The Mysterious Bell – Chapter 627
"रफ़ीक़," मैंने मुड़कर कहा, "तू पीपल के नीचे चबूतरी साफ़ कर। पानी ले, झाड़ू ले। उस पर से पत्ते हटा, और जो पुराना काग़ज़-कचरा है, वो भी। छत पर से कुछ पत्ते गिरे होंगे, सब साफ़।"
"मैं चप्पल उतारकर करूँगा, उस्ताद," रफ़ीक़ ने कहा। "गीली चबूतरी पर वैसे ही चलना पड़ेगा।"
"नहीं," मैंने कहा। "चप्पल पहनकर कर। फिसल कर गिर गया तो तेरी अम्मी मेरा नाम लेगी, और मैं उस वक़्त बैठक में बोल रहा होऊँगा।"
वो हँसा और भागा।
"और मैं?" चिंटू ने अपनी चप्पल का पट्टा कसते हुए पूछा।
"तू झंडे बनाएगा," मैंने कहा। "दुकान के पीछे वाले कमरे में काग़ज़ है, पुराना लाल काग़ज़, मैंने पिछले साल होली पर बचाया था। उस्ताद की दुकान से कैंची ले आ, और उस काग़ज़ को ऐसे काटना जैसे झंडे होते हैं। फिर उन्हें रस्सी पर लगाकर आँगन के दोनों तरफ़ बाँध देना। पर ध्यान रखना, रस्सी गले के बराबर न हो, ऊपर रहे, ताकि बुज़ुर्गों को झुकना न पड़े।"
चिंटू ने सीना तान लिया, जैसे उसे कोई बड़ा मंत्रालय सौंपा गया हो।
"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "और मैं?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तू मेरे साथ रहेगा," मैंने कहा। "आज तू मेरा दाहिना हाथ है। मुझे जो भूल जाए, तू याद दिलाना।"
उसका चेहरा चमक गया। और वही चेहरा देखकर मुझे अचानक याद आया — ये वही लड़का है जिसने पिछली बार दुकान का पेचकस बेच दिया था, डर के मारे। और आज वो मेरे साथ खड़ा है। इससे बड़ी मरम्मत कौन सी होती है?
मैंने अपने काम की तरफ़ ध्यान दिया।
मुझे दो जगह काम करना था — आँगन में और पीछे मशीन के सामने। यानी मुझे आज एक नहीं, दो बैठकें सँभालनी थीं। घंटी की बात सिर्फ़ शब्द नहीं थी। दो आदमी। मुझे ऐसा आदमी चाहिए था जो आँगन में मेरी जगह बोल सके, जो उन मरीज़ों के सामने खड़ा हो सके जो डर के मारे काँप रहे थे।
मेरे दिमाग़ में एक नाम आया।
उस्ताद अली बक्श।
मैं सीधा उनकी दुकान की तरफ़ गया।
दुकान का दरवाज़ा खुला था और अंदर से सिलाई मशीन की आवाज़ आ रही थी — टिक-टिक, टिक-टिक। मैं अंदर गया तो देखा उस्ताद मशीन पर झुके हुए हैं, और उनके सामने मेज़ पर एक बड़ा सफ़ेद कपड़ा फैला है। वो उस पर बड़े-बड़े अक्षर सी रहे थे।
मैं पास गया और अक्षर पढ़े।
अस्पताल हमारा है।
सात अक्षर। कपड़े पर लाल धागे से, मोटे-मोटे। उस्ताद की उँगलियाँ मशीन पर काँप रही थीं, पर सिलाई एक लकीर से टेढ़ी नहीं हो रही थी। पचास साल की आदत थी।
"उस्ताद," मैंने धीरे से कहा, "ये कब बनाया?"
"अभी बना रहा हूँ," उन्होंने सिर उठाए बिना कहा। "बंसीलाल के लिए नहीं। तेरे लिए नहीं। उस औरत के लिए जो गलियारे में बैठी रो रही थी — 'मैं कहाँ जाऊँगी'। उसके लिए।"
उन्होंने मशीन रोकी और चश्मा उतारकर पोंछा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तू आज बोलने वाला है। मैं जानता हूँ। पर मैं तुझे एक बात बताता हूँ जो मैंने पचास साल में सीखी है। जब लोग डरे होते हैं, तो उन्हें लंबा भाषण याद नहीं रहता। उन्हें सिर्फ़ एक चीज़ याद रहती है — किसी का चेहरा, जो उनके साथ खड़ा था।"
"तो मैं क्या कहूँ?"
"कम बोल," उस्ताद ने कहा। "जितना कम बोलेगा, उतना सुना जाएगा। और जब बोले, तो सबको याद रखना — किसको क्या चुभ रहा है। जो औरत बच्चे को गोद में लेकर बैठी है, उसे ज़मीन की बात समझ नहीं आएगी। उसे यह समझ आएगा कि कल उसका बच्चा कहाँ इलाज कराएगा।"
मैंने सिर हिलाया।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आज शाम मुझे दो जगह रहना है। आँगन में और पीछे मशीन के सामने। आप आँगन सँभालेंगे?"
