The Mysterious Bell – Chapter 635
और तब गली जागी।
दाएँ से — शबनम आपा की आवाज़, बिना डरे, बस थोड़ी तेज़। "अरे! किसने बत्ती गिराई? भोला भाई! भोला भाई, तेरी दुकान की लाइट भी बुझी है क्या?"
बाएँ से — भोला भाई की आवाज़, घबराई हुई। "मेरी नहीं, पूरी गली की बुझी है! मैंने कुछ किया नहीं! मैं तो बैठा था!"
और ऊपर से, दूसरी मंज़िल से — हबीब चाचा की आवाज़, जो असली डर में थी। "अंकुश बेटा! तू वहीं है? कुछ हुआ?"
"हूँ चाचा," मैंने कहा। "सब वहीं रहो। कोई घर से बाहर मत निकले।"
"ये क्या बात हुई?" — नसीमा बाई की आवाज़, दूर गली के मुँह से। "मेरी दुकान की रोशनी भी गई। और मेरा फ्रीज़? बेटा, फ्रीज़ में दूध रखा है!"
"अभी नहीं," मैंने कहा। "फ्रीज़ की बात बाद में।"
और तभी — चप्पलों की तेज़ आवाज़ें। छोटी। कई सारी।
टिंकू ने कहा, "भैया, बच्चे आ रहे हैं।"
वो पीपल की तरफ़ भाग रहे थे। सानिया सबसे आगे, उसके पीछे गुड्डू, फिर चिंटू जो अपनी पैंट की चुन्नट पकड़े हुआ था, और सबसे पीछे रफ़ीक़ — वो तो अपना टूटा चश्मा भी भूल गया, बिना चश्मे के भाग रहा था।
"यहाँ आओ!" मैंने आवाज़ दी। "पीपल के नीचे रुको! अंधेरे में दौड़ो मत!"
वो पीपल के नीचे आकर ठिठक गए। चबूतरी अंधेरे में और भी बड़ी लग रही थी, जैसे कोई बैठा हुआ जानवर हो।
सानिया ने कहा, "भैया, पूरी गली अंधेरी है। मैंने खिड़की से देखा — अस्पताल का बोर्ड भी नहीं जल रहा।"
"मुझे पता है," मैंने कहा।
"भैया, ये करंट गया है क्या?"
"करंट नहीं गया," मैंने कहा।
मैंने घंटी को फिर मुट्ठी में घुमाया।
"बत्ती गई नहीं," घंटी ने इतना धीमा कहा कि बच्चों को सुनाई नहीं दिया। "बत्ती ले गए।"
"कौन ले गया?" मैंने फुसफुसाकर पूछा।
"जो अभी गली में है।"
और उसी वक़्त टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी पकड़ ठंडी थी। बच्चों की पकड़ हमेशा गरम होती है। उसकी ठंडी थी।
"भैया," उसने कहा, "मेरे जूते में कुछ चुभ रहा है।"
"क्या?"
"पता नहीं। रेत जैसा। पर मैंने रेत पर पैर नहीं रखा।"
मैं झुका। अंधेरे में मैंने उसका जूता टटोला। तलवे पर कुछ था। बारीक। राख जैसा।
"सब ठीक है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो ठीक नहीं थी।
तभी — दुकान से आवाज़ आई।
घंटी की आवाज़।
मैं जम गया।
मेरी दुकान का शटर बंद था। ताला लगा था। मैंने खुद लगाया था, आधे घंटे पहले, अपने हाथ से। और अंदर से घंटी बज रही थी।
टिंग। टिंग। टिंग।
धीरे। बराबर। जैसे कोई उँगली से हिला रहा हो।
"भैया…" टिंकू ने धीमे से कहा। "आपकी घंटी तो आपकी जेब में है ना?"
मैंने जेब टटोली। हाँ। घंटी मेरी मुट्ठी में थी।
फिर अंदर कौन बजा रहा था?
"सब यहीं रुको," मैंने कहा। "टिंकू, बच्चों को चबूतरी पर बैठा। सानिया, तू सबसे आगे बैठ, और किसी को भी उठने मत देना।"
"आप कहाँ जा रहे हैं?" सानिया ने कहा।
"अपनी दुकान में," मैंने कहा।
"अंधेरे में?"
"दुकान मेरी है," मैंने कहा। "उससे मुझे डरने की ज़रूरत नहीं।"
मैं शटर तक गया। अंधेरे में हाथ से टटोला। ताला लगा था। कुंडी जाम थी, जैसे हमेशा रहती है। ताला मेरा ही था।
और अंदर से घंटी बज रही थी — टिंग। टिंग।
मैंने चाबी निकाली। हाथ काँप रहा था, ये मैं मानता हूँ। कोई झूठ नहीं। हाथ काँप रहा था।
ताला खुला। शटर उठाया। अंदर अंधेरा।
और शटर उठते ही घंटी की आवाज़ बंद हो गई।
मैं अंदर घुसा। मेज़ पर हाथ रखा। ट्रंक पर हाथ रखा। दीवार पर हाथ रखा।
और तब मुझे नीचे, फ़र्श पर, ट्रंक के पास कुछ चमकता दिखा।
मैं झुका।
एक घंटी थी।
छोटी। पुरानी। जंग लगी।
मेरी घंटी नहीं।
मैंने उसे उठाया। हल्की थी। और उठाते ही वो गरम हो गई — एकदम। जैसे किसी ने अभी-अभी छोड़ी हो।
और तभी मेरी जेब से मेरी अपनी घंटी फड़फड़ाई।
मैंने उसे बाहर निकाला।
वो ठंडी थी, जब मैं घर से निकला था। अब वो भी गरम थी।
"घंटी," मैंने कहा, "ये क्या है?"
