The Mysterious Bell – Chapter 628
"मैं माइक पर नहीं बोलूँगी," उन्होंने कहा। "मैं अपने मुँह से बोलूँगी, और जो सुनना चाहे सुन ले।"
और वो चल पड़ीं।
मैं खड़ा उन्हें देखता रहा — एक बीमार औरत, पतले हाथ, कुर्सी पर बैठी, गोद में खाने का डिब्बा, और पूरी गली को रास्ता देते हुए जाती हुई।
मुझे लगा कि आज अगर कोई हमें हरा सकता है, तो वो सिर्फ़ सत्ता नहीं होगी। वो सिर्फ़ काग़ज़ नहीं होगा। वो इन औरतों की ज़ुबान भी होगी। और वो ज़ुबान अभी शुरू हुई थी।
शाम पाँच बजे तक आँगन तैयार हो गया था।
कुर्सियाँ दो कतार में लगी थीं, बेंच पीछे की तरफ़, और पीपल के नीचे चटाई। चिंटू ने लाल काग़ज़ के झंडे सच में बना दिए थे — कुछ तिरछे, कुछ सीधे, पर सब लगे हुए थे। एक झंडे पर उसने पेंसिल से लिख दिया था — "आज बात होगी"।
मैंने उसे पढ़ा और मुस्कुरा दिया।
मीरा आ गई थी। उसके गले में कैमरा था, हाथ में कॉपी, और बगल में वही फटा बैग जिसमें रमा मैडम के नाम वाला लिफ़ाफ़ा सालों से पड़ा था। उसने पीछे की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"पीछे कौन जा रहा है?" उसने पूछा।
"आधी गली," मैंने कहा।
"और तू?"
"मैं यहाँ से बोलूँगा," मैंने कहा। "और जब पीछे आवाज़ आए, तो यहीं से जवाब दूँगा।"
"अगर मशीन वहाँ पहले शुरू हो जाए?"
"तो मैं यहाँ बोलता रहूँगा, और वो सुनते रहेंगे। टूटी चीज़ों का भी एक हिसाब होता है, मीरा। जो आवाज़ दो जगह से आए, वो खत्म नहीं होती।"
उसने मेरी तरफ़ कुछ पल देखा, फिर अपनी कॉपी खोली और कुछ लिखा।
"क्या लिखा?" मैंने पूछा।
"कुछ नहीं," उसने कहा। "तू अभी से भाषण दे रहा है, और मैं उसकी नकल रख रही हूँ।"
मैं हँस पड़ा।
तभी पीछे, छत की तरफ़ से, एक आवाज़ आई जो मैंने महीनों से नहीं सुनी थी।
"टेस्टिंग… टेस्टिंग।"
मैं पलटा।
पापा छत पर थे।
वो पुराने लाउडस्पीकर के पास बैठे थे — वो लाउडस्पीकर जो पिछले कई साल से छत के कोने में पड़ा था, जिसका तार कहीं टूट गया था और जिसे कोई छूता नहीं था। पापा ने उसे उतारा था, उसके अंदर का तार जोड़ा था, बैटरी लगाई थी, और अब माइक पकड़कर बैठे थे। उनके हाथ में वही पुरानी रिंच थी, जो उनकी जेब में रहती थी, और सामने पीली फाइल रखी थी — सीने से लगाने वाली वही फाइल।
मैं छत पर चढ़ गया।
"पापा," मैंने कहा।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर माइक की तरफ़, फिर मेरी तरफ़।
"ये काम कर रहा है," उन्होंने कहा। "मैंने सोचा, बैठक में लोगों को सुनाई देना चाहिए।"
"पापा, ये…" मैंने लाउडस्पीकर की तरफ़ देखा। "ये कब से बंद था?"
"आठ साल," उन्होंने कहा। "तेरे दादा के ज़माने का है। उन्होंने ही खरीदा था।"
मैं चुप हो गया।
पापा ने रिंच जेब में रखी, फिर खड़े हुए। और फिर, जो हुआ, वो मुझे आज तक याद है।
उन्होंने अपना हाथ उठाया और मेरे कंधे पर रख दिया।
बस रख दिया।
कुछ नहीं कहा। कोई लंबी बात नहीं। कोई माफ़ी नहीं। कोई सफ़ाई नहीं। सिर्फ़ हाथ — उनका काँपता, गरम, ग्रीस लगा हाथ, मेरे कंधे पर।
और मैं, अंकुश यादव, जो हर बात का जवाब हँसी में दे देता है, उस वक़्त कुछ नहीं बोल पाया। मेरा गला भर आया और मैंने अपनी नज़र नीचे गली में टिका दी, ताकि पापा मेरी आँखें न देख सकें।
"मैं नीचे रहूँगा," उन्होंने कहा, हाथ हटाते हुए। "पीछे वाले फाटक पर। सलीम बक्श के साथ।"
"पापा —"
"सुन," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई। "पाँच साल पहले मैंने एक काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था। आज मैं उस अंगूठे के सामने खड़ा रहूँगा। तू बोल, मैं सुनूँगा। और जब मेरी बारी आए, मैं अपनी बात कहूँगा।"
"आपकी बारी आएगी," मैंने कहा।
"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "इसीलिए मैं आज तेरे कंधे पर हाथ रख रहा हूँ। पहले नहीं रख पाया।"
और वो सीढ़ी से नीचे उतर गए।
मैं छत पर अकेला खड़ा रह गया। नीचे गली दिख रही थी — कुर्सियाँ, बेंच, चटाई, झंडे, और लोग। मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और घंटी निकाली।
उसे अपनी हथेली में रखा।
"बोल," मैंने धीरे से कहा।
घंटी ने कहा — "अब तेरी बारी।"
"क्या कहूँ?"
