The Mysterious Bell – Chapter 633
एक आदमी आगे आया — लंबा, पतला, हाथ में थाली। उसने पहले थाली नीचे रखी, फिर बोला। "मेरी बीवी का ऑपरेशन यहीं हुआ। डॉक्टर साहब ने कहा था कि माँ बचेगी, बच्चा नहीं। दोनों बच गए। मेरी बेटी सात साल की है और उसका नाम मैंने इसी अस्पताल के नाम पर रखा — नूर। स्कूल में सब उसे नूर कहते हैं और मुझे हर बार यह अस्पताल याद आता है। मैं यह नाम नहीं बदलूँगा और यह ज़मीन नहीं छोड़ूँगा।"
फिर रामलाल आगे आए — स्कूल के चौकीदार, कंधे झुके हुए। उन्होंने अपनी कलाई उठाई, रुकी हुई घड़ी दिखाई। "यह तीस साल की नौकरी की घड़ी है। दस बजकर कुछ मिनट पर रुकी है। जिस रात स्कूल की ज़मीन का पहला काग़ज़ बना, उसी रात। मैं उसे नहीं बदलूँगा, क्योंकि मुझे याद रखना है कि मैं उस रात चुप रहा था। आज चुप नहीं रहूँगा।"
फिर भवानी प्रसाद आगे आए। उनके हाथ में काग़ज़ था, और हाथ काँप रहा था, पर वो पीछे नहीं हटे। "मैं रजिस्ट्री दफ़्तार में सत्तर साल से काग़ज़ देख रहा हूँ। मैंने अपनी ज़िंदगी में सैकड़ों काग़ज़ छिपाए हैं, किसी के डर से, किसी के पैसे से। पहली बार मैं अपना काग़ज़ दिखा रहा हूँ।"
फिर हबीब चाचा आए। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस यह कहा — "मेरा बेटा इमरान अंदर बंद है। उसकी माँ सो नहीं रही। जिस दिन चाचा अपने बेटे को खोजने यहाँ तक आया, उस दिन मैं नहीं जा सकता।"
फिर शबनम आपा आईं, चिमटी हाथ में। "मैं उस इमारत में चाय नहीं बेचूँगी जिसकी नींव में किसी का घर टूटा हो। मेरी दुकान ही मेरी इमारत है। बाक़ी आप सोच लीजिए।"
फिर रज़िया आगे आई, पंद्रह साल बाद लौटी रज़िया, सूटकेस वाली रज़िया। उसने कुछ लंबा नहीं कहा। बस इतना — "मैं पंद्रह साल बाहर रही। अब और नहीं रहूँगी। जो मेरे हिस्से का है, वो यहीं है।"
फिर सानिया ने अपनी लाल कवर वाली कॉपी खोली। उसने ऊँची आवाज़ में पढ़ा — "पंद्रह तारीख़, सुबह सात बजे, मशीन, दो ट्रक, चार आदमी। सोलह तारीख़, शाम पाँच बजे, सफ़ेद गाड़ी, तीन आदमी। सत्रह तारीख़, दोपहर दो बजे, टेम्पो, बोरियाँ।"
वो रुकी और कहा, "बाक़ी अगली कॉपी में है।"
आँगन में पहली बार तालियाँ बजीं।
न तालियाँ किसी भाषण पर बजीं, न किसी नेता पर। चार सौ लोगों ने, जिनमें से आधे अपनी थाली लिए खड़े थे, एक तेरह साल की लड़की के हाथ में पकड़ी कॉपी पर तालियाँ बजाईं।
और तभी बबलू खड़ा हुआ।
वो पत्थर पर से उठा। उसने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपना सफ़ेद रूमाल बँधा हाथ ऊपर उठाया — जैसे कोई सबूत दिखा रहा हो।
और फिर वो बोला, इतना धीरे कि पहले किसी ने नहीं सुना। "मेरा नाम भी उस काग़ज़ में है।"
आँगन में सन्नाटा।
"मैं वो काग़ज़ नहीं बेचूँगा," उसने कहा।
और वो बैठ गया। नीचे ज़मीन पर, पत्थर पर, थाली गोद में, और रोटी तोड़ने लगा।
माँ ने व्हीलचेयर से कहा, किसी से नहीं, खुद से जैसे — "अब खाना ठंडा हो जाएगा।"
मैं मुड़कर गाड़ी की तरफ़ देखा।
रणवीर की खिड़की अब भी खुली थी।
वो सब सुन रहा था। कुछ नहीं कह रहा था। उसके चेहरे पर वही मुस्कान थी — वो मुस्कान जो हर तस्वीर में होती है, जिसमें हाथ जुड़े होते हैं और नीचे लिखा होता है कि वो कितना समाजसेवी है।
और फिर उसने तालियाँ बजाईं।
धीमी। तीन बार। अकेले। जैसे कोई ताली नहीं बजा रहा हो, बल्कि गिन रहा हो।
"सुंदर," उसने कहा। "सच में सुंदर।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश, तुमने आज मेरा एक बड़ा काम कर दिया। मैं महीनों से पूछ रहा था कि इस गली में कौन किसके साथ है। कोई बता नहीं रहा था। आज सबने खुद बता दिया।"
उसने मेरी तरफ़ उँगली उठाई।
"याद रखना। जो आदमी आज यहाँ चार सौ लोगों के सामने खड़ा हुआ, वो कल छिप नहीं सकेगा। ऐलान करना आसान होता है। निभाना मुश्किल। और मैं बहुत धैर्य से देखता हूँ।"
उसने शीशा चढ़ा दिया।
गाड़ी चली और मोड़ से गायब हो गई।
मैं कुछ देर खड़ा रहा। गिलास अब भी मेरे हाथ में था, आधा खाली।
और मुझे पहली बार लगा कि उस आदमी की आँखों में कुछ बदल गया है। वहाँ जो पहले ठंडा यक़ीन था, वो अब ठंडा गुस्सा हो गया था। मुस्कान वही थी, पर आँखें नहीं थीं।
तुम सोच रहे होगे कि यह अच्छी बात है — दुश्मन गुस्सा हो गया। नहीं। गुस्सा होना उसके लिए कमज़ोरी नहीं है। वो आदमी गुस्से में ही सबसे ठंडा होता है। और आज वो चार सौ नाम लेकर गया है।
आँगन में लौटा तो लोग वैसे ही बैठे थे, पर माहौल बदल गया था। कुछ चेहरों पर डर आ गया था। कोई किसी से धीरे बोल रहा था। भवानी प्रसाद अपना काग़ज़ सीने से चिपकाए हुए थे, जैसे किसी ने उन्हें देख लिया हो और अब ले जाएगा।
मैं उस्ताद के पास गया।
"उस्ताद, हमने कुछ गलत किया क्या?"
