The Mysterious Bell – Chapter 60
"उन्होंने लगाया था," काजल ने कहा, और उसकी आवाज़ अब तेज़ थी, साफ़ थी, ऐसी जैसे कोई काँच का टुकड़ा ज़मीन पर रख दे। "ऊपर की शीट पर मेरी माँ के इलाज की बात लिखी थी। नीचे का बंडल उन्होंने देखा ही नहीं। रणवीर भारद्वाज ने उन्हें मुफ़्त इलाज का वादा किया था और उनके हाथ से अंगूठा ले लिया। और आज पता चला कि उस अंगूठे के साथ पूरी गली बिक गई। अस्पताल भी। और स्कूल भी। और गली की दुकानें भी।"
डॉक्टर इसरानी ने बीच में नहीं रोका।
यही उनकी आदत है। वो मरीज़ को पूरा बोलने देते हैं। घाव साफ़ करने से पहले उसे देखते हैं।
"बोल लो," उन्होंने कहा। "जो बचा है वो भी बोल लो।"
काजल ने कहा, "मैं अठारह की हूँ, अंकल। मैं नर्सिंग पढ़ती हूँ। मैं सब समझती हूँ। पर आज मुझे ये समझ नहीं आया कि मेरी माँ का इलाज पूरी गली की कीमत पर क्यों चल रहा है। मैंने पापा से पूछा। पापा ने कुछ नहीं कहा। माँ ने कहा कि वो पाँच साल से जानती थीं। पाँच साल, अंकल।"
फिर वो रुकी।
और डॉक्टर इसरानी ने एक लंबी साँस ली। जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचता है और दरवाज़े पर खड़े होकर पहली बार सामने का नज़ारा देखता है।
"मुझे पता था," उन्होंने कहा।
मेरा पेट ठंडा हो गया।
"पता था?" काजल ने कहा।
"तीन महीने पहले एक आदमी आया था," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "सफ़ेद कुर्ता, मीठी आवाज़, हाथ में सोने के रंग के किनारे वाली फ़ाइल। मुझे बेटा कहकर बुलाया। मैंने कहा कि मैं तेरे बाप की उम्र का हूँ, बेटा मत कह। वो हँसा और फिर भी बेटा ही कहता रहा।"
"चंद्रेश," मैंने कहा।
"चंद्रेश सक्सेना," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "वकील। उसने मुझे बताया कि अस्पताल की ज़मीन पर पुराना कब्ज़ा है, काग़ज़ अधूरे हैं, और अगर मैं चुप रहूँ तो नई इमारत में मेरे नाम का एक छोटा-सा कमरा रहेगा। जिसमें मैं बैठकर मरीज़ देख सकूँगा। बूढ़े आदमी के लिए बहुत बड़ा लालच था।"
"और आपने क्या कहा?" काजल ने पूछा।
"मैंने कहा कि मैं सत्तर का हूँ, बेटा। मेरे पास ज़मीन नहीं, मरीज़ हैं। और मरीज़ों के नाम काग़ज़ पर नहीं लिखे जाते।"
काजल ने उनका हाथ पकड़ लिया। बूढ़े आदमी का हाथ, जिसकी नसें नीली और उभरी हुई थीं, और जिस पर स्टेथोस्कोप की रबर की नली ने सालों में एक हल्की लकीर बना दी थी।
डॉक्टर इसरानी ने काग़ज़ उठाया। दोनों उँगलियों के बीच। धीरे से।
"देखो," उन्होंने कहा। "अस्पताल की ज़मीन पचास साल पहले इस नाम पर लिखी गई थी। मेरे पिता के नाम पर। उसके बाद मेरे नाम पर आई। काग़ज़ साफ़ है। रजिस्ट्री साफ़ है। सब साफ़ है। पर ये नोटिस जो तुम लाए हो, ये उस सफ़ाई पर सवाल उठाता है।"
"कैसे?" मैंने कहा।
"क्योंकि इसमें लिखा है कि ये ज़मीन सार्वजनिक विकास हेतु ली जा रही है।" उन्होंने नोटिस पर उँगली रखी। "और सार्वजनिक विकास के नाम पर ज़मीन तभी ली जाती है जब उसके काग़ज़ात में कोई गड़बड़ी हो। अगर काग़ज़ साफ़ हो तो सरकार नहीं लेती। सरकार खरीदती है, कीमत देकर, इज्ज़त से। पर जब काग़ज़ में गड़बड़ी निकले, तो ज़मीन रुक जाती है। फ्रीज़ हो जाती है। और फ्रीज़ हुई ज़मीन पर अस्पताल नहीं चलता।"
"मतलब?" काजल ने कहा।
डॉक्टर इसरानी ने चश्मा उतारा। टेप से बँधा हुआ चश्मा उन्होंने मेज़ पर नहीं रखा, हाथ में ही पकड़े रहे। जैसे उसके बिना वो कमरा और भी ज़्यादा पुराना लगता है।
"मतलब ये है कि अगर इन काग़ज़ात में गड़बड़ी निकली, तो ज़मीन रुक जाएगी। और रुकी हुई ज़मीन पर नई रजिस्ट्री नहीं होती, दवा का लाइसेंस नहीं बढ़ता, और मरीज़… मरीज़ों को दूसरे अस्पताल भेजना पड़ता है। मेरे पास इतना पैसा नहीं कि मैं रुकी हुई ज़मीन पर दो महीने से ज़्यादा अस्पताल खड़ा रख सकूँ।"
"दो महीने?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ बाहर निकली ही नहीं। "दो महीने?"