"जो तेरे पास है।"
मैंने घंटी जेब में रखी और सीढ़ी से नीचे उतर गया।
पाँच बजकर पैंतालीस मिनट पर लोग आने लगे।
पहले आए — डॉक्टर इसरानी। उनके हाथ में वही पुराना स्टेथोस्कोप था, जिसकी नली पर टेप लिपटा था, और वो सीधे आँगन के बीच आकर खड़े हो गए, जैसे बता देना चाहते थे कि यह जगह उनकी है और वो इसे छोड़कर कहीं नहीं जा रहे।
फिर आए — वो बूढ़ी औरत जो कंधे पर बच्चा लेकर गलियारे में बैठी थी। उसने आते ही मेरी तरफ़ देखा और कहा, "बेटा, मैं तो बस यह देखने आई हूँ कि जो तुम कह रहे थे, वो सच है या नहीं।"
"सच है, अम्मा," मैंने कहा। "बैठिए। सामने वाली कुर्सी खाली है।"
वो बैठीं। बच्चा अब भी उनके कंधे पर सो रहा था।
फिर आया — वो लाठी वाला बूढ़ा जिसके बेटे का ऑपरेशन यहीं मुफ़्त हुआ था। उसने आते ही अपनी लाठी दीवार के सहारे खड़ी कर दी, जैसे कह रहा हो — आज लाठी की ज़रूरत नहीं।
फिर आई — नसीमा बाई, अपने बेटे साजिद के साथ। साजिद के हाथ में वही लाल कवर कॉपी थी, पर आज उसने उसे खोला नहीं। वो चुपचाप पीछे की कुर्सी पर बैठ गया।
फिर आए — शकील भाई। मैंने उन्हें दूर से देखा और मेरा दिल धक्क से रह गया। वो उस सूची में थे जिसमें बारह नाम थे और हर नाम के आगे रकम लिखी थी। वो आए, मेरी तरफ़ देखा, और बिना कुछ कहे एक कोने में खड़े हो गए।
फिर आई — रज़िया, शबनम आपा के साथ। दोनों बहनें साथ चल रही थीं, और उनके कंधे एक-दूसरे से दूर थे, पर वो साथ थीं। यही काफ़ी था।
फिर आए — हबीब चाचा, और उनके पीछे-पीछे कुछ और बुज़ुर्ग, जिन्हें मैंने पीपल पर बैठे देखा था पर नाम नहीं जानता था।
फिर आई — सुनीता दीदी, अपने बेटे राहुल का हाथ पकड़े। राहुल ने स्कूल की वर्दी नहीं पहनी थी, साधारण कपड़े थे, और वो नीचे ज़मीन की तरफ़ देख रहा था। सुनीता ने आते ही मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखें भर आईं।
मैंने उन्हें रोका नहीं।
फिर आए — रामलाल, अपने बेटे अजय के साथ। अजय की जेब में वही रुकी घड़ी थी — मैंने पट्टे से पहचान लिया।
फिर आए — भवानी प्रसाद। बहुत धीरे, जैसे हर कदम नापकर रख रहे हों। उन्होंने आते ही मेरी तरफ़ देखा और धीरे से कहा, "बेटा, मैं यहाँ सिर्फ़ इसलिए हूँ कि मैं सत्तर साल जीकर भी कुछ नहीं जान पाया।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा और आगे की कुर्सी तक छोड़ आया।
और फिर आए — बंसीलाल। अपने हाथ धोकर, कपड़े बदलकर, और सीधे खड़े होकर। उन्होंने उस्ताद की तरफ़ देखा और उस्ताद ने सिर हिलाया।
आँगन भरने लगा। कुर्सियाँ भर गईं, बेंच भर गईं, चटाई भर गई। जो बैठने की जगह नहीं मिली, वो दीवार के सहारे खड़े हो गए। मैंने देखा कि गली के मुँह तक लोग खड़े थे।
और उस भीड़ में, सबसे दूर, अस्पताल के गेट के पत्थर पर, एक आदमी बैठा था।
बबलू पांडे।
वो अकेला बैठा था। कोई चेन नहीं, कोई पानदान नहीं, कोई लठैत साथ नहीं। बस वो, अपने घुटनों पर हाथ रखे, और उसके दाहिने हाथ पर वो सफ़ेद रूमाल बँधा था जिस पर सूखा गुलाबी दाग था।
उसने मेरी तरफ़ देखा।
मैंने सिर हिलाया।
उसने भी सिर हिलाया — छोटा सा, डरा हुआ सा। और फिर नज़र नीचे कर ली।
मैंने मीरा को इशारा किया।
"कैमरा चालू है?" मैंने पूछा।
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