The Mysterious Bell – Chapter 632
बबलू ने उसकी तरफ़ देखा भी नहीं। बस रोटी उठाई और खाने लगा।
मैं आँगन के किनारे खड़ा था, थाली हाथ में, और सोच रहा था कि आज सुबह जब मैं उठा था तो मेरे पास क्या था। एक दुकान, जिसके शटर पर दस दिन का पीला नोटिस चिपका था। एक घंटी, जिसके अंक गिनते-गिनते मैं थक गया था। एक माँ, जिसकी दवा रुकी हुई थी। और एक गली, जिसे मैं अकेले बचाने निकला था।
अब चार सौ लोग आँगन में बैठे थे और रोटी तोड़ रहे थे।
तुम सोच रहे होगे कि यह भावुक बात है। हाँ, है। पर यह भी सच है कि अगली सुबह सात बजे मशीन आने वाली थी, और भावुकता मशीन के सामने नहीं टिकती। मशीन को काग़ज़ चाहिए, मुहर चाहिए, और एक आदमी जो उस मुहर के साथ खड़ा हो।
तभी सानिया ने कहा, "भैया, सफ़ेद गाड़ी अभी भी मोड़ पर है।"
मैंने सिर उठाया।
गुड्डू दौड़कर गेट तक गया, झाँका, लौटा। "हाँ, खड़ी है। बत्ती जल रही है। इंजन की आवाज़ आ रही है, पर गाड़ी हिल नहीं रही।"
आँगन में हँसी धीमी हो गई। एक-एक करके हाथ रुकने लगे। यही होता है — जब कोई खतरा जाता है, तो बैठे-बैठे लोग धीरे-धीरे चुप हो जाते हैं, जैसे किसी ने कमरे में पंखा बंद कर दिया हो।
माँ ने अपनी थाली रखी और मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश।"
"हाँ, माँ।"
"जो आदमी यहाँ से खाली हाथ लौट रहा है," उन्होंने कहा, "उसे पानी तो दे आ जाता है।"
मैं एक पल को रुक गया।
काजल ने स्टील का गिलास भरकर मेरे हाथ में रख दिया। ठंडा पानी। माँ की बात सुनकर वो कुछ नहीं बोली, पर उसका हाथ थोड़ा तेज़ हिल रहा था।
मैंने गिलास लिया और गली के मुँह की तरफ़ चल पड़ा।
और मेरे पीछे आँगन में कोई नहीं बोला, पर मुझे पता था कि चार सौ जोड़ी आँखें मेरे कंधों पर थीं। अब यह सिर्फ़ मेरी घंटी और मेरी दुकान की बात नहीं थी। आज आँगन में जो बना था, वो अब मेरे पैरों के साथ चल रहा था।
सफ़ेद गाड़ी गली के मोड़ पर खड़ी थी। इंजन धीरे-धीरे चल रहा था, जैसे कोई आदमी साँस रोककर बैठा हो। हेडलाइट जल रही थी और उसकी रोशनी में गली की धूल तैर रही थी।
मैं खिड़की के पास गया और खड़ा हो गया।
शीशा नीचे आया। धीरे-धीरे, आराम से। जैसे उसे कोई जल्दी नहीं थी।
रणवीर भारद्वाज अंदर बैठा था। सफ़ेद कुर्ता, साफ़ हाथ, हाथ में मोबाइल, और चेहरे पर वही मुस्कान जो हर तस्वीर में होती है।
"बोलो," उसने कहा।
मैंने गिलास आगे बढ़ाया।
"माँ ने भेजा है। कहा कि जो आदमी खाली हाथ लौट रहा है, उसे पानी तो दे आ।"
वो एक पल को रुका।
फिर उसने गिलास लिया। उसका हाथ नहीं काँपा। उसने एक घूँट पिया, और मुझे वापस थमा दिया।
"तुम्हारी माँ का हाथ अच्छा है," उसने कहा। "ऐसे लोग कम बचे हैं।"
"कम नहीं हैं," मैंने कहा। "आप उन्हें ढूँढना बंद कर दीजिए, बहुत मिल जाएँगे।"
वो हँसा। छोटी हँसी, नाक से।
"अंकुश, तुम्हारी एक आदत है," उसने कहा। "तुम हर बात को मज़ाक में बदल देते हो। यह अच्छी आदत है, जब तक तुम्हें कोई गंभीरता से कुछ कहना न हो। फिर यह तुम्हें बचाती नहीं, डुबो देती है।"
मैंने गिलास अपनी जेब के पास दबाया और उसकी आँखों में देखा।
"मुझे आपसे एक बात कहनी है," मैंने कहा। "और यह मज़ाक नहीं है।"
"कहो।"
"बनाने से पहले पूछ लेना।"
वो ठहरा।
"किससे?"
