The Mysterious Bell626 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 626

7 min read November 5, 2026

पर अभी — मुझे मीरा के पास जाना था, टिंकू को बच्चों के साथ भेजना था, शबनम आपा को चाय की तैयारी में लगाना था, हबीब चाचा को आँगन में स्टूल रखवाने थे, और सबसे बड़ी बात —

मुझे माँ के पास जाना था। उन्हें बताना था कि उनका बेटा आज शाम पूरी गली की बैठक करने जा रहा है।

और शायद माँ यही कहेंगी जो वो हमेशा कहती हैं — "पहले खा ले, फिर लड़ना।"

मैं आँगन से बाहर निकला। धूप पीली दीवार से सरक कर आँगन के बीच आ गई थी। सूचना पर स्याही अब सूख चुकी थी, और उसके नीचे वो फटा हुआ कोना — मेरे हाथ में — जैसे कोई मुझे ही बुला रहा हो।

मैंने गली की तरफ़ देखा।

और मुझे लगा कि उस दोपहर, पहली बार, मैंने अपनी गली को आवाज़ देते सुना।

किसी के चूल्हे की, किसी के दरवाज़े की, किसी के बच्चे की, किसी के पंखे की।

सब आवाज़ें।

और उन सबके बीच — मेरी अपनी घंटी।

मैं चल पड़ा।

आज शाम छह बजे।

अस्पताल का आँगन।

पूरी गली।

और मशीन के सामने — गली का दूसरा हिस्सा।

क्योंकि अब अंकुश यादव अकेला नहीं लड़ेगा।

अब वो लोगों को साथ लाएगा।

यही उसका काम था। और यही वो आज शाम करने जा रहा था।

॥

मैं आँगन से बाहर निकला और सीधा गली की तरफ़ बढ़ गया। धूप सरककर अब पीपल की छाया से उतर रही थी, और गली के पत्थर गरम थे। मैंने चलते-चलते ही आवाज़ दी।

"टिंकू!"

वो दौड़कर आया, हाथ में वही पीला काग़ज़ अभी भी दबाए हुए था, जैसे उसे कोई खज़ाना मिल गया हो।

"उस्ताद, मैंने इसे संभाल कर रखा है," उसने कहा। "किसी को दिखाने नहीं दिया।"

"अच्छा किया," मैंने कहा। "अब ये काग़ज़ जेब में डाल, और सुन। आज शाम छह बजे हमारे पास बहुत काम है। तू सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू को बुला। पाँचों को ढूँढकर यहाँ ले आ। मुझे बताना है कि किसको क्या करना है।"

"और वो बात?" टिंकू ने पूछा। "जो काग़ज़ पर लिखी है? दो हाथ, दो जगह नहीं?"

"उसी बात पर हम आज काम करेंगे," मैंने कहा। "जा।"

वो भागा। मैं उसकी पीठ देखता रहा — घुटने पर पट्टी, चप्पल उलटी पड़ी हुई, और भागने में भी हवा में हाथ हिला रहा था जैसे कोई झंडा लेकर दौड़ रहा हो।

मैं मुड़ा और घर की तरफ़ चला। माँ को बताना ज़रूरी था। बात सिर्फ़ बताने की नहीं थी — मुझे उनसे इजाज़त लेनी थी। आज शाम जो होने वाला था, वो सिर्फ़ मेरी गली का काम नहीं था। वो उनका भी था। उनका, पापा का, काजल का, उस पूरे घर का जिसे मैं किसी भी हालत में बचाना चाहता था।

घर का दरवाज़ा खुला था। अंदर से काजल की आवाज़ आ रही थी — वो माँ को कुछ समझा रही थी, और माँ उसे टोक रही थीं।

"अरे, मैं बीमार हूँ, बेवकूफ़ नहीं हूँ," माँ की आवाज़ आई। "मुझे पता है मेरी दवा कब खत्म होगी। तू मुझे कॉपी दिखाने की ज़रूरत नहीं।"

मैं अंदर गया।

माँ पलंग पर बैठी थीं, पीठ के नीचे तकिया रखा था, और सामने मेज़ पर हिसाब की कॉपी खुली थी। उनके हाथ में कलम थी और माथे पर चंदन का टीका था। बीमारी ने उनका चेहरा पतला कर दिया था, पर आँखें वही थीं। वही तेज़, वही सीधी।

काजल मेरी तरफ़ देखकर बोली, "भैया को ही बता दो, मैं तो हार गई।"

"क्या बात है?" मैंने पूछा, पलंग के पास रखी कुर्सी खींचकर बैठते हुए।

माँ ने कलम रख दी।

"बात यह है," वो बोलीं, "कि डॉक्टर इसरानी आज सुबह आए थे और उन्होंने कहा कि काग़ज़ का मामला साफ़ होने तक दवा की नई खेप रुकी हुई है। मैंने कहा, ठीक है, रुकी रहे। और अब ये काजल कह रही है कि आज मैं अस्पताल में ही रहूँ।"

