The Mysterious Bell – Chapter 637
"मुझे सुबह ही पता चल गया था," दुबे अंकल ने कहा, जैसे कोई सफ़ाई दे रहे हों। "मैं सो रहा था, पर मुझे पता था।"
"अंकल," मैंने कहा, "आप सो रहे थे।"
"मैं सो रहा था," उन्होंने कहा, "पर जानता था।"
मैं हँसा। और उस हँसी में थोड़ा डर भी आ गया, छूट गया।
तभी मेरी दुकान के पीछे वाले कमरे से आवाज़ आई।
धीमी। खट। खट। खट।
मैं रुका।
"टिंकू," मैंने धीमे से कहा, "तूने दुकान के पीछे से कुछ निकाला?"
"नहीं भैया," उसने कहा। "मैं तो शटर पर खड़ा था।"
"तो ये कौन है?"
हम दोनों सुनने लगे।
खट। खट। खट।
धीमा। बराबर। जैसे कोई ट्रंक का ढक्कन उठा रहा हो और बंद कर रहा हो।
"उस्ताद," मीरा ने कहा, "ये…"
उस्ताद ने एक हाथ उठाया। चुप रहने का इशारा।
फिर उन्होंने धीमे से कहा, "वो नाटक शुरू कर रहा है।"
"क्या?"
"अभी हमें सुनाएगा कि वो यहाँ नहीं है," उन्होंने कहा। "अभी वो शोर करेगा, ताकि हम टॉर्च लेकर पीछे जाएँ। और जब हम पीछे जाएँगे, तो वो सामने से कुछ और करेगा।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"तो क्या करें?"
"हम पीछे नहीं जाएँगे," उस्ताद ने कहा।
"और अगर पीछे वाकई कुछ है?"
"पीछे वाकई कुछ है," मीरा ने कहा। "पर हमारी आँखें पीछे नहीं जाएँगी। हम वहीं रहेंगे, जहाँ हमें देखना चाहिए।"
मुझे समझ आ गई।
मैंने टॉर्च बंद कर दी। मीरा ने कैमरा बंद किया।
"सब सुनो," मैंने गली से कहा। "पीछे से आवाज़ आ रही है। कोई नहीं जाएगा। छत पर से भी कोई नहीं उतरेगा। हम आज रात यहीं बैठेंगे, मोमबत्तियों के साथ, और हम आज जो करेंगे —"
खट। खट। खट।
"— वो कोई नहीं छोड़ेगा।"
और तब मेरी जेब में घंटी बजी।
अपने आप।
एक बार। छोटी सी।
और घंटी ने कहा, इतने धीमे कि सिर्फ़ मैंने सुना —
"वो चाहता है तू पीछे जाए।"
"मुझे पता है," मैंने फुसफुसाया।
"तो पीछे मत जा," घंटी ने कहा। "आगे जा।"
"आगे कहाँ?"
और घंटी ने जो कहा, वो मैंने किसी को नहीं बताया। उस रात उसने जो कहा, वो मैंने अंदर ही रखा।
उसने कहा — "स्कूल।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
वो मुझे देख रहे थे। मोमबत्ती की रोशनी में उनकी आँखें छोटी हो रही थीं।
"क्या?" उन्होंने कहा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "तू झूठ बोल रहा है।"
"मैं चुप हूँ," मैंने कहा। "ये झूठ नहीं है।"
"अभी नहीं," उन्होंने कहा। "पर जब मरम्मत का वक़्त आएगा, तब भी चुप नहीं रह सकेगा।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
उस रात गली में कोई भी नहीं सोया।
शबनम आपा ने केतली चढ़ाई और मोमबत्तियों के बीच लोगों को चाय बाँटने लगीं, और अपने सिसकने को किसी को सुनने नहीं दिया।
टिंकू ने अपने जूते उतारे और उनमें से राख झाड़ी, और चुपचाप वो राख मेरी हथेली पर रख दी।
उस्ताद ने मेरी दुकान की कुर्सी खींची और उस पर बैठ गए, और उन्होंने आँखें बंद कर लीं, और उनके होंठ हिल रहे थे — कुछ गिन रहे थे, शायद।
मीरा ने कैमरा फिर चालू किया और उस तस्वीर को दोबारा देखा।
और मैंने आँगन के सीढ़ी की तरफ़ देखा।
जहाँ, उस रात, स्कूल के आँगन से एक हल्की सी पीली रोशनी आ रही थी।
हल्की। झुकी हुई। जैसे किसी ने वहाँ दीया जलाया हो।
और स्कूल का गेट, जो रोज़ रात बंद रहता था — वो आधा खुला हुआ था।
टिंकू ने भी वही देखा।
"भैया," उसने कहा। "हमें नहीं जाना था ना?"
"नहीं," मैंने कहा।
"तो फिर वो गेट…"
"कोई और खोल गया," मैंने कहा।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में जो था, वो मेरी आँखों में भी था।
स्कूल का गेट आधा खुला था।
और परछाईं का रास्ता वहीं जाता था।
॥
मैं स्कूल के गेट की तरफ़ देखता रहा।
आधा खुला गेट। अंदर से पीली रोशनी। हल्की। झुकी हुई। जैसे किसी ने वहाँ दीया जलाया हो, और हवा के डर से वो दीया धीमे-धीमे काँप रहा हो।
टिंकू मेरे पास आया। उसने मेरी कमीज़ की बाँह पकड़ी।
"भैया," उसने कहा। "हमें वहाँ जाना है?"
