The Mysterious Bell – Chapter 624
फिर एक और। "मेरे पति यहाँ भर्ती थे। अब यहाँ नहीं आएंगे?"
मैं उनकी आवाज़ें सुन रहा था और मेरा गला बंद हो रहा था। मेरे हाथ में घंटी थी, और घंटी चुप थी — पूरी तरह चुप। जैसे वो भी सुन रही हो, बोल नहीं रही हो।
फिर किसी की आवाज़ आई, थोड़ी ऊँची। मैंने देखा — एक आदमी आगे आया, जो एक औरत की कुर्सी का हत्था पकड़े था। "तो अब क्या करेंगे?" उसने कहा। "रात भर सड़क पर सोएँ?"
यही वो हिस्सा था जहाँ शबनम आपा आईं।
वो आयीं — बिना किसी से कुछ कहे। उनके हाथ में एक बड़ी सी केतली थी और दूसरे हाथ में कपों की ट्रे। आँगन के कोने में उन्होंने ट्रे रखी, और फिर वो मेरे पास आईं और बोलीं — "एक मिनट।"
"आपा —" मैंने कहना शुरू किया।
"एक मिनट," उन्होंने दोहराया। उन्होंने ट्रे से एक कप उठाया, मेरी तरफ़ बढ़ाया। "पहले पी।"
"मैं अभी —"
"अंकुश," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो कड़क थी जो माँ की होती है — "तू तीन दिन से ठीक से खाया नहीं है, मैं जानती हूँ। मैं तेरी दुकान के सामने खड़ी रहती हूँ, मैं देखती हूँ। तू रोज़ शाम को एक बिस्किट खाता है और लगता है जैसे पूरी दुनिया जीत ली हो। पहले पी। फिर लड़ना।"
मैंने कप लिया।
आपा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और आँगन की तरफ़ पलटीं। "सब लोग," उन्होंने कहा, "एक मिनट के लिए रुक जाओ। जो भी यहाँ खड़ा है — एक-एक कप चाय पी लो। दो मिनट लगेंगे। उसके बाद जो करना है, दिन भर रोने के लिए वक़्त है। पर अभी — पहले पेट में कुछ डालो।"
वो वाक्य — मैंने सुना, और मुझे अपनी माँ याद आईं।
वही माँ जो अस्पताल में थीं, वो भी यही कहती थीं — "पहले खा ले, फिर सोचना।" मुझे लगा कि हर गली की हर औरत के मुँह में यही वाक्य होता है।
लोगों ने चाय ली। बूढ़ी औरत ने, जिसके कंधे पर बच्चा था, उसने, लाठी वाले बूढ़े ने — सबने। और कुछ देर के लिए आँगन में वो रोने की आवाज़ें रुकीं। बस कुछ देर के लिए। पर रुकीं। और उसी में मुझे लगा कि शायद — शायद हम आज हारे नहीं हैं।
टिंकू मेरे पास आया। उसके हाथ में पीली सूचना का फटा हुआ कोना था, और उस पर चश्मा लगा था — दोनों तरफ़ से काँच निकले हुए शीशे, बस फ्रेम। वो उसे घुमा रहा था, देख रहा था।
"उस्ताद," उसने कहा, "ये काग़ज़ मेरे स्कूल के होमवर्क के पन्ने से भी पतला है।"
"क्या?"
"देखो ना," उसने काग़ज़ उठाया। "मेरी कॉपी के पन्ने मोटे हैं। इसे हवा में पकड़ो तो उड़ जाए। और — " उसने काग़ज़ के किनारे को मोड़ा, " — इसमें सिर्फ़ एक तरफ़ लिखा है। दूसरी तरफ़ कुछ नहीं। मतलब — इसे रात भर में छापा गया है। किसी बड़े दफ़्तार में नहीं। किसी छोटे प्रेस में।"
मैंने उसे देखा।
"तूने ये कब देखा?" मैंने पूछा।
"जब आप दीवार से काग़ज़ नोच रहे थे," टिंकू ने कहा। "मैंने सोचा — आपके हाथ में फटा हुआ काग़ज़ है, देख लूँ।" उसने सिर खुजाया। "और उस्ताद, अगर ये आदमी रात भर में छपवा सकते हैं, तो इन्होंने सोचा है। और अगर इन्होंने सोचा है, तो —"
"तो?" मैंने कहा।
"तो इनका कोई और भी प्लान होगा।" उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "काग़ज़ छोटा है। धमकी बड़ी है। पर ये —" उसने होंठ सिकोड़े — "ये डर का काम कर रहा है, ये सच का नहीं।"
मेरे पीछे किसी ने गहरी साँस ली।
मैंने पलटकर देखा। उस्ताद थे, उनके हाथ में एक कप था, पर उन्होंने उसमें से घूँट नहीं लिया था। वो काग़ज़ देख रहे थे, फिर आँगन देख रहे थे, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा चल रहा था जो चेहरे पर नहीं दिखता।
"अंकुश," उन्होंने धीरे से कहा, "तूने कभी सोचा — साहब इस गली को इतनी आसानी से क्यों नहीं हरा पा रहा? वो अकेले अस्पताल को बंद कर सकता है, अकेले एक दुकान को उठा सकता है, अकेले किसी को डरा सकता है। पर वो हम सबको एक साथ क्यों नहीं तोड़ पा रहा?"
