The Mysterious Bell61 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 61

7 min read November 5, 2026

"और तुम्हारे पापा को मैंने दो बार बुलाया," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "दोनों बार वो नीचे बेंच पर बैठे रहे। अंदर नहीं आए। उन्हें लगा कि मैं पैसे माँगूँगा। जबकि मैं उनसे सिर्फ़ ये कहना चाहता था कि तुम्हारी बीवी की दवा बदलनी है।"

कमरा चुप था। दीवार पर लगी औरत की तस्वीर हँस रही थी, जैसे वो हम तीनों पर हँस रही हो, प्यार से, थोड़ी शरारत से।

तभी काजल ने वो बात पूछी जो मैं नहीं पूछ सका था।

"अंकल, ये ज़मीन अगर चली गई, तो इस अस्पताल में क्या रहेगा?"

डॉक्टर इसरानी ने तस्वीर की तरफ़ देखा।

"ये मेरी बीवी है," उन्होंने कहा। "इसी अस्पताल में नर्स थी। इसने मुझसे कहा था कि इस कमरे की दीवारें पीली रखना, बच्चे डरते हैं। मैंने रखी। अब भी पीली हैं।"

उन्होंने चश्मा पहन लिया।

"अब जाओ," उन्होंने कहा। "दोनों। कल सुबह दस बजे मैं तुम्हारी माँ को देखूँगा। चाय लेकर आना, कम से कम चाय तो मेरे पैसे की होगी।"

काजल हँसी। बहुत थोड़ी देर के लिए। फिर वो उठी और उसने डॉक्टर इसरानी के पैर छुए। उन्होंने हाथ सिर पर रखा और कुछ नहीं कहा।

सीढ़ियों पर, बाहर, बेंच पर हम दोनों बैठे। आँगन में चाँदनी पड़ी थी, और सीमेंट पर पीपल के पत्तों की परछाई हिल रही थी, और पीछे के प्लॉट से एक ट्रक की भारी आवाज़ आईवो आवाज़ आई और चली गई।

काजल ने घुटनों पर हाथ रखा। उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। वो सामने पीपल की परछाई देख रही थी जो सीमेंट पर हिल रही थी, और हवा उसे कभी एक तरफ़ कर देती थी और कभी दूसरी तरफ़, जैसे कोई बच्चा काग़ज़ के टुकड़े से खेल रहा हो।

"अंकुश," उसने कहा। आवाज़ धीमी थी, जैसे बहुत दूर से आ रही हो।

"हाँ।"

"तूने सुना कि डॉक्टर अंकल ने क्या कहा?"

"सुना।"

"दो महीने।" उसने घुटनों पर हाथ रखे-रखे ही कहा। "सिर्फ़ दो महीने।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

आँगन में अब भी चाँदनी थी, और नीचे दरवाज़े के पास कहीं एक झींगुर बोल रहा था, और मुझे अचानक लगा कि मैं बहुत ज़ोर से सुन रहा हूँ। जब इंसान को कुछ समझ नहीं आता, तो वो आवाज़ें बहुत साफ़ सुनने लगता है। यही मेरे साथ हो रहा था।

"अंकुश," काजल ने फिर कहा। इस बार उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू डर गया है।"

"मैं नहीं डरा," मैंने कहा।

"मैं तुझे जानती हूँ। तेरी आँखें देखकर पता चलता है।"

"मेरी आँखें हमेशा ऐसी ही होती हैं। इनमें कोई कमी नहीं। जब से तूने मुझे दुकान पर पहली बार काम करते देखा था, मेरी आँखें ऐसी ही हैं। तू भूल गई?"

वो मुस्कुराई। बहुत थोड़ा। मुश्किल से। फिर मुस्कान चली गई।

"अंकुश," उसने कहा, "मुझे एक बात समझ नहीं आ रही है।"

"बोल।"

"अगर अस्पताल की ज़मीन रणवीर को चाहिए, तो वो सीधे पैसे देकर क्यों नहीं खरीदता? इतना बड़ा ठेकेदार है, इतने काग़ज़ हैं, इतना पैसा है। सीधे ज़मीन खरीद ले। फिर ये सारी गड़बड़ क्यों? ये अंगूठा, ये नीलामी, ये धमकी?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"क्योंकि सीधे खरीदने में उसे कीमत देनी पड़ेगी," मैंने कहा। "ज़मीन की कीमत। ऊँची कीमत। डॉक्टर इसरानी जैसा आदमी ज़मीन देगा तो सबके सामने देगा, दाम भी ऊँचा रखेगा, और साथ में ये भी कहेगा कि अस्पताल यहीं चलेगा, यहाँ के लोगों की सेहत का हिसाब रखा जाएगा।"

"और?"

"और अगर काग़ज़ात में गड़बड़ी निकल आए, तो अस्पताल खुद बंद हो जाएगा। मरीज़ दूसरी जगह चले जाएँगे। दो महीने में बिल्डिंग खाली। फिर ज़मीन कौड़ियों के भाव। और जो खरीदेगा, वही बोलेगा — मैंने तो बंद अस्पताल की ज़मीन खरीदी है, इसका क्या? किसी की सेहत से मेरा क्या?"

काजल ने गहरी साँस ली। फिर उसने आँखें बंद कर लीं।

"तो ये पूरी बात — पापा का अंगूठा, नीलामी का नोटिस, अस्पताल, हमारा घर, गली — ये सब जुड़ा हुआ है?"