"नहीं।"
"पर घंटी ने कहा था ना — स्कूल।"
"घंटी ने कहा था," मैंने कहा। "पर घंटी ने ये नहीं कहा कि अभी, इसी रात, अंधेरे में, हम उसके बुलाने पर चले जाएँ।"
टिंकू ने गेट की तरफ़ देखा। उसके हाथ से मेरी बाँह नहीं छूटी।
"तो फिर कब?"
"सुबह," मैंने कहा। "जब सूरज हो। जब हम देख सकें कि सामने क्या है। जब हमारी आँखें हमारी हों।"
मीरा ने पीछे से कहा, "और अगर सुबह तक वो कुछ कर जाए?"
मैंने मुड़कर उसे देखा।
"तो सुबह हमें पता होगा कि वो क्या कर सकता है," मैंने कहा। "अंधेरे में जाने से हमें सिर्फ़ डर मिलेगा। रोशनी में जाने से सच मिलेगा। और आज रात हम सच के साथ जीना चाहते हैं, डर के साथ नहीं।"
उस्ताद पीछे खड़े थे। हाथ में दीया, आँखें आधी बंद। जैसे वो मेरी बात नहीं सुन रहे हों, कुछ और गिन रहे हों।
"उस्ताद?"
उन्होंने आँखें खोलीं।
"तू सही कह रहा है," उन्होंने कहा। "पर ये भी सुन। वो हमें तीन तरफ़ से डरा रहा है। पीछे से खट-खट। सामने स्कूल का गेट। और ऊपर से… कुछ नहीं। ऊपर से चुप्पी।"
"और ऊपर की चुप्पी सबसे खतरनाक है," मीरा ने कहा।
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "क्योंकि जब ऊपर कुछ नहीं होता, तो हम अपने आप ऊपर देखते हैं। और जब हम ऊपर देखते हैं, तो सामने से हमारी आँख हट जाती है।"
मैंने एक गहरी साँस ली।
"ठीक है," मैंने कहा। "तो चलो अंदर। सबको इकट्ठा करते हैं। अभी, जो भी है, ये रात हमें यहीं काटनी है।"
हम आँगन में लौटे। मोमबत्तियाँ बुझ चुकी थीं, और जो बची थीं वो पीली, छोटी लौ के साथ हवा से लड़ रही थीं। शबनम आपा ने अपने स्टोव की तरफ़ देखा, फिर बिना कुछ कहे नई मोमबत्तियाँ जलाईं और लोगों के बीच रख दीं।
पूरी गली बैठी थी। कुछ पीपल की चबूतरी पर, कुछ दुकान के बाहर, कुछ अस्पताल की सीढ़ी पर। और सबके चेहरे पर एक ही चीज़ थी — मोमबत्ती की पीली रोशनी, और उस रोशनी के पीछे छिपा हुआ डर।
मीरा ने कैमरा खोला। उसने स्क्रीन चालू की और तस्वीर दिखाई।
"ये देखो," उसने कहा। "ये जो रणवीर के पीछे खड़ा है।"
मैं आगे झुका।
तस्वीर में रणवीर भारद्वाज मंच पर खड़ा था — हाथ जोड़े, मुस्कुराता हुआ। सफ़ेद कुर्ता, चमकता चेहरा, धूप की तरह साफ़।
और उसके पीछे, ठीक उसके कंधे के पीछे, कुछ था।
कुछ जो इंसान जैसा था, पर इंसान नहीं था।
काले धुएँ जैसा। पर धुआँ नहीं, क्योंकि धुआँ हवा में फैलता है, और ये फैला नहीं था। ये खड़ा था। सीधा। चुप।
न आँख, न नाक, न मुँह। बस एक आकार। एक साया जो किसी के पीछे खड़ा होकर खुद को उसका हिस्सा बना रहा था।
और उस साये की परछाईं — मंच के फर्श पर — सीधी नहीं थी।
वो स्कूल की तरफ़ मुड़ी हुई थी।
लोगों ने देखा। बूढ़े काका, जो पीछे बैठे थे, चश्मा ठीक किया और आगे झुके। नसीमा बाई ने अपनी साड़ी का पल्लू सीने से लगाया। भोला भाई ने अपनी बीवी का हाथ पकड़ा। साजिद ने अपनी माँ के कंधे पर हाथ रखा।
और तभी एक आवाज़ आई।
गिरती हुई मोमबत्ती की।
बबलू था।
वो आँगन के दूसरे कोने में अकेला बैठा था। सफ़ेद रूमाल से बँधा हुआ उसका घायल हाथ गोद में पड़ा था। चेहरा पीला पड़ गया था। और उसके हाथ काँप रहे थे। बस एक नहीं, दोनों।
बबलू पांडे काँप रहा था।
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