The Mysterious Bell – Chapter 625
"इसलिए आज शाम," मैंने कहा, "इस आँगन में, हर घर का एक आदमी। एक औरत। एक बच्चा। आज हमारे बीच जो सवाल है, वो आज हमारे बीच रहेगा। आज काग़ज़ का जवाब काग़ज़ से नहीं देंगे — हम खुद देंगे।"
कोई तालियाँ नहीं बजीं। कोई शोर नहीं हुआ। पर लोगों ने सिर हिलाए।
शबनम आपा ने पीछे से कहा — "चाय मेरी। आज शाम पूरे आँगन के लिए।"
उस्ताद ने कहा — "मैं अपनी दुकान की कुर्सियाँ ले आऊँगा। पुरानी हैं, पर बैठने को मिलेंगी।"
हबीब चाचा ने कहा — "मैं अपना आँगन दे दूँगा। नीम की छाँव में सब बैठेंगे।"
डॉक्टर इसरानी ने कहा — "मैं अपने अस्पताल का दरवाज़ा खोल दूँगा। जो भी आए, उसके लिए पानी है, बैठने को है। और — " उनकी आवाज़ धीमी हुई — "एक बात। आज शाम के बाद भी कोई मरीज़ अगर यहाँ आए, तो उसका इलाज होगा। मेरे पास काग़ज़ नहीं है, बस हाथ हैं। ये सूचना जो चिपकी है — मैं उसे मानने से इनकार करता हूँ।"
मीरा ने कहा — "मैं कैमरा लाऊँगी। आज शाम जो भी बोलेगा, वो रिकॉर्ड होगा। कल को कोई कहे कि गली चुप थी — तो ये रिकॉर्ड जवाब देगा।"
टिंकू ने कहा — "मैं सब बच्चों को लाऊँगा। हम बाहर खड़े रहेंगे और देखेंगे कि कौन आ रहा है।"
बबलू ने पीछे से कहा — "मैं — मैं भी आऊँगा।"
मैंने पलटकर देखा। वो दरवाज़े के पास खड़ा था, दाहिने हाथ पर सफ़ेद रूमाल बँधा। उसके चेहरे पर वो मुस्कान नहीं थी, वो शान नहीं थी। वो बस — वो बस वहाँ खड़ा था।
"आ जाओ," मैंने कहा।
"मैं — मैं ये नहीं कह रहा कि मैं अच्छा आदमी हूँ," उसने कहा, धीमे से। "मैं सिर्फ़ ये कह रहा हूँ कि — मैं जानता हूँ कि कौन कर रहा है। और मैंने चुप रहना बंद कर दिया है।"
"तो आ जाओ," मैंने दोहराया।
बबलू ने सिर हिलाया, फिर मुड़कर चला गया।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
"उस्ताद," मैंने धीरे से कहा, "अब मैं क्या करूँ?"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"अब तू क्या करेगा?" उन्होंने कहा। "अब तू वही करेगा जो तूने अब तक नहीं किया।"
"क्या?"
"अब तू अपनी दुकान पर नहीं बैठेगा," उन्होंने कहा। "अब तू अकेले नहीं लड़ेगा। अब तू घंटी लेकर गली में नहीं घूमेगा कि किसी को क्या बताऊँ। अब तू —" उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा — "अब तू लोगों को लाएगा। तेरा काम चीज़ें जोड़ना नहीं है, अंकुश। तेरा काम लोगों को जोड़ना है। और आज शाम — " उन्होंने पीली दीवार की तरफ़ देखा — "आज शाम जब पूरी गली यहाँ बैठेगी, तू कुछ नहीं बोलेगा। तू सिर्फ़ सुनने का काम करेगा। और जब सब बोल चुकेंगे, तब तू वो कहेगा जो सबने पहले ही सोचा होगा।"
मैंने एक गहरी साँस ली।
और तब मुझे कुछ याद आया।
"उस्ताद," मैंने कहा। "एक बात। आज शाम की बैठक के लिए — मुझे माँ को वहाँ लाना है। वो अस्पताल में हैं, इसी इमारत में। वो इसी अस्पताल की मरीज़ हैं। उन्हें हक़ है कि वो भी सुनें कि उनके बेटे को क्या कहना है।"
उस्ताद ने सिर हिलाया।
"हाँ," उन्होंने कहा। "और एक और आदमी है जिसे तूने अभी तक नहीं बुलाया।"
"कौन?"