उन्होंने मशीन की सुई बदलते हुए मेरी तरफ़ देखा।
"मैं अपनी दुकान से बाहर निकलूँगा," उन्होंने कहा, "पचास साल बाद। इसीलिए तू ये कपड़ा मेरे हाथ से नहीं छीनेगा। ये मेरा है। और आज शाम जब तेरी बात खत्म हो, मैं ये कपड़ा दीवार पर टाँगूँगा। दीवार पर, अंकुश। काग़ज़ के ऊपर, सूचना के ऊपर।"
"पर उस्ताद, वो दीवार —"
"वो दीवार आज शाम तक हमारी है," उन्होंने कहा। "उसके बाद जो होगा, वो सुबह सात बजे की मशीन के साथ देखेंगे।"
मैं चुप हो गया। उनकी आवाज़ में जो था, वो पचास साल की चुप्पी की आवाज़ थी — जो एक बार खुलती है तो किसी की नहीं सुनती।
"अच्छा," मैंने कहा। "पर एक काम और है। गुड्डू और सानिया कुर्सियाँ ला रहे हैं। कहीं से कोई भारी चीज़ लानी हो तो आप इशारा कर दें, बच्चे दौड़ जाएँगे।"
उस्ताद ने सिर हिलाया और फिर मशीन पर झुक गए।
मैं बाहर निकला।
उस वक़्त गली में एक अजीब सी आवाज़ शुरू हुई।
दरवाज़े खुलने लगे। लोग बाहर आने लगे — पहले एक-दो, फिर चार, फिर दस। कोई कुछ नहीं कह रहा था, पर सब काम में लग गए थे। भोला भाई अपनी दुकान से दो कुर्सियाँ खींचकर लाए। नसीमा बाई ने अपनी राशन दुकान की तराज़ू के पास से एक पुरानी बेंच उठाई, और उसे पोंछकर पीपल के नीचे रख दिया। कोई औरत अपने आँगन की चटाई ले आई और पीपल की जड़ के पास बिछा दी। एक बूढ़ा अपनी लाठी टेकते हुए आया और बिना कहे रफ़ीक़ के साथ चबूतरी साफ़ करने लगा।
मैंने किसी को बुलाया नहीं था।
यही सबसे अजीब बात थी। जिस गली में मैंने सौ बार लोगों को एक-दूसरे से झगड़ते सुना था, वहाँ आज कोई किसी से लड़ नहीं रहा था। सब काम कर रहे थे, जैसे किसी की शादी हो।
मैं कुछ देर खड़ा देखता रहा।
तभी पीछे से आवाज़ आई —
"हटो, हटो, रास्ता छोड़ो।"
मैं पलटा।
माँ आ रही थीं। काजल उनकी कुर्सी धकेल रही थी — वही कुर्सी जिसके पहिये मैंने और टिंकू ने मिलकर ठीक किए थे। और माँ की गोद में एक बड़ा स्टील का डिब्बा रखा था, जिसका ढक्कन रस्सी से बाँधा हुआ था और जिसके किनारे से भाप निकल रही थी।
मेरे पीछे से कोई गुज़रा और रुक गया — शायद शबनम आपा। माँ को देखकर उनके हाथ में जो बर्तन था, वो वैसे ही रह गया।
"सुशीला दीदी?" शबनम आपा ने कहा। "आप — आप अस्पताल में थीं।"
"थी," माँ ने कहा, कुर्सी रुकवाकर। "अब आँगन में जा रही हूँ। अब तक तो कोई नहीं रोका, अब कौन रोकेगा?"
काजल हाँफ रही थी।
"भैया, कहो इन्हें," वो बोली। "मैंने कितना समझाया।"
"मैंने भी समझाया था," मैंने कहा, और मुस्कुराकर माँ के पास गया। "क्या लाई हैं, माँ?"
"दाल," माँ ने कहा। "और रोटियाँ। पचास। और गुड़ की चीनी, और अचार, और उन बच्चों के लिए हलवा भी।"
"माँ —"
"सुन ले," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ अचानक सारी गली में फैल गई, जैसे उन्होंने जान-बूझकर आवाज़ ऊँची की हो। "आज जो भी इस आँगन में आए, उससे बात होने से पहले उसे खाना मिलेगा। मैं नहीं मानूँगी कि कोई भूखा पेट लड़ने आए। भूखे आदमी की ज़ुबान कड़वी हो जाती है, और मैं आज कड़वी बात नहीं सुनना चाहती।"
गली में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।
फिर भोला भाई ने धीरे से कहा, "अरे, ये तो ठीक कह रहीं।"
और फिर सब हँसे। एक साथ, खुलकर। जैसे किसी ने गली के ऊपर से कोई ताला खोल दिया हो।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"कहाँ रखूँ?" उन्होंने पूछा।
"आँगन में," मैंने कहा। "मेज़ के पास। काजल, तू माँ को ले जा और उनके पास ही रह। और माँ —"
"हाँ?"
"आपने जो कहा, वो आपको आज शाम फिर से कहना पड़ेगा। माइक पर।"
माँ ने एक पल मेरी तरफ़ देखा।
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