"माँ, आप…" काजल ने हाथ जोड़े।

"काजल, बैठ जा," मैंने कहा।

वो बैठ गई, पर मुँह फुलाए हुए।

मैंने माँ की तरफ़ देखा।

"माँ, आज शाम छह बजे अस्पताल के आँगन में पूरी गली की बैठक है। मैंने बुलाई है। मरीज़ आ रहे हैं। शबनम आपा आ रही हैं, उस्ताद आ रहे हैं, हबीब चाचा आ रहे हैं, बबलू भी आएगा। और आपको नहीं बुलाऊँ, ये मुझसे नहीं होगा।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा।

"डर लग रहा है?" उन्होंने पूछा।

"हाँ," मैंने कहा। "बहुत।"

"अच्छा है," माँ ने कहा। "जो डरता नहीं, वो अपने ही शब्दों में फँस जाता है।"

फिर वो मुस्कुराईं, और उनकी मुस्कान में वही पुरानी बात थी जो मैं बचपन से सुनता आया था।

"पर सुन ले," उन्होंने कहा। "मैं खाली हाथ नहीं आऊँगी।"

"माँ —"

"कुछ नहीं सुनना। मेरी टिफ़िन सेवा का हिसाब लगा। आज चूल्हा जलेगा।"

"माँ, आप बीमार हैं —"

"मैं बीमार हूँ, मरी हुई नहीं हूँ," उन्होंने साफ़ कह दिया। "और आज जो बात करने आएँगे, उन्हें भूखा नहीं लड़ने दूँगी। मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता, और बात में भी नहीं। पर खाने में घी ज़रूर डालती हूँ। खाली पेट लड़ने वाले आदमी को गुस्सा ज़्यादा आता है, हिम्मत कम।"

काजल ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने आँख से इशारा किया — चुप रह।

"अच्छा," मैंने कहा। "पर एक शर्त है।"

"तू मुझसे शर्त करेगा?"

"हाँ," मैंने कहा। "आप कुर्सी पर आएँगी। चलकर नहीं। दो कदम भी नहीं। वरना मैं आपको बैठक में नहीं आने दूँगा, चाहे आप मुझे मार दें।"

माँ ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर हँस पड़ीं। हँसी में खाँसी आ गई, और काजल दौड़कर पानी ले आई।

"तेरे पापा की ज़ुबान आ गई है तुझमें," उन्होंने पानी पीकर कहा। "ठीक है। कुर्सी से आऊँगी। पर खाना मेरा।"

"खाना आपका," मैंने कहा।

मैं उठा। जाते-जाते मैंने काजल की तरफ़ देखा।

"तू माँ के साथ रह," मैंने कहा। "और काजल — घर की तरफ़ से कोई चीज़ चाहिए तो शबनम आपा को बोल देना।"

काजल ने सिर हिलाया, पर उसकी आँखों में वही बात थी जो मेरे अंदर थी। डर की, और उसके साथ उम्मीद की।

मैं बाहर निकला। दोपहर ढल रही थी और गली अचानक हलचल से भर गई थी।

टिंकू ने बच्चों को बुला लिया था। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — चारों पीपल के नीचे खड़े थे, और टिंकू उन्हें कुछ समझा रहा था, जैसे कोई छोटा सिपाही टुकड़ी को हुक्म दे रहा हो। सानिया के हाथ में उसकी लाल कवर कॉपी थी, गुड्डू के हाथ में माचिस की डिब्बी, रफ़ीक़ ने आँख पर वही टूटा चश्मा चढ़ा रखा था जिसका एक काँच गायब था, और चिंटू नंगे पैर खड़ा था, चप्पल हाथ में।

"उस्ताद आ गए," टिंकू ने कहा, और सब मेरी तरफ़ मुड़े।

"सुनो सब," मैंने कहा। "आज शाम छह बजे अस्पताल के आँगन में बैठक है। मरीज़ आएँगे, गली वाले आएँगे, उन्हें लड़कर आने की ज़रूरत नहीं — गली के आदमी की तरह आएँगे। उन्हें बैठने की जगह चाहिए। तुम लोगों को क्या करना है, बताता हूँ, और अगर कोई अड़चन आए तो उस्ताद को बताना, खुद हल करने की कोशिश मत करना।"

"उस्ताद," चिंटू ने कहा, "मैं क्या करूँ?"

"तू सबसे ज़रूरी काम करेगा," मैंने कहा। "तू अपनी चप्पल पहन ले, पहले।"

सब हँस पड़े। चिंटू शर्म से मुस्कुराया और झुककर चप्पल पहनने लगा।

"सानिया," मैंने कहा, "तू और गुड्डू कुर्सियाँ जमा करो। उस्ताद की दुकान से दो, शबनम आपा की गुमटी से तीन, भोला भाई की दुकान से दो, और हाँ — किराने वाले काका की दुकान के बाहर एक पुरानी बेंच पड़ी है, उसे भी ले आना। पर किसी की चीज़ बिना पूछे मत ले जाना। और लौटाते वक़्त भी बताना कि कहाँ रखी है।"

"उस्ताद, अगर कोई मना कर दे तो?" गुड्डू ने पूछा।

"तो मना करने देना," मैंने कहा। "हम भीख नहीं माँग रहे, हम उन्हीं की गली की बैठक कर रहे हैं। मना करे तो 'ठीक है भाई' कहकर आगे बढ़ जाना। बात का दो टुकड़ा नहीं करना।"

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