"सलीम बक्श," उन्होंने कहा। "उसने कहा था — कल दस बजे रजिस्टर लाएगा। जब तक कल आए, आज शाम उसे भी यहाँ होना चाहिए। क्योंकि जो आदमी रजिस्टर लाता है, वो गली के सामने आता है। और जो गली के सामने आता है, उसे गली के साथ बैठना पड़ेगा।"
मैंने सिर हिलाया।
"ठीक है।"
फिर मैंने अपनी जेब से फोन निकाला। मैंने एक नंबर मिलाया। घंटी बजी। दूसरी। तीसरी।
"हैलो?" दूसरी तरफ़ आवाज़ आई। रज़ा सलीम।
"रज़ा भाई," मैंने कहा। "आज शाम। अस्पताल का आँगन। सूरज ढलने से पहले। मैं चाहता हूँ कि आप आएँ।"
कुछ देर चुप्पी रही।
"क्यों?" उन्होंने पूछा।
"क्योंकि," मैंने कहा, "जो पन्ना आप कल सुबह लाने वाले हैं — उसका जवाब आज शाम की बैठक में होगा। और मैं चाहता हूँ कि आप खुद सुनें कि गली क्या बोलती है।"
फिर से चुप्पी। फिर —
"मैं आऊँगा," उन्होंने कहा, और लाइन कट गई।
मैंने फोन जेब में रखा।
और जब मैंने पलटकर आँगन देखा — तो कुछ अलग था।
शबनम आपा ट्रे उठाकर गुमटी की तरफ़ जा रही थीं, पर रुक कर मुड़ीं और बोलीं — "अंकुश, तूने आज शाम का जो न्योता दिया है, वो ऐसे नहीं होगा। लोग आएँगे, बैठेंगे, एक-दूसरे को देखेंगे, और फिर चुप हो जाएँगे। क्योंकि उनमें से किसी को नहीं पता कि कैसे बोलना है। तुझे कुछ करना पड़ेगा।"
"क्या?"
"पहले सवाल," उन्होंने कहा। "तू पहले सवाल पूछेगा। सीधा। जिसका जवाब हर किसी के पास हो, पर कोई बोलता न हो।"
मैंने सोचा।
"कौन सा सवाल?" मैंने पूछा।
शबनम आपा ने ट्रे कमर पर रखकर कहा — "पूछ — 'कल सुबह सात बजे जो मशीन इस गली में आने वाली है, उसके पहले हम सब कहाँ थे?'" उन्होंने अपना कंधा झटका। "फिर तू देख, कैसे सब बोलना शुरू करते हैं।"
मैंने होंठ सिकोड़े। वो ठीक कह रही थीं।
"ठीक है," मैंने कहा। "आज शाम। सात बजे।"
"छह बजे," उन्होंने कहा। "सूरज जल्दी ढलता है। और लोगों को रोटी का वक़्त भी देना है।"
"छह बजे," मैंने कहा।
और फिर मैं आँगन के बीच से हट गया।
मैं पीली दीवार के पास गया, जहाँ वो सूचना चिपकी थी। मैंने उसे देखा। उसके नीचे की तरफ़ वो फटा हुआ कोना था, जो मेरे हाथ में था। और उसके ऊपर, मिटी हुई लाइन, "जोड़ना बंद करो।"
और उनके बीच — मिटाई हुई तीसरी लाइन।
मैंने अपनी हथेली उस जगह पर रखी। घंटी मेरी जेब में थी, पर मुझे लगा कि वो गरम हो रही है।
"देख," मैंने धीरे से कहा, "तेरे पास आज कोई सवाल नहीं है। सिर्फ़ एक बात कहनी है, तो कह दे।"
घंटी बोली —
"लोगों से बोल। मुझसे नहीं।"
मैं हँस पड़ा।
और उसी पल, पीछे कहीं से, मुझे टिंकू की आवाज़ आई —
"उस्ताद — उस्ताद, देखो।"
मैं पलटा।
टिंकू आँगन के फाटक पर खड़ा था, हाथ में पीला काग़ज़, और उसकी आँखें फैली हुई थीं।
"क्या?" मैंने कहा, उसके पास दौड़ते हुए।
"ये —" उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ये मुझे फाटक के नीचे से मिला। अभी। कोई अभी आकर रख गया है।"
मैंने काग़ज़ पढ़ा। सूखी स्याही में, तीन लाइनें।
"आज शाम छह बजे तेरी बैठक होगी।
अस्पताल के आँगन में।
उसी वक़्त, अस्पताल के पीछे, मशीन खड़ी होगी। तेरा चुनाव — आँगन या मशीन। तेरे पास दो हाथ हैं, दो जगह नहीं।"
मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ा।
साँस रोक कर रह गया।
मेरे पीछे उस्ताद आए। उन्होंने काग़ज़ देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा। उनकी आवाज़ धीमी थी।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "अब ये टक्कर है।"
मैंने काग़ज़ मोड़ा, जेब में रखा।
"नहीं, उस्ताद," मैंने कहा। "अब ये टक्कर नहीं है। ये सवाल है।"
मैंने अपनी घंटी निकाली। मैंने उसे उँगलियों के बीच लिया और पूरे आँगन को सुना दिया।
और घंटी ने कहा — "उत्तर एक ही है। दोनों जगह। दो हाथ नहीं, दो आदमी।"
मैं मुस्कुराया।
यही तो मैं सीख रहा था — पूरी कहानी में, हर एपिसोड में, हर बार।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आज शाम आँगन में बैठक होगी। पर आँगन खाली नहीं रहेगा। गली के आधे लोग आँगन में, आधे पीछे की तरफ़ — मशीन के सामने।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
फिर धीरे से हँसे।
"अब तू सीख रहा है," उन्होंने कहा।
आज शाम छह बजे — ये तय हो गया।
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