"दो महीने," उन्होंने कहा। "मैंने हिसाब लगाया है। तीन बार लगाया है। और तीनों बार वही आया।"
काजल ने अपना हाथ उनके हाथ पर रखा था और अब उसने धीरे से उँगलियाँ हटा लीं।
"अंकल, मैं आपको कुछ बताऊँ?" उसने कहा। "जिस दिन मेरी माँ यहाँ भर्ती थीं, उस दिन आपने उनसे पैसे नहीं लिए थे। आपने कहा था कि बाद में देखेंगे। और आपने कभी नहीं देखा।"
डॉक्टर इसरानी ने हाथ उठाया।
"मैं डॉक्टर हूँ, हिसाब रखने वाला मुनीम नहीं।"
"अगर ये अस्पताल बंद हो गया," काजल ने कहा, "तो मैं जिसे तीन साल से अपना उस्ताद मानती हूँ, वो रहेंगे भी या नहीं?"
कमरे में चुप्पी।
और मेरी जेब में घंटी हिली। ठंडी नहीं। हल्की। जैसे कोई बच्चा सोते-सोते हाथ हिला दे।
और मुझे लगा जैसे वो कह रही हो, "पूछ।"
मैंने कहा, "अंकल, जिस काग़ज़ पर पापा का अंगूठा है, उसका अस्पताल से क्या रिश्ता है? वो तो गली की दुकानों का काग़ज़ है।"
डॉक्टर इसरानी ने नोटिस को उठाकर मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"देखो तारीख़। और देखो कि सबसे ऊपर किसका नाम है।"
मैंने देखा। सबसे ऊपर पापा का नाम था। और उसके नीचे एक लिस्ट थी। दुकान के नंबर, प्लॉट के नंबर, गली की नाली से लेकर पीछे की झुग्गी तक की बात। और सबसे नीचे एक लाइन थी जो बहुत छोटे अक्षरों में थी और जिसे पढ़ने के लिए मुझे काग़ज़ आँखों के बहुत करीब लाना पड़ा।
उस लाइन में लिखा था कि ये सारा टुकड़ा एक साथ जोड़कर नई इमारत बनेगी, और उस इमारत के नक़्शे में थोड़ा-सा हिस्सा उस अस्पताल की ज़मीन से भी आता है, जहाँ पीली दीवारें हैं।
मैं उस काग़ज़ को हिलाता रह गया।
"अगर सबसे ऊपर वाला अंगूठा झूठा है," डॉक्टर इसरानी ने कहा, "तो नीचे के सारे अंगूठे सवाल के घेरे में आ जाते हैं। और घेरे में आया हुआ काग़ज़ रुक जाता है। और रुका हुआ काग़ज़ मेरे अस्पताल को अपने साथ ले डूबता है। ये सिर्फ़ तुम्हारे पापा का मामला नहीं है, अंकुश। ये पूरी गली का मामला है।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
पापा का अंगूठा। एक आदमी का अंगूठा। एक काग़ज़ पर एक निशान। और उस निशान के नीचे माँ का इलाज, काजल की पढ़ाई, टिंकू का बस्ता, गिरधारी की ठेली, उस्ताद की मशीन, शबनम आपा की गुमटी, गली के बच्चों का पीपल के नीचे खेलना।
सब एक अंगूठे के नीचे दबा हुआ था।
डॉक्टर इसरानी ने अपनी जेब में हाथ डाला। कुछ देर ढूँढ़ते रहे, जैसे जेब में भी काग़ज़ों का ढेर हो। फिर एक परची निकाली। मोड़ी हुई, चार तह में, किनारों से थोड़ी फटी हुई। उन्होंने वो काजल की तरफ़ बढ़ा दी।
"ये तेरी माँ के लिए लिखी थी। एक महीने पहले।"
काजल ने परची खोली। उसने उसे पढ़ा और उसका चेहरा बदल गया।
"इसमें दो जाँच लिखी हैं," उसने कहा। "और दवा बदली हुई है।"
"हाँ।"
"और तारीख़ पिछले महीने की है।"
"हाँ।"
काजल ने परची को अपनी हथेली पर रखा और उसे देखती रही, जैसे वो उसका हिसाब माँग रही हो।
"आपने मुझे ये पहले क्यों नहीं दी?"
डॉक्टर इसरानी ने कुर्सी की पीठ पर हाथ रखा और खिड़की की तरफ़ देखा। बाहर अंधेरा था और उस अंधेरे में गली की छतें दिख रही थीं, जैसे कोई बहुत बड़ा जानवर सो रहा हो।
"क्योंकि मुझे पता था कि तुम लोग पैसे का हिसाब करोगे," उन्होंने कहा। "और जाँच को टाल दोगे। मैंने सोचा कि एक महीना और निकल जाएगा और मैं तुमसे कह दूँगा कि जाँच मेरे खर्चे पर होगी। मगर मैं कह ही नहीं पाया। बूढ़े आदमी की आदत है — सोचते रहते हैं, कहते नहीं।"
काजल ने कुछ नहीं कहा।
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