The Mysterious Bell – Chapter 62
"मैं कह रही हूँ कि उन्होंने अचानक क्यों माना?"
मैंने उस बल्ब की तरफ़ देखा। फिर ताले की तरफ़। फिर उस अंधेरे शटर की तरफ़ जिसके अंदर पुरानी सिलाई मशीन खड़ी थी, शायद आज रात भी टिक-टिक नहीं कर रही थी।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर तूने अच्छा सवाल पूछा।"
"हम्म।"
"अब चल। घर चल। फिर सोचेंगे।"
हम आगे बढ़े। पीपल की चबूतरी के पास से गुज़रे। एक कुत्ता वहाँ सो रहा था, उसने हमें देखा, सिर उठाया, फिर वापस सिर रख दिया। उसे हमसे कोई मतलब नहीं था। कुत्ते बहुत समझदार होते हैं — वो जानते हैं कब किससे डरना है और कब नहीं।
गली के मोड़ पर पुराना नल था, पत्थर के टैंक के पास, और वहाँ से पानी टपक रहा था — टप, टप, टप — हर दो सेकंड में। रात में वो आवाज़ बहुत तेज़ लगती है। मुझे लगा जैसे वो पानी नहीं, वक़्त टपक रहा है।
और फिर हम घर पहुँचे।
दरवाज़ा खुला था।
माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं।
उनके हाथ अब भी खाली थे। उन्होंने साड़ी का पल्लू कमर में खोंस रखा था, और उनके माथे पर चंदन का टीका थोड़ा फैल गया था, जैसे उन्होंने बीच में माथा पोंछा हो। उनकी आँखें लाल थीं, पर वो रो नहीं रही थीं। वो बस खड़ी थीं, और उनके चेहरे पर वो भाव था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — किसी औरत का चेहरा जब वो अपने घर की दहलीज़ पर खड़ी हो और उसे पता हो कि अंदर कोई टूटा बैठा है और बाहर कोई आने वाला है।
काजल उनके पास गई। और कुछ नहीं बोली। बस उनसे लिपट गई। और माँ ने उसका सिर पकड़ा और उसके बालों में उँगलियाँ फिराईं।
"अंदर आ," माँ ने कहा। सिर्फ़ इतना।
हम अंदर गए।
पापा बैठे थे।
वही जगह — चूल्हे के पास वाला फ़र्श, पर चूल्हा अब बुझ चुका था। उसकी राख में आख़िरी अंगारा भी ठंडा हो रहा था। पापा की गोद में लकड़ी की वो छड़ी अब भी थी, पर उन्होंने उसे ज़मीन पर रख दिया था, जैसे छोड़ दिया हो। उनका चश्मा कान पर टेप से बँधा था, और टेप अब काला पड़ चुका था। उन्होंने हम दोनों को देखा — पहले काजल को, फिर मुझे — और मुझे लगा जैसे वो एक सवाल पूछ रहे हैं, बिना मुँह खोले।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसकी तरफ़ देखा। और फिर मैं आगे बढ़ा।
मैंने पापा के सामने फ़र्श पर घुटने टेके।
"पापा," मैंने कहा।
"हाँ।"
"मैं डॉक्टर इसरानी के पास गया था। काजल के साथ।"
पापा ने सिर हिलाया।
"उन्होंने बताया कि अस्पताल की ज़मीन पर रणवीर की नज़र है। और अगर काग़ज़ात में गड़बड़ी निकली, तो अस्पताल दो महीने में बंद हो जाएगा। मरीज़ दूसरी जगह चले जाएँगे। बिल्डिंग खाली पड़ जाएगी। और फिर ज़मीन कौड़ियों के भाव बिकेगी।"
पापा ने कुछ नहीं कहा।
"पापा," मैंने कहा, "अब मैं सामना करूँगा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें पानी भरी थीं, पर वो रो नहीं रहे थे। उनका हाथ एक पल के लिए काँपा, फिर रुक गया।
"अंकुश—" उनकी आवाज़ फँस गई। उन्होंने गला साफ़ किया। "अंकुश, तू नहीं जानता। वो आदमी—"
"मैं जानता हूँ, पापा।"
"नहीं, तू नहीं जानता।"
"पापा," काजल ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी पर साफ़। "आप अभी भी डर रहे हैं। हम समझ रहे हैं। पर आप अकेले डर रहे हैं, और यही सबसे बड़ी बात है। अब आप अकेले नहीं हैं।"
पापा ने अपना चश्मा उतारा। उन्होंने उसे अपने घुटने पर रख दिया। उसके बिना उनका चेहरा थोड़ा और छोटा लग रहा था, थोड़ा और उजला।
"मैंने पंद्रह साल इसे पहने रखा," उन्होंने कहा, बहुत धीमे से, जैसे खुद से बोल रहे हों। "कान पर टेप बाँधकर। सोचा कि अगर चश्मा ठीक रहेगा तो सब ठीक रहेगा। बेवकूफ़ आदमी।"
"पापा—"
"ता।" उन्होंने हाथ उठाकर मुझे रोका। "अब मत बोल। अब मैं बोलता हूँ।"
वो उठे। धीरे से। उनकी कमर झुकी हुई थी, जैसे अंदर कुछ भारी टँगा हो। वो घर के अंधेरे कोने की तरफ़ गए। वहाँ लकड़ी का पुराना संदूक रखा था — रस्सी बँधी, धूल, और ऊपर एक पुराना ताला। मैंने उस संदूक को सैकड़ों बार देखा था, पर कभी सोचा नहीं कि उसमें क्या है। बचपन में सोचता था कि शायद खज़ाना है। फिर बड़ा हुआ तो सोचना बंद कर दिया।
पापा संदूक के सामने रुके।
वो मेरी तरफ़ मुड़े।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "अपनी चाबी निकाल।"
मेरा हाथ अपने आप गले की तरफ़ गया। उँगलियों ने उस पुरानी चाबी को छुआ, जो पंद्रह-सोलह साल की उम्र में पापा ने मेरे गले में डाली थी, बिना बताए कि ये किस चीज़ की है। धातु ठंडी थी, पर मेरी गर्दन की गर्मी से उसमें थोड़ी जान आ गई थी।
मैंने डोरा उतारा और चाबी अपनी हथेली पर रखी।
"ये चाबी," पापा ने कहा, "इसी संदूक की है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"फिर आपने मुझे पंद्रह साल पहले क्यों दी?"
