The Mysterious Bell – Chapter 638
वो आदमी जो पूरी गली में पान चबाकर घूमता था, जो सबको धमकाता था, जिसकी सोने की चेन की टिक-टिक दूर से सुनाई देती थी — वो आज एक तस्वीर देखकर काँप रहा था।
"बबलू भाई?" मैंने कहा। "क्या हुआ?"
वो उठा। फिर बैठ गया। फिर फिर खड़ा हो गया। जैसे उसके अंदर कोई चीज़ उसे एक जगह नहीं बैठने दे रही हो।
"ये वही है," उसने कहा।
"कौन?"
"वो," उसने तस्वीर की तरफ़ उँगली उठाई। उँगली काँप रही थी, इसलिए वो तस्वीर के चारों तरफ़ घूम गई, एक ही जगह नहीं टिकी। "वो काला। वो ठंडा।"
"तुमने इसे देखा है?"
"मैंने इसे महसूस किया है," बबलू ने कहा।
फिर वो रुका। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में जो था, वो मैंने उस आदमी की आँखों में पहले कभी नहीं देखा था — असली डर।
"उस रात," बबलू ने कहा। आवाज़ धीमी हो गई, जैसे किसी ने उसका गला दबा दिया हो। "जब मैंने बिजलीघर के पीछे वो नीला बक्सा खोला। ढक्कन उठाया। तुमने मुझसे पूछा था कि अंदर क्या था। मैंने कहा था — धुआँ।"
"हाँ।"
"पर मैंने तुम्हें पूरा नहीं बताया," उसने कहा।
मैंने अपनी मुट्ठी कस ली।
"तो अब बताओ।"
बबलू ने आँगन में देखा। सब उसे देख रहे थे। वो फिर बैठ गया। धीरे से। जैसे उसके घुटने जवाब दे रहे हों।
"जब मैंने ढक्कन उठाया," उसने कहा, "तो अंदर से धुआँ निकला। ठंडा था। इतना ठंडा कि मेरे चेहरे पर पानी की बूँदें जम गईं। मैंने अपना चेहरा पोंछा, पर वो जमी रहीं, जैसे मेरे ही पसीने से बर्फ़ बन गई हो। और फिर…"
वो रुका। उसका गला भर आया।
"और फिर?" मैंने धीरे से कहा।
"और फिर मैंने देखा," बबलू ने कहा। "धुएँ के अंदर से कुछ आकार बन रहा था। जैसे धुआँ खुद को सहेज रहा हो। मुझे लगा मैंने… मैंने किसी को देखा। बिना चेहरे का कोई। और उसने…"
"क्या किया?"
"उसने मेरी तरफ़ देखा," बबलू ने कहा। "वो चलता नहीं था। वो हिलता नहीं था। पर मुझे पता था कि वो मेरी तरफ़ देख रहा है। मुझे अंदर से पता चल गया था। और फिर वो —"
वो रुक गया।
"क्या?"
"वो मेरे कान में बोला," बबलू ने कहा। आवाज़ फटी हुई थी। "धीरे से। एक ही बात। उसने कहा — अब सो जा।"
आँगन में सन्नाटा छा गया।
"और मैं उस रात से सो नहीं पाया," बबलू ने कहा। "जब भी आँख बंद करता हूँ, वो धुआँ दिखता है। जब भी अंधेरा होता है, मुझे लगता है कोई मेरे कान के पास खड़ा है। पिछले सात महीने से। तुम सोचते होगे कि मैं पान खाकर खुश हूँ। पर मैं रात भर आँखें खोलकर छत देखता हूँ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
कभी-कभी शरीर सब बता देता है। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे थे। उसके होंठ सूखे थे। उसका रूमाल, जो कल सफ़ेद था, आज मैला और मुड़ा हुआ था।
मैंने सोचा था बबलू सबसे बड़ा डर है गली में।
आज पता चला — वो सबसे बड़ा डरा हुआ है।
डॉक्टर इसरानी आगे आए। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर बबलू की तरफ़, और फिर मीरा के कैमरे की तरफ़।
"ये तस्वीर अभी"ये तस्वीर अभी बाहर नहीं जाएगी।"
डॉक्टर निहाल इसरानी की आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वो कसाव था जो सिर्फ़ उस आदमी में आता है जिसने तीस साल मरीज़ों के बिस्तरों के बीच गुज़ारे हों।
"मीरा बेटी," उन्होंने कहा, "ये तस्वीर तेरे कैमरे में रहेगी। रात भर रहेगी। सुबह तक किसी और के फ़ोन में नहीं जाएगी।"
मीरा ने कैमरा सीने से लगा लिया।
"पर डॉक्टर साहब, यही तो सबूत है —"
