The Mysterious Bell – Chapter 636
वो भाग रही थी। उसके हाथ में कैमरा था और वो उसे सीने से चिपकाए हुई थी, जैसे कोई बच्चा हो।
"अंकुश!" उसने कहा। "अंकुश, तू ठीक है?"
"हूँ," मैंने कहा। "तू इतनी देर कहाँ थी?"
"मैं आँगन के दरवाज़े पर थी। पापा और सलीम भाई के साथ। मैंने सुना कि बत्तियाँ गईं और मैं दौड़ी। अंकुश, पूरी गली —"
"मुझे पता है," मैंने कहा।
वो रुकी।
"तूने बत्ती की बात नहीं की," उसने कहा।
"क्या?"
"तेरी आवाज़ में कुछ और है," उसने कहा। "बत्ती से बड़ी कोई बात है।"
ये मीरा है। ये औरत फोटो में सच ढूँढ़ती है, और आवाज़ में भी।
"हाँ," मैंने कहा। "दुकान के अंदर से घंटी बज रही थी। ताला लगा था। मैंने खुद लगाया था।"
मीरा ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपना कैमरा उठाया।
"अंकुश," उसने कहा, "मुझे शाम की तस्वीरें देखनी हैं।"
"अभी?" मैंने कहा। "इस अंधेरे में?"
"बिल्कुल इस अंधेरे में," उसने कहा, और मुझे लगा उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो पहले नहीं था। "क्योंकि जब बत्ती जाती है, तब तस्वीरें बोलती हैं।"
उसने कैमरा चालू किया। छोटी सी स्क्रीन जली। पीली।
बच्चे पीछे से आ गए और उन्होंने अपने गले लंबे कर लिए, जैसे सिनेमा देख रहे हों।
"दिखा," सानिया ने कहा। "दिखा दीदी, क्या दिखा।"
मीरा उँगली से स्क्रीन पर पीछे जाने लगी। तस्वीरें — दरी, कुर्सियाँ, माँ की व्हीलचेयर, डॉक्टर इसरानी का स्टेथोस्कोप, शबनम आपा की केतली, रणवीर का चेहरा।
"ये," उसने कहा। "ये वो तस्वीर है जो मैंने तब ली थी जब वो बोल रहा था। जब वो बोल रहा था कि नई इमारत में सबके नाम का पत्थर होगा।"
वो तस्वीर स्क्रीन पर आई।
रणवीर। सफ़ेद कुर्ता। हाथ जोड़े। मुस्कान। पीछे मंच का सफ़ेद कपड़ा। और उसके पीछे —
"रुक," टिंकू ने कहा। "रुको। ये क्या है?"
मीरा ने स्क्रीन बड़ी की।
और फिर हम सब चुप हो गए।
रणवीर के पीछे एक साया खड़ा था।
काले रंग का। धुँधला। इतना धुँधला कि पहली नज़र में लगे कि कपड़े की सिलवट है, या परदे की छाया। पर वो सिलवट नहीं थी। वो परदा नहीं था।
वो एक आदमी का आकार था।
हाथ लटके हुए। कंधे झुके हुए। सिर थोड़ा झुका हुआ — जैसे कोई रणवीर के कंधे पर झाँक रहा हो।
और चेहरा?
चेहरा नहीं था।
मतलब — चेहरे की जगह थी। आकार था। पर न आँखें, न नाक, न मुँह। बस अंधेरे का एक टुकड़ा, जो इंसान जैसा कटा हुआ था।
बच्चों ने एक साथ साँस रोक दी।
"भैया," सानिया ने कहा। "ये भूत है?"
"नहीं," मैंने कहा। "भूत किसी की पीठ के पीछे खड़ा नहीं होता।"
"फिर ये क्या है?"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उस्ताद ने स्क्रीन को देखा। लंबे समय तक। बहुत लंबे समय तक। और फिर उन्होंने अपना मोटा चश्मा उतार लिया और उसे अपनी जेब से निकले रूमाल से पोंछने लगे — जैसे साफ़ करने से चीज़ें साफ़ हो जाएँगी।
"उस्ताद?" मैंने कहा।
"यह साया नहीं है," उन्होंने कहा।
"तो?"
"यह फूट का आकार है।"
मुझे लगा मेरी रीढ़ से ठंडी सुई गुज़री।
"मतलब?" मीरा ने कहा।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा, जैसे कह रहे हों — अब तुझे बोलना पड़ेगा।
"फूट कोई इंसान नहीं है," मैंने कहा। "वो एक टूटा हुआ तंत्र है। मेरे पास जो घंटी है, उसका उल्टा। मेरी घंटी जोड़ती है, फूट तोड़ता है। और… वो रणवीर के पीछे चलता है। क्योंकि रणवीर उसे खाना देता है। जब शहर में कोई रिश्ता टूटता है, फूट मोटा होता है।"
"अंकुश," शबनम आपा ने धीमे से कहा — और उनकी आवाज़ में वो तेज़ी नहीं थी जो हमेशा रहती है। "तू ये पहले क्यों नहीं बताया?"