"क्योंकि मुझे डर था," पापा ने कहा। "डर था कि अगर मैं इसे अपने पास रखूँगा, तो एक दिन कमज़ोर पड़कर इसे कहीं फेंक दूँगा। या जला दूँगा। या किसी को बेच दूँगा। और तू उस वक़्त छोटा था, तू इसे सिर्फ़ एक चीज़ समझता था। तू इसे अपने गले में डालकर सो जाता था। मैं जानता था कि तू इसे कभी नहीं खोएगा। इसीलिए तुझे दे दी।"
वो एक पल रुके।
"और आज," उन्होंने कहा, "मैं तुझे वो दे रहा हूँ जो मुझे पंद्रह साल पहले देना चाहिए था। सच। ये संदूक अंदर से सड़ रहा था और मैं इसे खोलने से डरता रहा। अब तू खोल।"
मैंने चाबी संदूक के ताले में डाली।
ताला ज़ंग लगा था। चाबी पहले तो नहीं घूमी। मैंने थोड़ा ज़ोर लगाया। फिर थोड़ा और। फिर काजल आई और उसने अपने दोनों हाथ मेरे हाथ पर रख दिए। और हम दोनों ने साथ ज़ोर लगाया।
ताला घूमा।
एक आवाज़ आई — कड़क, पुरानी, दर्द भरी — और ताला खुल गया।
मैंने रस्सी खोली। मैंने ढक्कन उठाया।
अंदर से एक गंध आई। पुराने काग़ज़ की गंध। नमी की गंध। और कुछ और — जैसे बंद कमरे की गंध, जहाँ बहुत सालों से हवा नहीं आई हो।
सबसे ऊपर एक मोटा काग़ज़ था, मुड़ा हुआ, पीला पड़ा हुआ। उसके नीचे दूसरा। फिर तीसरा। तीन-चार काग़ज़ थे, पर वो काग़ज़ नहीं, बल्कि एक-दूसरे से चिपके हुए साल थे — जैसे वक़्त ने उन्हें एक साथ दबा दिया हो।
उनके नीचे एक टूटी चेन थी।
चेन, धातु की, चाँदी जैसी दिखती थी पर शायद स्टील की थी — और वो बीच से टूटी हुई थी। एक सिरा मुड़ा हुआ था, जैसे ज़ोर लगाकर तोड़ा गया हो। मैंने उसे उठाया। वो मेरी हथेली में ठंडी थी।
"ये किसकी है?" मैंने पूछा।
पापा ने कुछ नहीं कहा।
और फिर मैंने सबसे नीचे देखा।
एक फोटो थी।
छोटी, चौकोर, किनारों से थोड़ी घिसी हुई, सफ़ेद-काले रंग की। फोटो में दो आदमी खड़े थे। दोनों मुस्कुरा रहे थे। दोनों के हाथ कंधों पर थे।
बायीं तरफ़ वो आदमी था जिसे मैंने फ़ौरान पहचान लिया — उस्ताद अली बक्श। युवा, कम से कम तीस साल छोटे, पर वही चश्मा, वही मोटा फ़्रेम, वही सफ़ेद दाढ़ी — हालाँकि यहाँ दाढ़ी काली थी, थोड़ी सी। उनकी आँखों में वो शांति थी जो आज भी उनकी दुकान में बैठी रहती है।
और दूसरी तरफ़ — एक आदमी। मुझे नहीं पता था कौन। चौड़ा चेहरा, बड़ी मुस्कान, कानों तक फैली हुई। सफ़ेद शर्ट, बटन खुले हुए, आस्तीन मुड़ी हुई। उसका हाथ उस्ताद के कंधे पर था और उस्ताद का हाथ उसके कंधे पर। दोनों बहुत खुश लग रहे थे, जैसे उस दिन उन्होंने कोई बड़ी बात तय की हो।
मैंने फोटो को करीब किया।
"पापा," मैंने कहा, "ये दूसरा कौन है?"
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