और गली में, ठीक मेरे कान के पास, हवा में कुछ फुसफुसाया।
इतना ठंडा कि मेरी गर्दन के बाल खड़े हो गए।
"फूट जागा है।"
मैं एक पल को रुक गया।
"क्या कहा?"
पर हवा चुप हो गई। कोई जवाब नहीं।
मैंने दोनों घंटियाँ जेब में डालीं और दौड़कर बाहर आया।
"टिंकू!"
"हाँ भैया!"
"शबनम आपा को बुला। और उस्ताद को। जल्दी।"
"अंधेरे में?"
"टॉर्च लेकर जा। मेरी दुकान के पीछे वाले कमरे में दो टॉर्च रखी हैं।"
टिंकू भागा। सानिया उसके पीछे भागी। ये बच्चे कभी सुनते नहीं, ये मैं जानता हूँ।
और तब गली में एक पीली रोशनी जली।
छोटी। काँपती। मोमबत्ती की।
शबनम आपा गुमटी से निकलीं, हाथ में मोमबत्ती, और मोमबत्ती हवा में नाच रही थी। उनके पीछे रज़िया थी, एक और मोमबत्ती लिए, और उसके पीछे हाथ में स्टील का गिलास लिए हबीब चाचा, आँगन से निकलकर।
"गली में मोमबत्ती जलाओ!" शबनम आपा ने आवाज़ दी। "हर घर से एक मोमबत्ती! औरतें बाहर निकलें, मर्द दरवाज़े पर खड़े हों! अंधेरे में कोई अकेला नहीं रहेगा, ये मेरी गुमटी की कसम है!"
मुझे हँसी आई। ऐसी कसम मैंने पहली बार सुनी थी।
"आपा," मैंने कहा, "कसम मत खाइए।"
"तू अपनी फ़िक्र कर," उन्होंने कहा। "मैंने सुना है तेरी दुकान में घंटी बज रही थी।"
मैं रुक गया।
"किसने कहा?"
"टिंकू ने।"
टिंकू सामने खड़ा था, दो टॉर्च हाथ में, और मुझे देखकर मुस्कुरा रहा था। भई, ये लड़का।
"भैया, आपने कहा था खबर फैलाओ," उसने कहा।
"मैंने ये नहीं कहा था।"
"पर मैंने सोचा —"
"तू सोचता बहुत है," मैंने कहा, और टॉर्च उसके हाथ से ले ली।
तभी उस्ताद आए।
वो धीरे चलते हैं। उनकी उम्र है। पर उस रात उनके कदम में एक अजीब सी जल्दी थी। उनके हाथ में एक छोटा दीया था — पीतल का, पुराना, जिसे उन्होंने अपनी दुकान के पीछे वाले कमरे से निकाला था।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आप जानते हैं क्या हुआ है?"
उन्होंने दीया मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने लिया।
"यह जला," उन्होंने कहा।
मैंने देखा। दीये में तेल आधा था और बत्ती लाल थी।
"आपने जलाया?"
"नहीं," उन्होंने कहा। "मैंने देखा कि यह जल रहा है।"
मैं कुछ कहने ही वाला था कि उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी पकड़ में ताक़त थी। उम्र के हिसाब से ज़्यादा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तूने कुछ सुना?"
मैंने उनकी आँखों में देखा।
"हाँ," मैंने कहा।
"क्या?"
"फूट जागा है।"
उस्ताद ने आँखें बंद कर लीं। एक पल के लिए उनका चेहरा बूढ़ा हो गया — इससे भी ज़्यादा बूढ़ा।
"उस्ताद?" शबनम आपा ने कहा। "क्या हुआ? आपका चेहरा क्यों…"
"जो जाग गया है," उस्ताद ने धीमे से कहा, "वो सोने का नाटक करेगा।"
गली में चुप्पी।
मोमबत्तियाँ जल रही थीं और उनकी लौ हिल रही थी, हालाँकि हवा नहीं थी।
"मतलब?" मैंने कहा।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"फूट पचास साल से सो रहा था," उन्होंने कहा। "बक्से में। बंद। अधूरा। और अब जो जागा है, वो पहले सो जाएगा — दिखावे में। वो कहेगा कि मैं सो रहा हूँ, मुझे छेड़ो मत। जबकि सच यह है कि वो तेरे घर का दरवाज़ा देख रहा है, तेरे पापा के हाथ देख रहा है, तेरी माँ की दवा देख रहा है।"
"मैं समझा नहीं," मैंने कहा।
"समझ जाएगा," उन्होंने कहा। "पर समझने में देर मत करना।"
और तभी मीरा आई।
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