलती है। पर मैं आपसे लड़ने नहीं आया। मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ — जाँच होगी। पर जाँच सबके सामने होगी।"
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