The Mysterious Bell – Chapter 634
मीरा ने सिर हिलाया। "मेरे पास दो पत्रकार हैं। और बस्ती की आवाज़ का चैनल है।"
"अच्छा," मैंने कहा।
तभी टिंकू ने कहा, "भैया, मैं क्या करूँ?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके घुटने पर पट्टी थी, बाल बेतरतीब, आँखों में वो तेज़ी जो कभी नहीं बुझती।
"तू सबसे ज़रूरी काम करेगा," मैंने कहा।
"क्या?"
"तू सुबह छह बजे से गली के मोड़ पर खड़ा रहेगा। तेरे साथ सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू होंगे। तुम पाँचों मिलकर देखोगे कि कौन आ रहा है — कितने आदमी, कितनी गाड़ियाँ, कौन सा रास्ता। और जो भी दिखे, वो फौरन सानिया अपनी कॉपी में लिखेगी।"
"बस?"
"बस नहीं," मैंने कहा। "अगर तुम्हें लगे कि कोई अनजान आदमी गली के पीछे वाले रास्ते से आ रहा है, तो तुम चुपचाप भागकर बताओगे। न लड़ोगे, न पूछोगे। भागोगे। यह सबसे ज़रूरी काम है, टिंकू। सबसे बहादुर आदमी वो नहीं जो लड़ता है। वो है जो खबर पहुँचाता है।"
टिंकू ने सीना फुलाया। "समझ गया।"
"और हाँ — रफ़ीक़, तू आज सफ़ेद जूते नहीं पहनेगा।"
रफ़ीक़ ने मुँह बनाया।
"मोज़े पहनकर आना," सानिया ने कहा। "गुप्तचर के पाँच नियम याद हैं ना?"
"याद हैं," रफ़ीक़ ने कहा।
मैंने स्लेट रख दी।
"और मैं?" पापा ने कहा।
मैं मुड़ा। पापा आज पूरे दिन चुप थे। उन्होंने लाउडस्पीकर ठीक किया, माँ की कुर्सी पकड़ी, आँगन में सबको बिठाया, और एक बार भी अपनी बात नहीं कही।
"आप," मैंने कहा, "आप सलीम बक्श के साथ पीछे वाले फाटक पर रहेंगे।"
वो एक पल को रुके।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तूने मुझे आज तक पीछे रखा है।"
"नहीं रखा, पापा," मैंने कहा। "आप खुद पीछे रहे हैं। और मुझे पता है क्यों।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"आपको लगता है कि जो अंगूठा आपने लगाया, उसकी वजह से आपके बोलने का हक़ नहीं है," मैंने कहा। "पर सुनिए — उस काग़ज़ पर दो नाम थे। एक आपका, एक मेरा। आपने सिर्फ़ अपना अंगूठा लगाया। मेरी लाइन आज भी खाली है। इसका मतलब यह है कि उस आदमी ने आपसे मेरा हिस्सा भी माँगा था, और आपने नहीं दिया। आपने मुझे बचाया, पापा। आप उस रात डरे हुए थे, अकेले थे, माँ अस्पताल में थीं, और आपने फिर भी मेरा नाम नहीं दिया।"
पापा का हाथ कुर्सी पर कस गया।
वो कुछ नहीं बोले। बस सिर नीचा कर लिया और बहुत धीरे से सिर हिलाया।
माँ ने उनका हाथ पकड़ लिया।
मैंने कहा, "कल सुबह हम सब एक साथ खड़े होंगे। और उसके बाद जो भी हो, हम उसे साथ झेलेंगे। अब कोई अकेले नहीं।"
घंटी मेरी जेब में बजी — छोटी, साफ़।
मैंने उसे निकाला।
"क्या कह रही है?" मीरा ने पूछा।
"कह रही है — चार सौ नाम याद रख," मैंने कहा। "एक भी भूला तो सब बेकार।"
काजल ने कहा, "मैं सुबह पाँच बजे उठ जाऊँगी।"
माँ ने कहा, "मैं चार बजे उठूँगी। पचास रोटियाँ और बनानी हैं।"
"माँ, आप आराम —"
"अंकुश," माँ ने कहा, "मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता, और बात में भी नहीं। चार बजे उठूँगी।"
बात खत्म।
लोग उठने लगे। थालियाँ जमा हुईं। कुर्सियाँ मोड़ी गईं। उस्ताद ने अपनी कैंची उठाई, कपड़े में लपेटी। शबनम आपा ने केतली उठाई और बोलीं, "सुबह चाय मेरी। और अगर कोई मशीन के सामने बेहोश हो जाए, तो पहले उसे पानी, फिर बहस।"
लोग हँसे।
मैं गेट तक उन्हें छोड़ने गया। सब जाते वक़्त एक-एक करके मेरे कंधे पर हाथ रख रहे थे। कोई कुछ नहीं कह रहा था। बस हाथ। और वो हाथ अजीब तरह से भरोसा दे रहे थे — जैसे किसी ने कहा हो, हम आएँगे।
आख़िरी में डॉक्टर इसरानी निकले।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"वो बूढ़ी औरत जो पर्ची दिखा रही थी — उसका बेटा सच में यहीं बचा था?"