"एक ही ज़ंजीर है।"

"और उस ज़ंजीर का पहला कड़ा?"

"पापा का अंगूठा," मैंने कहा। "सबसे पहला। सबसे ऊपर।"

काजल ने आँखें खोलीं। उसकी आँखें अब सूख रही थीं। रोना खत्म हो रहा था और उसकी जगह कुछ और आ रहा था — वो चीज़ जो औरत के अंदर तब आती है जब वो तय कर लेती है कि अब रोने का वक़्त नहीं है, अब कुछ और करने का वक़्त है।

"फिर हम क्या करें?" उसने कहा।

"कुछ नहीं।"

"क्या मतलब कुछ नहीं?"

"मतलब — अभी कुछ नहीं। डॉक्टर इसरानी ने जो कहा, उसे पचने दे। रात को हम दोनों यहाँ बैठे हैं और हमें लग रहा है कि हम दुनिया बदल देंगे। जबकि सच ये है कि हमें दो चीज़ें करनी हैं — एक, कल सुबह माँ को अस्पताल लाना है। और दो, पापा से वो चाबी लेनी है।"

"कौन सी चाबी?"

"जो मेरे गले में पंद्रह साल से है," मैंने कहा।

काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी नज़र मेरे गले पर गई। चाँदनी में पुरानी चाबी थोड़ी चमक रही थी, जैसे कोई छोटी मछली पानी की सतह पर करवट ले।

"वो संदूक की है?" उसने पूछा।

"मुझे नहीं पता। पापा ने कभी नहीं बताया।"

"तो तू कैसे कह रहा है कि ये संदूक की है?"

"मैं नहीं कह रहा। मैं कह रहा हूँ कि आज रात पापा से यही पूछूँगा।"

काजल ने एक पल सोचा। फिर वो उठी, अपने घुटनों पर से धूल झाड़ी, और बोली, "चल।"

"कहाँ?"

"घर। पापा से पूछने।"

"अभी?"

"तू कब तक इंतज़ार करेगा, अंकुश? कल सुबह? फिर कल दोपहर? फिर अगले हफ़्ते? चंद्रेश अगले हफ़्ते आएगा, तूने खुद कहा था। और उसके पहले हमें पता होना चाहिए कि संदूक में क्या है। अगर उसमें कुछ ऐसा है जो काम आ सकता है, तो हमारे पास हफ़्ता है, चार दिन है, कम से कम कुछ तो है। और अगर नहीं है, तो भी हमें पता होना चाहिए कि नहीं है। अंधेरे में लड़ना सबसे बड़ी बेवकूफी है।"

मैं उठा।

"कब से तू इतनी समझदार हो गई?" मैंने कहा।

"जब से मुझे पता चला कि मेरा भाई पूरी दुनिया को अकेले बचाने के चक्कर में खुद को खा जाएगा," उसने कहा। और फिर वो मुस्कुराई — इस बार पूरी तरह, थोड़ी देर के लिए।

हम सीढ़ियों से उतरे। नीचे डॉक्टर इसरानी का कमरा बंद था, पर उसके दरवाज़े के नीचे से रोशनी की एक पतली लकीर आ रही थी। बूढ़ा आदमी अंदर बैठा होगा, काग़ज़ों के बीच, और शायद वो हमारे जाने के बाद अपनी बीवी की तस्वीर से कुछ कह रहा हो। मुझे ये सोचकर अजीब लगा — कि इतनी रात को भी कोई इंसान तस्वीर से बात करता है। पर फिर मुझे लगा कि मैं भी तो घंटी से बात करता हूँ। और घंटी भी कभी-कभी जवाब देती है। तो मैं किस पर हँसूँ?

अस्पताल के बाहर निकले तो हवा ठंडी थी। गली में अंधेरा था, बस एक-दो दुकानों के बाहर छोटे बल्ब जल रहे थे। पीपल का पेड़ आगे खड़ा था, बड़ा, काला, जैसे कोई बूढ़ा आदमी चुपचाप खड़ा हो और हमें जाते हुए देख रहा हो।

हम चुपचाप चल रहे थे। काजल के नंगे पैर सीमेंट पर आवाज़ कर रहे थे — हल्की, हल्की, जैसे कोई बच्चा सोते-सोते बड़बड़ाए। मैंने अपनी चप्पल उतारकर उसे देना चाहा, पर उसने सिर हिला दिया।

"रहने दे। पैर ठंडे रहेंगे तो दिमाग़ ठंडा रहेगा," उसने कहा।

"क्या बात है। पहली बार तूने इतनी अच्छी बात कही।"

"चुप।"

हम मुड़े उस गली से जहाँ उस्ताद अली बक्श की दुकान थी। दुकान बंद थी, शटर पर एक बड़ा सा ताला लगा था, और ताले के ऊपर एक छोटा सा पीला बल्ब जल रहा था जो धीमी-धीमी आँख मार रहा था, जैसे थक गया हो।

काजल रुकी।

"अंकुश," उसने कहा।

"हाँ।"

"उस्ताद अंकल ने आज हमें नीला दरवाज़ा खोला। क्यों?"

"क्योंकि मैंने पूछा।"

"पर उन्होंने पहले मना किया था, ना? चाबी देने से मना किया था। फिर अचानक मान गए।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तू क्या कह रही है?"

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