The Mysterious Bell63 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 63

7 min read November 5, 2026

पापा ने फोटो की तरफ़ देखा। एक लंबी साँस ली। फिर उन्होंने नज़र फेर ली।

"वो तेरे दादा के ज़माने का आदमी था," पापा ने कहा। "उसकी दुकान पीछे की गली में थी। वो… वो हमारे यहाँ आता-जाता था।"

"नाम?"

"अब क्या फ़र्क़ पड़ता है?"

"पापा—"

"अंकुश।" उनकी आवाज़ अचानक सख़्त हो गई। "फोटो रख। पहले काग़ज़ देख।"

मैंने फोटो नीचे रख दी।

मैंने काग़ज़ उठाया। पहला काग़ज़। मुड़ा हुआ। पीला। किनारों से थोड़ा फटा हुआ।

मैंने उसे खोला।

वो एक लिखा हुआ काग़ज़ था — हाथ से लिखा, नीली स्याही से, बहुत साल पुरानी स्याही। नीचे की तरफ़ एक लाल अंगूठे का निशान था — पापा का। और ऊपर बीच में लिखा था — किसी और का नाम। और उसके नीचे, गवाह की जगह पर, एक नाम।

उस्ताद अली बक्श।

मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ लिया। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं। काग़ज़ मेरे हाथ में हल्का था, पर उसमें वो वज़न था जो पूरी गली को दबाकर बैठा था।

"पापा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी। "उस्ताद की जगह… गवाह की जगह… उनका नाम है।"

पापा ने सिर हिलाया।

"मतलब वो वहाँ थे?" मैंने कहा। "जब आपने अंगूठा लगाया, वो वहाँ थे?"

पापा ने फिर सिर हिलाया। फिर उन्होंने अपनी आवाज़ इतनी धीमी कर दी कि मुझे सुनने के लिए आगे झुकना पड़ा।

"उस्ताद ही मुझे उस कमरे में ले गए थे," उन्होंने कहा। "वो जानते थे।"

कमरे में चुप्पी छा गई।

"और जब मैं काँप रहा था," पापा ने कहा, "जब मेरा हाथ स्याही की डिब्बी तक नहीं जा रहा था, तब वो मेरे पास खड़े थे। उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा। फिर मेरा हाथ पकड़ा। फिर स्याही की डिब्बी मेरे अंगूठे के नीचे रखी। और फिर वो… वो बाहर आ गए।"

काजल ने अपना हाथ मेरी कलाई पर रख दिया।

"और आप अंदर अकेले रह गए?" उसने पूछा, बहुत धीमे से।

पापा ने कुछ नहीं कहा।

मैंने घंटी की तरफ़ देखा। मेरी जेब में वो अब भी थी। वो हिल नहीं रही थी। चुप थी।

पर मुझे लगा जैसे उस रात वो बहुत पुरानी और बहुत थकी हुई आवाज़ में बोली — सिर्फ़ एक बार — "अब तुम जान गए।"

और मैं वहीं बैठा रहा, पापा के सामने, संदूक खुला हुआ, फोटो हाथ में, उस्ताद का नाम काग़ज़ पर, और मेरे अंदर कुछ ऐसा टूटा जो मैं नाम नहीं दे सकता था।

क्योंकि मेरे पास घंटी थी।

और मेरे पास तंत्र था।

और वो सब कुछ जोड़ सकता था।

पर किसी ने ये नहीं बताया था कि सबसे पहले मुझे खुद को जोड़ना पड़ेगा।

॥

मैं उस फ़र्श पर बैठा रहा। कितनी देर, ये मुझे नहीं पता। संदूक का ढक्कन उल्टा पड़ा था और उसके अंदर से पुरानी लकड़ी, नैफ़्तलीन और कुछ जला हुआ काग़ज़ जैसी बदबू आ रही थी।

फोटो मेरे बाएँ हाथ में थी। काग़ज़ मेरे दाएँ हाथ में। और दोनों के बीच में जो बैठा था, वो मैं था — पर मुझे लग रहा था जैसे मैं खुद अपने से थोड़ा दूर जाकर बैठ गया हूँ, और वहाँ से देख रहा हूँ कि कमरे में क्या हो रहा है।

काजल ने मेरी कलाई छोड़ी नहीं थी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं और उसकी साँस बहुत धीमी।

माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। वो अंदर नहीं आईं। बस खड़ी रहीं, दोनों हाथ साड़ी के पल्लू में लपेटे हुए। उनका चेहरा उस पुराने बल्ब की रोशनी में पीला दिख रहा था और उनकी खाँसी दबी हुई थी — जैसे वो खाँसना चाहती हों पर कमरे में आवाज़ न करना चाहती हों।

पापा मेरे सामने बैठे थे। चश्मा घुटने पर रखा था। और उनकी आँखें… उनकी आँखें उस काग़ज़ पर टिकी थीं, जो मेरे हाथ में था।

मैंने काग़ज़ को करीब किया और फिर से पढ़ा। नीले रंग की स्याही, हाथ की लिखाई, बीच में किसी और का नाम, नीचे पापा का लाल अंगूठा, और उसके बगल में — गवाह। उस्ताद अली बक्श।