"क्यों?" मैंने कहा।
क्योंकि वो जानता है," उस्ताद ने कहा, "कि जिस दिन हम सब एक साथ, एक आँगन में, एक चाय के साथ खड़े हो जाएँगे — उस दिन उसके सारे काग़ज़ बेकार हो जाएँगे।"
"तो —" मैंने कहा।
"तो," उन्होंने कहा, "वो कोशिश कर रहा है कि वो दिन न आए। और तूने आज क्या किया? तूने पूरे आँगन को एक जगह जमा कर दिया। तूने नहीं सोचा, तूने होने दिया। और वो सहन नहीं कर पा रहा। इसीलिए उसने आज सुबह सूचना चिपकवाई। क्योंकि उसे पता है — हम एक हो रहे हैं।"
मैंने उनकी आँखों में देखा।
"उस्ताद," मैंने कहा, "मैं अब तक — मैं अब तक सोचता रहा कि ये लड़ाई मेरी है। मेरी दुकान, मेरी घंटी, मेरा मोहल्ला, मेरा ताला। मैं गली-गली घूमता रहा, टुकड़े जोड़ता रहा, और हर बार सोचता — एक और जोड़, बस।"
"और अब?"
मैंने आँगन देखा। बूढ़ी औरत जो सीढ़ी पर बैठी थी, अब अपने बच्चे को सीने से चिपकाए चुप खड़ी थी। डॉक्टर इसरानी अपनी आँखें पोंछ रहे थे। हबीब चाचा दरवाज़े पर खड़े थे, हाथ बँधे हुए — जैसे वो किसी से कुछ माँगना चाहते हों। शबनम आपा ट्रे उठा रही थीं। मीरा कैमरा रखकर एक औरत के बच्चे का मुँह पोंछ रही थी। टिंकू मेरे साथ खड़ा था, एक हाथ में काग़ज़, दूसरे हाथ में टूटा चश्मा। और पीछे, दरवाज़े के पास, मेरी दुकान का बंद शटर दिख रहा था।
"अब," मैंने कहा, "अब समझ आ रहा है कि घंटी ने क्यों कहा था — अब शुरू हुआ।"
उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।
मैं आँगन के बीच में गया। मैंने अपना एक हाथ ऊपर उठाया, और लोगों ने देखा। वो देखना ऐसा था जैसे मैंने उन्हें कुछ दिया हो — बिना कुछ दिए।
"सब लोग," मैंने कहा। मेरी आवाज़ पहले तो काँपी, फिर सँभली। "सब लोग — एक मिनट के लिए रुको। मैं जानता हूँ, मैं जानता हूँ कि आज हर किसी के दिल में यही सवाल है — मैं कहाँ जाऊँगा? कहाँ जाऊँगी? और उस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं है।"
मैंने साँस ली।
"पर इतना जानता हूँ," मैंने कहा। "जो काग़ज़ आज इस दीवार पर चिपका है, वो किसी ने मेरे लिए नहीं चिपकाया। उसने आपके लिए चिपकाया। उसने सोचा — ये लोग डर जाएँगे, और चुपचाप चले जाएँगे।"
मैंने रुककर आँगन देखा।
"पर मैंने आज इस आँगन में जो देखा," मैंने कहा, "वो ये है कि कोई नहीं डरा। कोई चुप नहीं हुआ। एक औरत ने चाय पिलाई, एक बच्चे ने काग़ज़ की मोटाई नाप ली, एक बूढ़ी औरत ने अपना बच्चा सीने से लगाकर कहा — मैं कहाँ जाऊँगी। ये डर की आवाज़ नहीं थी, मेरे भाई। ये सवाल था। और सवाल का जवाब हम सब मिलकर देंगे।"
कुछ देर सन्नाटा रहा।
फिर किसी ने कहा — "कब?"
मैंने साँस ली।
"आज शाम," मैंने कहा। "इसी आँगन में, इसी पीली दीवार के सामने, जहाँ ये सूचना चिपकी है — आज शाम जब सूरज ढलेगा, पूरी गली की बैठक होगी।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और घंटी निकाली।
घंटी अब चुप नहीं थी।
वो मेरे हाथ में हिल रही थी, जैसे कोई साँस ले रहा हो। मैंने उसे अपनी हथेली पर रखा और आँगन को दिखाया। "जिसको लगता है कि ये अस्पताल उसका है," मैंने कहा, "वो आज शाम आए। जिसको लगता है कि इस गली का एक ईंट भी उसका है — वो आए। जिसे लगता है कि उसका कुछ नहीं है — वो भी आए। क्योंकि आज जो इस अस्पताल पर लगा है, वो कल उसकी दुकान पर लगेगा, परसों उसके घर पर लगेगा। और जिस दिन हम सब अपने-अपने घरों में अकेले खड़े होंगे — उस दिन कोई हमारे पास नहीं होगा।"
मैंने घंटी को अपनी हथेली में भींचा।
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