The Mysterious Bell – Chapter 629
"है," उसने कहा। "तीन दिन की बैटरी है।"
"अच्छा है," मैंने कहा। "आज जो होगा, सब रिकॉर्ड हो। जो नहीं होगा, वो भी।"
मैं मंच की तरफ़ बढ़ा — नहीं, मंच नहीं था। बस आँगन के बीच एक टूटी मेज़ थी, जिसे हमने जोड़ केंद्र की मेज़ बनाया था, और उस पर माइक रखा था।
मैंने माइक उठाया।
आँगन में सन्नाटा छा गया।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली, उसे मेज़ पर रखा और उसकी तरफ़ देखा।
घंटी चुप थी।
मैंने माइक पर कहा, "उस्ताद अली बक्श, आप आँगन सँभालिए। मैं पीछे जा रहा हूँ।"
और उसी वक़्त, दूर, गली के मोड़ पर, मुझे एक आवाज़ सुनाई दी।
गाड़ी की आवाज़।
मैंने माइक नीचे रखा और गली के मुँह की तरफ़ देखा।
एक सफ़ेद गाड़ी आ रही थी — धीरे, बहुत धीरे, जैसे उसे जल्दी न हो। उसकी रोशनी पीपल की छाया में आकर रुक गई। गाड़ी मोड़ पर रुकी, इंजन बंद हुआ, और एक पल के लिए कुछ नहीं हुआ।
फिर गाड़ी का दरवाज़ा खुला।
और सफ़ेद जूते ज़मीन पर उतरे।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और घंटी को अपनी हथेली में दबा लिया।
घंटी ने धीरे से कहा — "अब सब सुन रहे हैं।"
मैं मुस्कुराया।
क्योंकि जो भी आ रहा था, वो जानता था कि आज शाम आँगन भरा हुआ है। और जो आदमी भरी हुई आँगन में आता है, उसे अपनी बात कहनी पड़ती है।
आज शाम सबको अपनी बात कहनी थी।
॥
सफ़ेद जूते ज़मीन पर उतरे, और उनके ऊपर सफ़ेद पायजामा आया। फिर सफ़ेद कुर्ता। फिर वो खुद — रणवीर भारद्वाज।
उसने गाड़ी का दरवाज़ा खुद बंद किया। ड्राइवर नहीं उतरा। पीछे से कोई और नहीं आया। अकेला था। बिल्कुल अकेला, जैसे कोई गली में शादी में बुलाया गया मेहमान आया हो।
उसने एक पल के लिए गली को देखा — पीपल, चबूतरी, नाली पर पड़ा पुराना पत्थर का पुल, टेढ़ा टँगा बोर्ड, और आँगन में ठसाठस भरे लोग।
फिर उसने दोनों हाथ जोड़े।
और मुस्कुराया।
वो मुस्कान मैंने पहले भी देखी थी — भारद्वाज भवन के बाहर लगी तस्वीर में। एक ही मुस्कान, एक ही हाथ जोड़े हुए, एक ही झुका हुआ सिर। जैसे कोई बड़ा आदमी नहीं, बल्कि गली का कोई बेटा लौटकर आया हो।
मेरे पीछे किसी ने साँस रोक ली।
मैंने पीछे देखा — माँ व्हीलचेयर में बैठी थीं, हाथ में स्टील की थाली का किनारा पकड़े। उनके चेहरे पर डर नहीं था। थकान थी।
और मेरे बगल में उस्ताद अली बक्श खड़े थे, उनकी कैंची जेब में थी और चश्मा नाक पर। वो रणवीर को देख रहे थे, ऐसे जैसे कोई पुराना हिसाब देख रहे हों।
रणवीर आँगन की तरफ़ बढ़ा।
और जैसे ही वो बढ़ा, आँगन में बैठे लोगों की पंक्ति अपने आप थोड़ी सिकुड़ गई। किसी ने कुर्सी पीछे खींची। किसी ने बच्चे को गोद में उठा लिया। सुनीता दीदी ने राहुल का कंधा पकड़ लिया।
मैंने माइक उठाया और कहा, "ठहरिए।"
सब रुके।
रणवीर भी रुका — आँगन के ठीक बीच में, मेज़ से चार कदम पहले। उसने हाथ जोड़े हुए ही रखे और मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश भाई," उसने कहा।
आवाज़ मीठी थी। इतनी मीठी कि मुझे उसी वक़्त प्यास लग गई, जैसे किसी ने शरबत का गिलास सामने रख दिया हो।
"यहाँ सब अपने लोग हैं," मैंने कहा। "भाई मत कहिए। नाम से बुलाइए।"
वो हँसा।
"अच्छा," उसने कहा। "अंकुश यादव।"
मैंने सिर हिलाया। "हाँ। यही नाम है। और यह आँगन मेरा नहीं, इन सबका है। जो बोलना हो, इनसे बोलिए।"
वो मुड़ा और आँगन की तरफ़ देखने लगा। एक-एक चेहरे पर नज़र डाली — डॉक्टर इसरानी, शबनम आपा, रज़िया, हबीब चाचा, नसीमा बाई, साजिद, शकील भाई, रामलाल, भवानी प्रसाद, बंसीलाल, और सबसे पीछे गेट के पत्थर पर बैठा बबलू।
बबलू पर उसकी नज़र दो पल ज़्यादा रुकी।