"मैंने खुद पूरा नहीं जाना था," मैंने कहा।
और तभी मेरी जेब से घंटी फिर फड़फड़ाई।
मैंने निकाली।
वो गरम थी। बहुत गरम। मैंने हाथ बदला, दूसरे हाथ में ली। वो भी गरम।
"घंटी," मैंने कहा। "क्या है?"
और उस बार उसकी आवाज़ पहले से साफ़ थी। गली जितनी चुप थी, उतनी साफ़।
"वो देख रहा है," घंटी ने कहा।
"कहाँ?"
"वहाँ जहाँ तेरा कल है।"
"कहाँ?"
पर घंटी चुप हो गई। ठंडी हो गई। जैसे बोलने में उसका भी कोई हिसाब लगा हो।
मीरा ने स्क्रीन को फिर देखा।
"अंकुश," उसने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी थी। इतनी धीमी कि बच्चों को सुनने में शायद ही आया हो। "ये साया रणवीर के पीछे है, पर इसकी परछाईं… देख।"
मैंने देखा।
साये की परछाईं मंच के फ़र्श पर पड़ रही थी। काली। लंबी। पर वो सीधे आगे नहीं थी — वो दाईं तरफ़ मुड़ी हुई थी। मंच के कोने से बाहर। तस्वीर के दाईं तरफ़।
और वहाँ, उसी दिशा में — मुझे पता था — स्कूल था।
मीरा ने स्क्रीन सीने से लगा ली और एक लंबी साँस ली।
"अंकुश," उसने कहा, "इस साये की परछाईं हमारी तरफ़ नहीं, स्कूल की तरफ़ है।"
उस्ताद ने मेरा कंधा पकड़ा। उनकी पकड़ भारी थी।
पर मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि उस वक़्त मुझे कुछ और याद आ गया।
दो दिन पहले, स्कूल की छत पर प्लास्टर गिरा था, और चिंटू फिसला था, और स्कूल बंद कर दिया गया था।
"आज रात," मैंने कहा, "किसी को स्कूल नहीं जाना।"
"क्यों?" टिंकू ने कहा।
"क्योंकि मेरी घंटी ने अभी कहा कि वो देख रहा है। और परछाईं स्कूल की तरफ़ है।"
बच्चे चुप हो गए।
"पर भैया," गुड्डू ने कहा, "हम तो स्कूल जाते ही नहीं। हम तो पीछे की छत से चढ़ते हैं।"
"तो आज पीछे की छत भी नहीं," मैंने कहा। "आज रात कोई स्कूल के पास नहीं जाएगा। मेरी बात सबने सुनी?"
"सुनी," उन्होंने कहा — पर मैं जानता हूँ कि इनमें से कोई नहीं सुनेगा।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
उसने कहा, "अंकुश, कल सुबह सात बजे मशीन है। अस्पताल के पीछे। और स्कूल कहीं नहीं जा रहा।"
"मुझे पता है," मैंने कहा।
"तो फिर स्कूल क्यों?"
मैंने घंटी को जेब में डाला।
"क्योंकि आज रात पहले ये साया कुछ करेगा," मैंने कहा। "और जो कुछ करेगा, वो हमें दो जगह बाँटने के लिए होगा। आज सुबह नहीं — आज रात। अभी।"
शबनम आपा ने एक लंबी साँस ली।
"तो हम अंधेरे में बैठे रहें?" उन्होंने कहा। "हम?" — उन्होंने गली की तरफ़ इशारा किया, जहाँ मोमबत्तियाँ जल रही थीं और लोग दरवाज़ों पर खड़े थे।
"नहीं," मैंने कहा। "हम अंधेरे में नहीं बैठेंगे। हम मोमबत्ती जलाएँगे।"
"कितनी?"
"जितनी हैं," मैंने कहा। "सब। और आज रात हम सोएँगे नहीं। हम बैठेंगे — आँगन में, पीपल के नीचे, गुमटी पर। और हम बात करेंगे। पुरानी बातों से। जिन्हें भूल गए थे।"
"क्यों?" हबीब चाचा ने कहा।
"क्योंकि फूट झूठ से बढ़ता है," मैंने कहा, "और सच से सिकुड़ता है। अगर हम आज रात एक-दूसरे को सच बोलेंगे, तो उसकी एक रात खराब होगी। और वो रात में सोचता है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, और उसके चेहरे पर कुछ था — शक नहीं, थोड़ी हिम्मत।
"अंकुश," उसने कहा, "तू ये कहाँ से सीख रहा है?"
मैंने ईमानदारी से जवाब दिया। "पता नहीं। घंटी से। या उस्ताद से। या शायद उस दीवार से जो आज मिली थी।"
उस्ताद मुस्कुराए।
गली में मोमबत्तियाँ बढ़ने लगीं। दरवाज़ों पर औरतें आईं — नसीमा बाई अपनी दुकान उठाकर बाहर खड़ी थी, हाथ में मोमबत्ती; भवानी प्रसाद अपनी छड़ी के सहारे; बंसीलाल अपना लाल धागा वाला हाथ आगे किए; रामलाल अपनी रुकी घड़ी कलाई पर बाँधे; और दुबे अंकल — जो देर से आए थे, अपनी नीली शर्ट में, हाथ में पुरानी छड़ी।
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