तुम सोच रहे होगे कि एक नाम से क्या फ़र्क़ पड़ता है। तो सुनो। उस रात मुझे ये समझ आया कि नाम सिर्फ़ नाम नहीं होता। नाम एक जगह होती है। और अगर कोई नाम किसी काग़ज़ पर गवाह की जगह लिखा हो, तो उसका मतलब है वो आदमी उस वक़्त वहाँ खड़ा था। उसने देखा था। उसने सुना था। और वो चुप रहा।

मैंने धीरे से काग़ज़ नीचे रखा।

"पापा," मैंने कहा, "कल सुबह मैं उस्ताद के पास जाऊँगा।"

पापा ने कुछ नहीं कहा।

"आप मना करेंगे तो भी जाऊँगा," मैंने कहा। "पर मैं चाहता हूँ कि आप मना न करें।"

पापा ने बहुत देर तक मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने वो चश्मा उठाया, कान पर टेप से बाँधा, और बहुत धीमे से कहा, "जब जाओ, तो उनसे ये मत कहना कि मैंने कुछ कहा था। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा था। मुझे बचाया था। अपने तरीक़े से।"

ये सुनकर मेरे अंदर कुछ ऐसा हिला जो मैं नाम नहीं दे सकता। पापा आज भी उस आदमी को बचा रहे थे। साठ साल के आदमी के पास बचाने के लिए सिर्फ़ यही बचा था — दोष किसी और पर मत डालो।

मैं उठा। काग़ज़ को एक पुराने अख़बार की तह में रखा, फिर उसे अपनी क़मीज़ की अंदरूनी जेब में डाला, जो पेट की तरफ़ थी। ये मैंने जानबूझकर किया। अगर कोई मुझे रोके, तो काग़ज़ मेरे हाथ में नहीं, मेरे शरीर पर होगा।

काजल उठी और उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।

"मैं साथ चलूँ?" उसने पूछा।

"नहीं," मैंने कहा। "तू माँ के पास रह। सुबह डॉक्टर इसरानी के पास जाना है। दस बजे। चाय की शर्त है, मत भूलना।"

काजल ने सिर हिलाया, पर उसकी आँखों में वो बात थी जो पूछी नहीं गई थी — कि जब उस्ताद का नाम उस काग़ज़ पर है, तो फिर उस नीले दरवाज़े वाले कमरे की चाबी उस्ताद ने इतनी आसानी से क्यों दी थी?

मैंने उस सवाल का जवाब नहीं दिया, क्योंकि मेरे पास जवाब नहीं था।

मैं बाहर निकला। गली में ठंडी हवा चल रही थी और पीपल के पत्ते ऐसे बोल रहे थे जैसे कोई बूढ़ा आदमी नींद में कुछ बड़बड़ा रहा हो। नाली के पास एक कुत्ता सिकुड़ा हुआ सो रहा था। दूर कहीं, पीछे के प्लॉट से एक ट्रक की भारी आवाज़ आई और फिर मिट्टी गिरने की आवाज़ आई — धड़ाम। मैंने घड़ी नहीं देखी, पर मुझे पता था कि वो भारद्वाज कंस्ट्रक्शन के ट्रक थे, जो रात में मिट्टी डालते थे, जैसे चोर जो दिन में नहीं, रात में दीवारें बनाते हैं।

मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी को छुआ। वो ठंडी थी, पर उस रात उसमें कुछ और भी था। जैसे वो सो रही हो और मैं उसे जगाना नहीं चाहता था।

सुबह जल्दी उठा। आसमान सफ़ेद हो रहा था और गली में सिर्फ़ शबनम आपा की गुमटी के नीचे से धुआँ उठ रहा था। वो अपनी बड़ी केतली को ईंटों पर रख रही थीं, और चिमटी उनके हाथ में थी, और वो कुछ बड़बड़ा रही थीं — ये उनका सुबह का तरीक़ा था, जैसे केतली से बात कर रही हों।

"उस्ताद की दुकान पर जा रहा हूँ," मैंने कहा।

"जानती हूँ," उन्होंने बिना देखे कहा।

"कैसे?"

"तेरी शक्ल देखकर। तू जब किसी से लड़ने जाता है तो गाल ऐसे ही चढ़ जाते हैं।"

"मैं लड़ने नहीं जा रहा।"

"हाँ, तो और बुरा है।" उन्होंने चाय एक छोटे गिलास में डाली और मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "जो लड़ने जाता है, वो कम से कम जानता है कि दुश्मन कौन है। जो समझाने जाता है, उसके हाथ में कुछ नहीं होता।"

मैंने चाय पी। बहुत गरम थी और उसमें अदरक तेज़ था।

"आपा," मैंने कहा, "आप मुझे कुछ बता रही हैं ना?"

वो रुकीं। चिमटी नीचे रखी। फिर उन्होंने अपना हाथ ऊपर उठाया और मेरे कंधे पर रखा — ये पहली बार हुआ था। शबनम आपा किसी को छूती नहीं थीं, छूने की ज़रूरत नहीं समझती थीं।

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