फिर वो बोला।
"मैं जानता हूँ," उसने कहा, "कि आप सब मेरे बारे में क्या सोचते हैं। कोई कहता है मैं ज़मीन लेने आया हूँ। कोई कहता है मैं इमारतें बनाने आया हूँ। कोई कहता है मैं मोहल्ला बेचने आया हूँ। और सच कहूँ तो — मैं आप सबकी बातें सुन चुका हूँ। मेरे कान लंबे हैं।"
कुछ लोगों के चेहरे पर हल्की हँसी आई — एक-दो को, हल्की सी। वो यही चाहता था।
"लेकिन मैं आज यहाँ लड़ने नहीं आया," उसने कहा। "मैं आज यहाँ यह बताने आया हूँ कि मैं किसी का दुश्मन नहीं हूँ।"
उसने हाथ नीचे किए और एक कदम आगे बढ़ा।
"अंकुश यादव," उसने कहा और मेरी तरफ़ देखा, "तुम मुझे बुरा आदमी समझते हो। ठीक है, समझो। मैं बुरा आदमी हूँ। पर मैं झूठा नहीं हूँ। मैंने कभी किसी से यह नहीं कहा कि मैं फ़रिश्ता हूँ।"
"फ़रिश्ते की बात किसने की?" मैंने कहा।
वो मुस्कुराया और फिर आँगन से बोला, "देखिए, मैं आपको एक बात समझाता हूँ। यह इमारत — यह दवाखाना — यह पीली दीवारें, टूटी खिड़कियाँ, ऊपर से गिरता प्लास्टर। आप सब इसे प्यार कहते हैं। मैं इसे ख़तरा कहता हूँ।"
डॉक्टर इसरानी खड़े थे, मेज़ के बगल में, हाथ में पुराना स्टेथोस्कोप, जिसकी नली पर टेप लिपटा था। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस खड़े रहे।
"तीस साल से यह दवाखाना चल रहा है," रणवीर ने कहा, "और तीस साल में एक भी बार इसे ठीक कराने का किसी ने नहीं सोचा। कोई नहीं आया, कोई नहीं बोला, कोई नहीं बदला। और आज जब मैं कुछ नया बनाने की बात करता हूँ, तो सबको पुराना याद आ जाता है। यह कैसा प्यार है, भाई?"
आँगन चुप था।
"मैं आपको सच बताता हूँ," उसने कहा। "मैं भविष्य हूँ। आप जिसे पुराना कहते हैं, वो कल ख़त्म हो जाएगा। नहीं मैं ख़त्म करूँगा — वक़्त ख़त्म करेगा। मैं तो बस वो आदमी हूँ जो आपको उस वक़्त से पहले बता रहा है।"
मैंने उसकी बात काटी नहीं। मैंने सुना।
क्योंकि मैं जानता था कि यह आदमी बोलने के लिए आया है, और जो आदमी बोलने आता है, वो पहले अपनी बात पूरी करके ही रुकता है।
"इस पुरानी इमारत से सबका भला नहीं होगा," उसने कहा। "न मरीज़ का, न डॉक्टर साहब का, न आपका। बारिश में यह छत गिरेगी। किसी दिन यह दीवार किसी बच्चे पर आएगी। और उस दिन कोई यह नहीं पूछेगा कि अंकुश यादव कहाँ थे। कोई यह नहीं पूछेगा कि गली के लोग कहाँ थे। सब यह पूछेंगे — इमारत किसने बनाई थी?"
वो रुका। चारों तरफ़ देखा।
"मैं चाहता हूँ," उसने धीमे से कहा, "कि उस दिन का जवाब मैं न देना पड़ूँ।"
आँगन में कुछ लोगों ने सिर नीचे कर लिया।
मैंने देखा — नसीमा बाई, जो अपनी राशन की दुकान पर पूरी गली से तेज़ बोलती हैं, अपने पलड़े वाले हाथ को साड़ी में छिपा रही थीं।
मैंने घंटी को हल्का सा हिलाया, जेब के अंदर।
घंटी ने कुछ नहीं कहा।
लेकिन तभी मेज़ के पास से आवाज़ आई।
"एक बात कहूँ?"
डॉक्टर निहाल इसरानी थे। उन्होंने स्टेथोस्कोप जेब में डाला और रणवीर के सामने आकर खड़े हो गए। साठ से ऊपर के आदमी थे, कमर झुकी थी, चश्मे का एक काँच टूटा था और उस पर टेप लगा था। पर वो खड़े थे।
और वो सीधे खड़े थे।
"बोलिए, डॉक्टर साहब," रणवीर ने कहा। "आपका तो मैं सम्मान करता हूँ। आप तीस साल से यहाँ मरीज़ देख रहे हैं। आप चाहें तो आज बैठ जाइए, मैं आपके लिए कुर्सी मँगवा दूँ।"
"मैं खड़ा ही अच्छा हूँ," डॉक्टर इसरानी ने कहा।
उन्होंने एक पल रुककर साँस ली।
"मैं तीस साल से यहाँ हूँ," उन्होंने कहा। "और तीस साल में मैंने एक बात सीखी है। मरीज़ ज़मीन से नहीं ठीक होते। मरीज़ भरोसे से ठीक होते हैं।"
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