"सबूत है," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "और इसीलिए अभी नहीं। देख, इस आँगन में कितने लोग हैं। इनमें से आधे वो हैं जिनका कोई बीमार घर में है। कोई बच्चा बुखार में है, कोई बूढ़ी माँ साँस नहीं ले पा रही। अगर ये तस्वीर अभी निकली और उन्होंने देख लिया कि रात में किसी के पीछे कोई बिना चेहरे का खड़ा है, तो कल सुबह यहाँ मरीज़ नहीं बचेंगे। सिर्फ़ डरे हुए लोग बचेंगे। और डरा हुआ आदमी अपना बिस्तर खुद उठाकर बाहर रख देता है।"
मीरा ने कुछ कहना चाहा।
फिर चुप हो गई।
क्योंकि डॉक्टर साहब ठीक कह रहे थे। और सच्ची बात का सबसे बुरा हिस्सा यही होता है — वो अक्सर उस वक़्त आती है जब तुम उसे सुनना नहीं चाहते।
मैंने मोमबत्ती को थोड़ा आगे खिसकाया।
रोशनी काँपी। और तस्वीर फिर सामने आ गई।
वो तस्वीर जो मीरा ने मंच पर खींची थी। जिसमें रणवीर हाथ जोड़े खड़ा था, बड़ा बोर्ड पीछे, और उसके ठीक पीछे…
पीछे कुछ था।
कुछ जिसका आकार आदमी जैसा था। पर आदमी नहीं था।
न आँख, न नाक, न मुँह। बस एक काला, ठंडा, सीधा खड़ा हुआ साया। और उसकी परछाईं — जो मंच के फ़र्श पर पड़ी थी — सीधी नहीं थी। वो मुड़ी हुई थी।
स्कूल की तरफ़।
मैंने देखा कि आँगन में जो-जो लोग मेरी तरफ़ झुककर तस्वीर देख रहे थे, वो एक-एक करके पीछे हटने लगे।
और तब मैंने सुना।
खड़खड़।
मैंने पीछे देखा।
बबलू खड़ा था — दस कदम दूर, चबूतरी के किनारे। उसका बँधा हाथ सीने से चिपका हुआ था। और उसका पूरा शरीर काँप रहा था।
नहीं, काँपना ग़लत शब्द है।
काँपना तो ठंड में होता है। बबलू के साथ कुछ और हो रहा था। जैसे उसके अंदर कोई चीज़ बैठी हो और उसे अंदर से हिला रही हो।
"बबलू भाई," मैंने कहा।
उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। वो तस्वीर देख रहा था।
"यही है," उसने कहा।
उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने उसके गले में रेत डाल दी हो।
"यही धुआँ है," बबलू ने कहा। "यही आकार। मैंने इसे उस रात देखा था। बक्सा खोलते वक़्त। यही। बिल्कुल यही। इसने मेरी तरफ़ देखा था और मुझसे कहा था — अब सो जा।"
वो पीछे हटा। उसका पैर चबूतरी की सीढ़ी से टकराया और वो लगभग गिर गया।
शबनम आपा दौड़कर गईं और उसका बाज़ू पकड़ लिया।
"बैठ जाओ," उन्होंने कहा। सख़्त आवाज़ में। पर हाथ नरम था। "बैठ जाओ, वरना यहीं गिरोगे।"
"आपा, वो…"
"मैंने देख लिया," शबनम आपा ने कहा। "मैं अंधी नहीं हूँ। बैठ।"
बबलू बैठ गया। उसके घुटने सीढ़ी पर टिके और उसने अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया। बँधा हाथ भी साथ आ गया। वो रूमाल जो कल सफ़ेद था, आज मैला था, और उस पर सूखा गुलाबी दाग था।
मैंने उसे देखा और मुझे कुछ अजीब लगा।
सात महीने पहले इस आदमी ने मेरा गला पकड़ा था। ये आदमी मेरे मुँह पर पान का पीक फेंक सकता था। ये आदमी पूरी गली में डर बाँटता फिरता था।
और आज ये सीढ़ी पर बैठा था, काँपता हुआ, और मुझे उस पर गुस्सा नहीं आ रहा था।
ये कहानी का सबसे बुरा हिस्सा है। जब तुम्हें पता चलता है कि जिससे तुम लड़ रहे हो, वो भी किसी और से डरा हुआ है।
तभी मेरी जेब में घंटी बजी।
एक बार। बहुत हल्की।
और घंटी ने कहा, इतने धीमे कि सिर्फ़ मैंने सुना —
"साया डरता नहीं।"
मैंने आँखें झपकाईं।
"क्या?" मैंने फुसफुसाया।
"साया डरता नहीं," घंटी ने दोहराया। "डर खाता है।"
मैं कुछ देर चुप बैठा रहा।
फिर मैंने सबकी तरफ़ देखा।
और मुझे समझ आ गया।
मैं खड़ा हो गया।
"सब सुनो," मैंने कहा।
आँगन में बातें चल रही थीं। धीमी, डरी हुई। मेरी आवाज़ सुनकर सब रुक गए।
"तस्वीर बाहर नहीं जाएगी। आज रात नहीं जाएगी। ये डॉक्टर साहब का हुक्म है और ये मेरा भी हुक्म है। हो सकता है कल हमें इसे दिखाना पड़े, पर आज रात हम इसे दिखाकर किसी को डराएँगे नहीं।"
मैंने एक साँस ली।
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