वो रुके। उन्होंने अपना टेप वाला स्टेथोस्कोप जेब में रखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं तीस साल से यहाँ हूँ। मुझे याद नहीं कि उस रात का बिल किसने भरा था। पर मुझे इतना याद है कि उस रात के बाद मेरे पास एक पर्ची आई थी जिस पर लिखा था — 'डॉक्टर साहब, मेरे पास जो है, वो कम है। पर जो आपने दिया, वो बहुत है।' वो पर्ची मेरी दराज़ में आज भी है।"
वो चले गए।
मैं आँगन में लौटा। सिर्फ़ माँ, पापा, काजल और टिंकू बचे थे।
"टिंकू, तू कहाँ रुका है?" काजल ने कहा। "तेरी माँ डाँटेगी।"
"मैं भैया के साथ दुकान तक जाऊँगा," टिंकू ने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "आज तू सोने जा। कल सुबह छह बजे तेरा काम शुरू हो जाएगा और मुझे तू थका हुआ नहीं चाहिए।"
वो जाने लगा, फिर रुका।
"भैया।"
"हाँ।"
"अगर कल मशीन आई और हम हार गए —"
"तो?"
"तो तेरी दुकान का क्या होगा?"
मैं एक पल को रुक गया।
"टिंकू," मैंने कहा, "दुकान दीवार से नहीं बनती। दुकान उस आदमी से बनती है जो शटर उठाता है। अगर कल इमारत गई, तो मैं अगले दिन पीपल के नीचे चटाई बिछाकर बैठ जाऊँगा, और मेरी दुकान फिर शुरू हो जाएगी। समझा?"
वो हँसा।
"समझा," उसने कहा, और भाग गया।
मैं दुकान की तरफ़ चला। गली में रोशनी थी — पीपल के नीचे का बल्ब, गुमटी का पीला बल्ब, भोला भाई की दुकान का, और दूर से अस्पताल के सामने वाला पीला बोर्ड, जिस पर डॉक्टर इसरानी का नाम उतरा हुआ था।
मैंने शटर उठाया। अंदर घुसा। बल्ब जलाया। गुनगुनाता पुराना बल्ब।
और फिर जो हुआ —
पहले मुझे लगा कि बल्ब गया।
पर बल्ब नीचे था, मेरे सिर के ऊपर, और वो अभी भी जल रहा था।
जो बुझा, वो बाहर बुझा।
मैं दौड़कर बाहर आया।
गली में अंधेरा था।
पूरी गली में। एक साथ।
पीपल का बल्ब बुझा हुआ था। गुमटी का बल्ब बुझा हुआ था। भोला भाई की दुकान का शटर — जिसके नीचे से हमेशा पीली रोशनी आती थी — वो भी अंधेरा। और दूर, अस्पताल के सामने वाला पीला बोर्ड — वो भी अंधा।
न कोई बत्ती हिल रही थी। न कोई बल्ब कड़कड़ा रहा था।
पूरी गली, एक साँस में, चुप हो गई थी।
मैंने घंटी जेब से निकाली।
वो ठंडी थी।
मैंने उसे हिलाया। कुछ नहीं हुआ।
"घंटी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ गली में अकेली लगी।
और तब फुसफुसाहट आई — इतनी धीमी कि पहले मुझे लगा यह मेरा ही दिमाग़ है।
"बत्ती गई नहीं," घंटी ने कहा। "बत्ती ले गए।"
मैंने अंधेरे में चारों तरफ़ देखा।
"और जिसने ली है," घंटी ने कहा, "वो अभी गली में है।"
मैं सुनने के लिए रुका।
दूर, गली के आख़िरी छोर पर, अंधेरे में कहीं — लकड़ी के जूतों की धीमी आवाज़ आई। एक। दो। तीन।
और फिर बंद हो गई।
॥
अंधेरे में मैं खड़ा रह गया।
तीन कदम। बस तीन कदम सुने थे मैंने। लकड़ी के जूतों की धीमी आवाज़ — एक, दो, तीन — और फिर गली में ऐसी चुप्पी बैठ गई जैसे किसी ने पूरी बस्ती के कान पकड़ लिए हों।
मैंने घंटी मुट्ठी में कस ली। ठंडी थी। इतनी ठंडी जैसे बर्फ की गोली हो।
"कोई है?" मैंने कहा।
मेरी अपनी आवाज़ मुझे अजनबी लगी। गली में फैल गई और दीवारों से टकराकर लौट आई, जैसे कोई मेरी नक़ल कर रहा हो।
"अंकुश भैया?" — पीछे से टिंकू की आवाज़ आई। छोटी, काँपती, पर फिर भी हिम्मत वाली।
"यहीं हूँ," मैंने कहा। "कहीं मत जा। जहाँ है वहीं खड़ा रह।"
"मैं तो दुकान के बाहर ही खड़ा हूँ," उसने कहा। "पर भैया, मुझे कुछ दिख नहीं रहा। बिल्कुल भी नहीं।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno