The Mysterious Bell619 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 619

7 min read November 5, 2026

"भाई साहब," मैंने कहा, "कहाँ?"

"जहाँ डर न हो," उसने कहा। "बच्चे का बुखार है। मैं उसे ऐसी दीवार के नीचे नहीं रखूँगा जिस पर ऐसी बातें लिखी हों।"

और फिर डॉक्टर इसरानी आए।

वो सीढ़ी से उतर रहे थे, हाथ में वही टेप से लिपटा पुराना स्टेथोस्कोप, कमीज़ की बाँह चढ़ी हुई, और जैसे ही वो आँगन में आए, उन्होंने अपनी आवाज़ बिल्कुल नहीं उठाई।

उन्होंने धीरे कहा, पर ऐसा धीरे कि सब चुप हो गए।

"कोई कहीं नहीं जा रहा।"

कंधे पर बच्चा लिए आदमी रुका।

"डॉक्टर साहब — "

"मैंने कहा, कोई कहीं नहीं जा रहा।" उन्होंने अपना चश्मा उतारा, साफ़ किया, फिर पहना, और सीधे उस आदमी के सामने जाकर खड़े हो गए। "तुम्हारे बच्चे का बुखार कल रात आया था?"

"हाँ।"

"कितना था?"

"डॉक्टर साहब, वो बात नहीं — "

"कितना था?"

आदमी ने नीचे देखा। "बहुत था।"

"और अब?"

"अब कम है।"

"क्योंकि मैंने तीन बार खिड़की से निकलकर उसे देखा," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "और अब सुनो। ये दीवार सालों से यहाँ है। सालों से इस पर कुछ न कुछ लिखा जाता रहा है। पाँच साल पहले भी इस पर लिखा गया था। मैं पाँच साल से यहाँ हूँ — मैंने अस्पताल नहीं छोड़ा।"

"पर डॉक्टर साहब — "

"और आज कोई मरीज़ नहीं जाएगा।" उन्होंने पीछे मुड़कर पूरे आँगन को देखा। "जिसको डर है, वो मेरे कमरे में आकर बैठ जाए। चाय आएगी। पर जिसका इलाज यहाँ चल रहा है, वो इलाज किसी अजनबी के लिखे एक शब्द से नहीं रुकेगा।"

एक बूढ़ी औरत ने रुमाल से मुँह ढका। वही औरत, जिसका बेटा कल शाम सीढ़ी पर मिला था और जिसने मुझे कल सीढ़ी के पास बुलाया था। वो उठी और डॉक्टर इसरानी के पास जाकर खड़ी हो गई — बस खड़ी हो गई, कुछ नहीं कहा, पर खड़ी होना ही बहुत था।

कंधे पर बच्चा लिए आदमी ने भी अपनी बोरी नीचे रख दी।

डॉक्टर इसरानी मेरी तरफ़ आए।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "ये दीवार?"

"मैं साफ़ करता हूँ," मैंने कहा।

"साफ़ करना ज़रूरी है। पर सिर्फ़ इसलिए नहीं कि ये मरीज़ों को डरा रही है। इसलिए भी कि जो नीचे है, उसे भी पता चले कि ऊपर लोगों की आँखें खुली हैं।"

मीरा को मेरी तरफ़ देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। वो पहले ही एक बाल्टी और पुराना कपड़ा ढूँढ लाई थी। हमने पानी डाला, कपड़ा भिगोया, और दीवार पर हाथ चलाया।

कालिख पानी में घुली नहीं।

मैंने ज़ोर लगाया। कपड़ा तीन बार फिराया। दीवार पर एक हल्की सी काली लकीर बनी, फिर वो भी वहीं रह गई, जैसे कोई चीज़ स्याही न हो, जड़ हो गई हो।

"अंकुश," मीरा ने धीरे कहा।

"हाँ।"

"ये साफ़ नहीं हो रहा।"

"मुझे दिख रहा है।"

मैंने हाथ और ज़ोर से घुमाया। तब मेरी जेब से आवाज़ आई।

घंटी।

धीमी। Quite — नहीं, आवाज़ थी, पर दबी।

"रुक।"

मैं रुक गया। मेरा हाथ दीवार पर वैसे ही रुका रहा।

"ये राख है," घंटी ने कहा। "राख ज़ुबान होती है। पानी से नहीं छूटती।"

"तो क्या करूँ?"

"सच से।"

मैंने कपड़ा बाल्टी में गिरा दिया।

"कौन सच?"

घंटी चुप हो गई।

मैं वहीं ज़मीन पर बैठ गया। मैंने देखा — दीवार पर तीन लाइनें थीं। पुरानी, जैसे किसी ने सालों पहले तेज़ हाथ से लिखा हो और उसे भूला जा चुका हो।

दूसरी, ताज़ी, गीली, जो अभी रात में लिखी गई थी।

और तीसरी, वो जो मैंने सोची थी और अपने आप लिखी मिली थी।

"मीरा," मैंने कहा।

"हाँ।"

"ये सच बोलने वाला है।"

"कौन?"

"जिसने लिखा।"

उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू सोच रहा है कि यहाँ कोई और है।"

"मैं सोच रहा हूँ कि यहाँ कोई और है जो अब तक सामने नहीं आया।" मैं उठा। "और मैं ये भी सोच रहा हूँ कि वो सामने नहीं आया, क्योंकि वो चाहता है कि हम उसे ढूँढें। दीवारों पर लिखकर।"

तभी आँगन के फाटक की तरफ़ से एक आवाज़ आई।

"टिंकू।"

टिंकू ने पलटकर देखा, और उसके चेहरे पर जो आया, वो मैंने पहले कभी नहीं देखा — आधा डर, आधा हैरानी।

"भैया?"

फाटक पर बबलू खड़ा था।

न चेन। न पानदान। न वो मोटी सोने की चेन, जो उसके गले से कभी नहीं उतरती थी। उसने सिर्फ़ एक सादी सफ़ेद कमीज़ पहनी थी, जिसके कॉलर से कुछ धूल लगी थी, और उसके दाहिने हाथ पर वो सफ़ेद रुमाल अब भी बंधा था, जिस पर सूखे गुलाबी दाग थे।

वो आँगन में आया। किसी को धमकाया नहीं। किसी की तरफ़ उँगली नहीं उठाई। बूढ़ी औरत के पास से गुज़रा और मैंने देखा कि उसने एक पल के लिए कदम धीमा किया, जैसे कोई चीज़ कहना चाहता हो और रुक जाए।

फिर वो मेरे पास आया।

"अंकुश," उसने कहा। उसकी आवाज़ वो आवाज़ नहीं थी जो चबूतरी पर सबको धमकाती थी। उसकी आवाज़ सूखी थी। "ज़रा अलग आना।"

टिंकू मेरे पीछे आ गया। उसने धीरे से, बिल्कुल मेरे कान के पास, कहा:

"उस्ताद, आज बबलू भैया की छाया भी डर रही है।"

मैंने उसे चुप रहने का इशारा किया।

हम आँगन के उस कोने में गए जहाँ दीवार का साया पड़ता था और खिड़कियों से कोई नहीं देख सकता था। बबलू ने पीछे मुड़कर देखा। उसने ऊपर देखा। फिर अपनी जेब देखी — वो आदत, फिर वही।

"मुझे कुछ कहना है," उसने कहा।

"कहो।"

"पर कहने के बाद — " उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो डर के साथ-साथ आती है — शर्म," कहने के बाद तू मुझे गली से निकाल सकता है। पर तू मुझे यहाँ ज़िंदा रहने दे, इससे ज़्यादा कुछ नहीं माँगूँगा।"

"बबलू भाई," मैंने कहा, "मैं किसी को गली से नहीं निकालता। मैं तो दरवाज़े ठीक करता हूँ।"

उसने एक बार सूखी हँसी हँसी। फिर उसका चेहरा उतर गया।

"वो बक्सा," उसने कहा।

मेरी साँस एक पल के लिए रुक गई।

"कौन सा बक्सा?"

"वो जो कल रात मिला — राख का गोला वाला। तहखाने में।" उसने गला साफ़ किया। "मैंने उसे खोला था।"

मैं चुप खड़ा रहा।

"मैंने कहा था न," उसने आगे कहा, "साहब चीज़ें सबसे शोर वाली जगह के सबसे गहरे सन्नाटे में रखता है। मुझे ये बात उसी ने सिखाई थी। सालों पहले। जब मैं उसका नया आदमी था और मुझे लगता था कि मैं बहुत चालाक हूँ।"

"बबलू भाई — "

"वो बक्सा तहखाने में नहीं रखा था," उसने कहा। "मैंने उसे सात महीने पहले ही निकलवा दिया था। मेरे ही हाथों से निकला था।"

मैंने पीछे देखा। उस्ताद दूर खड़े थे, और उन्होंने सिर्फ़ इतना किया कि अपना चश्मा उतारा और पोंछने लगे — पर वो चश्मा साफ़ था। वो सिर्फ़ हाथ को कुछ करने की जगह दे रहे थे।

"तुमने क्यों निकाला?" मैंने पूछा।

"क्योंकि साहब ने कहा था।" उसने नीचे देखा। "उसने कहा था कि उस बक्से में कुछ ऐसा है जो अगर गलत हाथ में गया, तो पूरा काम बंद हो जाएगा। मैंने पूछा था, क्या है? उसने कहा — तुम्हारे जानने की चीज़ नहीं। और मैंने फिर नहीं पूछा।"

"तो तुमने खोला क्यों?"

"क्योंकि मैंने उसका चेहरा देखा था," बबलू ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में वो भारीपन आ गया जो आदमी के अंदर सालों तक रहता है और कभी हल्का नहीं होता, "जिस दिन उसने ये कहा था। उस दिन उसके चेहरे पर वो मुस्कान नहीं थी। उस दिन उसका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने अंदर से बत्ती बुझा दी हो। और मैंने सोचा — अगर ये आदमी इतना डरा हुआ है, तो जो चीज़ इसके अंदर डर पैदा करती है, वो मेरे लिए ज़रूरी है।"

"तो तुमने खोला।"

"रात को। अकेले। बिजलीघर के पीछे के कमरे में।"

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