"उनसे जिनकी ज़मीन पर बनाओगे," मैंने कहा। "इमारत उनकी होगी, दीवार उनकी होगी, बत्ती उनकी होगी — तो पूछ लेना एक बार। बस एक बार। क्योंकि जो जोड़ तुम तोड़ोगे, वो जुड़ जाएगा — पर आख़िरी बार जुड़ेगा। और उसके बाद कोई नहीं जुड़ेगा।"
वो मेरी तरफ़ देखता रहा।
"तुम्हारे पास काग़ज़ है, मुहर है, वकील है, तारीख़ है," मैंने कहा। "मेरे पास सिर्फ़ एक गली है और एक घंटी। पर सुन लो — जिस दिन तुम्हारी इमारत बनेगी और उसमें कोई नहीं रहेगा, उस दिन तुम्हारे पास काग़ज़ बचेगा, मुहर बचेगी, और इमारत भी बचेगी। बस उसे घर कहने वाला कोई नहीं होगा।"
वो पीछे टिका और उसने वो हँसी हँसी जो अब तक मैंने नहीं सुनी थी। खुली हँसी। जैसे किसी ने अच्छा चुटकुला सुनाया हो।
"अंकुश," उसने कहा, "भावना अच्छी है। सच में अच्छी है। तुम्हारी उम्र में मैंने भी ऐसी बातें कही थीं। पर एक बात समझ लो — काग़ज़ काग़ज़ होता है, और मुहर मुहर। भावना से रजिस्ट्री नहीं होती। भावना से ताला नहीं खुलता। और भावना रात को सो जाती है, पर तारीख़ नहीं सोती।"
"सही कहा," किसी ने कहा।
मैं मुड़ा।
डॉक्टर निहाल इसरानी खड़े थे। उनके हाथ में टेप से लिपटा पुराना स्टेथोस्कोप था, और वो उसे पकड़े हुए ऐसे खड़े थे जैसे कोई लाठी पकड़कर खड़ा होता है।
"मुहर से इलाज नहीं होता," उन्होंने कहा। "इलाज से मुहर बनती है।"
रणवीर ने उनकी तरफ़ देखा।
"डॉक्टर साहब, आपकी इज़्ज़त है," उसने कहा। "मैंने आपके लिए कमरा भी रखा था। नई इमारत की दूसरी मंज़िल पर। साफ़, हवादार, बड़ी खिड़की।"
"मुझे खिड़की नहीं चाहिए," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "मुझे वही दरवाज़ा चाहिए जो रात दो बजे खुलता हो।"
वो गाड़ी से थोड़ा और बाहर झुका।
"और एक बात," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "इस अस्पताल में तीस साल से एक मुहर बन रही है। वो कोई दफ़्तार ने नहीं लगाई। वो मरीज़ों ने लगाई है। जो आदमी यहाँ रात भर बैठा, जो माँ अपने बच्चे को लेकर दौड़ी आई, जो बूढ़ा अपनी दवा के लिए सीढ़ी पर बैठा — उन सबके हाथों ने मिलकर वो मुहर बनाई है। आपके काग़ज़ पर जो स्याही है, वो सिर्फ़ उस मुहर के ऊपर लगी है। मुहर नीचे है। और नीचे वाली चीज़ को आप नहीं मिटा सकते।"
गली के मुँह पर भीड़ जमा होने लगी थी। मुझे पता नहीं चला कब। आँगन से लोग उठकर गेट तक आ गए थे — हाथ में थालियाँ लिए, कुछ खाते हुए, कुछ भूखे ही।
तभी भीड़ में से एक आवाज़ आई।
"मुझे बोलने दीजिए।"
सब हट गए।
एक बूढ़ी औरत आगे आई। साफ़ साड़ी, सफ़ेद बाल, कमर झुकी हुई, हाथ में एक काग़ज़ — पुरानी पर्ची, इतनी बार मोड़ी गई थी कि किनारे मुलायम हो गए थे, जैसे कपड़ा हो।
वो गाड़ी के पास आई। खिड़की तक। और उसने वो पर्ची ऊपर उठा दी।
"यह पर्ची मेरे पास बारह साल से है," उसने कहा। "इस पर यहीं के डॉक्टर साहब का हाथ है। मेरा बेटा रात को आया था — साँस रुक रही थी, आँखें पलट रही थीं, मैं रो रही थी, और मेरे हाथ में पैसे नहीं थे। पूरे डेढ़ सौ रुपये थे और मुझे लगता था कि एक हज़ार लगेंगे। उस रात दूसरे अस्पताल ने मुझे बाहर खड़ा कर दिया था। यहाँ का शटर खुला था। डॉक्टर साहब खुद बाहर आए, मेरे बेटे को गोद में लिया, और अंदर ले गए।"
वो रुकी। उसकी आवाज़ में कुछ नहीं बदला। सीधी बात, जैसे कोई हिसाब बता रहा हो।
"मुझे नहीं पता उस रात का बिल किसने भरा," उसने कहा। "मैंने आज तक नहीं जाना। और मैं आज तक नहीं पूछा, क्योंकि मुझे डर लगता है कि कहीं पूछने से मेरा बेटा वापस न चला जाए।"
उसने पर्ची को सीने से लगाया।
"मेरा बेटा अब नए बाज़ार में टेम्पो चलाता है," उसने कहा। "शादी हो गई, दो बच्चे हैं। और आज मैं आपको साफ़ बता दूँ — मैं यह ज़मीन नहीं छोड़ूँगी। मुझे आपकी बीस मंज़िला इमारत नहीं चाहिए। मुझे वही दरवाज़ा चाहिए जो रात दो बजे खुला था।"
वो पीछे हटी और भीड़ में खड़ी हो गई। उसका काम खत्म।
और फिर जो हुआ, वो मैंने कभी नहीं देखा था।
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