उन्होंने मुझे देखा। चश्मा नाक पर था, कान के पीछे पेंसिल।
"बच्चे," उन्होंने कहा, "तूने लोगों को बोलने पर मजबूर किया। आज जिसने अपनी बात कही, वो अब लौट नहीं सकता। यह अच्छा है। पर एक बात मान ले — जब लोग अपनी बात कह देते हैं, तब उनकी हिफ़ाज़त करनी पड़ती है। बोलना आसान है, उसके बाद उस आदमी के घर तक पहुँचना मुश्किल।"
"तो हम क्या करें?"
"बैठ," उन्होंने कहा। "पहले खाना खा। फिर सबको बता कि आज रात और कल सुबह कौन कहाँ खड़ा रहेगा। डर उसी वक़्त घटता है जब आदमी को पता हो कि उसे कहाँ खड़ा होना है।"
इसलिए खाने के बाद हम बैठे।
माँ व्हीलचेयर में आँगन के किनारे थीं। पापा उनके पीछे खड़े थे, हाथ उनकी कुर्सी पर। उस्ताद स्टूल पर। डॉक्टर इसरानी सीढ़ी की पहली पायदान पर बैठे थे। मीरा ने अपना कैमरा मेज़ पर रख दिया था — आज रिकॉर्ड नहीं करना था, आज सिर्फ़ बात करनी थी। टिंकू मेरे पैर के पास बैठ गया। शबनम आपा ने चाय की केतली रखी और खुद भी बैठ गईं। रज़िया उनके पीछे खड़ी रही। हबीब चाचा हाथ पर हाथ रखे बैठे थे। बबलू किनारे पर।
मैंने एक पुरानी स्लेट उठाई और उस पर पेंसिल से दो खाने बनाए।
"दो जगह हैं," मैंने कहा। "एक — यह आँगन, अस्पताल का सामने का हिस्सा। दूसरा — पीछे वाला प्लॉट, जहाँ सात बजे मशीन आएगी। रणवीर ने साफ़ कह दिया है कि मैं एक ही जगह रह सकूँगा। इसका मतलब है कि उसे उम्मीद है कि मैं एक जगह रहूँगा और दूसरी जगह खाली मिलेगी।"
"तो?" शबनम आपा ने कहा।
"तो दोनों जगह भरी होंगी," मैंने कहा। "और दोनों जगह पर मैं नहीं रहूँगा।"
सब चुप हो गए।
मैंने स्लेट पर पेंसिल चलाई।
"सात बजे मशीन के सामने ये लोग खड़े रहेंगे — उस्ताद अली बक्श, शबनम आपा, हबीब चाचा, रज़िया, भवानी प्रसाद जी, रामलाल, बंसीलाल, और गली की औरतें — जो भी अपने साथ आना चाहें। सामने बस एक काम है। मशीन आए, तो कोई हटेगा नहीं। कोई नहीं हटेगा। बस। न नारे, न तोड़फोड़। खड़े रहना है।"
"और अगर मशीन चल पड़ी?" किसी ने पूछा।
"तब भी कोई नहीं हटेगा," उस्ताद ने कहा। "मशीन आदमी के ऊपर नहीं चलती। मशीन वाला आदमी चलाता है। और वो आदमी भी अपनी जान बचाकर भागता है।"
"आँगन में?" डॉक्टर इसरानी ने पूछा।
"आँगन में मैं रहूँगा," मैंने कहा। "मीरा, काजल, माँ और सारे मरीज़। हमारा काम यह साबित करना है कि अस्पताल खाली नहीं है। जिस काग़ज़ पर लिखा है कि मरीज़ चौबीस घंटे में हटेंगे, वो काग़ज़ सिर्फ़ तब काम करता है जब मरीज़ खुद हट जाएँ। अगर एक भी मरीज़ अपने बिस्तर पर लेटा रहे, तो उन्हें उसे हाथ लगाना पड़ेगा। और उसका वीडियो आज रात से हर जगह जाएगा।"
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