The Mysterious Bell – Chapter 620
वो रुका। उसने अपना रुमाल उठाया और माथा पोंछा, फिर उसे वैसे ही मोड़कर हाथ में दबाया।
"उसमें एक पीला काग़ज़ था," उसने कहा। "और एक चीज़ और।"
"क्या?"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
और फिर उसने वो कहा, जो मैं सुनना नहीं चाहता था, पर जिसका इंतज़ार कर रहा था, क्योंकि कल रात से यही एक सवाल मेरे अंदर चल रहा था।
"एक घंटी," उसने कहा। "तुम्हारी घंटी जैसी। पर टूटी हुई।"
मेरी जेब में घंटी हिली। बिना बजे। बस हिली। और मुझे लगा कि मेरे सीने के अंदर कोई चीज़ भी उसके साथ हिल गई है।
"कहाँ है वो?" मैंने पूछा।
बबलू ने अपना होंठ चबाया।
"यही तो बात है," उसने कहा। "मैंने उसे खोला, देखा, और फिर मैंने बंद कर दिया। और अगली सुबह जब मैं उसे वापस ले जाने आया — "
"तो?"
"तो बक्सा वहाँ नहीं था," उसने कहा।
हम दोनों चुप खड़े रहे।
दूर, आँगन से आवाज़ें आ रही थीं — कोई पानी भर रहा था, कोई किसी को डाँट रहा था, और डॉक्टर इसरानी की आवाज़ किसी को दवा की खुराक समझा रही थी। ज़िंदगी अपने आप चल रही थी, बिल्कुल वैसे जैसे घंटी ने कहा था — बाहर की दुनिया अपनी रफ़्तार से चलती रहती है।
"तो ये किसी ने चुराया," मैंने कहा।
"नहीं," बबलू ने कहा। "चुराया नहीं। ये ये नहीं है।"
"तो क्या है?"
वो मेरे करीब आया। इतना करीब कि मुझे उसके मुँह से वो गंध आई जो उसके पान खाने के बाद होती थी — हल्की, मीठी, और आज उसके साथ कुछ और थी, कुछ जला हुआ।
"अंकुश," उसने कहा, "जब मैंने वो बक्सा खोला, तो उसके अंदर जो काग़ज़ था, उस पर एक नाम लिखा था।"
"किसका?"
"तेरे दादा का," उसने कहा। "और उसके नीचे — "
एक पल के लिए वो रुका और मुझे लगा कि वो अपनी ज़ुबान पर आई बात को वापस निगलने की कोशिश कर रहा है।
"उसके नीचे," उसने कहा, "मेरा नाम था।"
मैं पीछे हटा।
"तेरा नाम?"
"बबलू पांडे।" उसने कहा, और जब उसने अपना पूरा नाम ज़ोर से बोला तो जैसे उसने किसी दरवाज़े को धक्का दिया हो। "लिखा हुआ था। काग़ज़ पर। साहब के काग़ज़ पर। उसी काग़ज़ पर, जिस पर पाँच साल पहले तेरे पापा ने अंगूठा लगाया था।"
मेरी जेब में घंटी ने जो कहा, वो बहुत छोटा था।
"अब शुरू हुआ।"
मैंने बबलू की आँखों में देखा। और उस पल मुझे पता चला कि मेरे सामने जो आदमी खड़ा है, वो वो बबलू नहीं है जिससे पूरी गली डरती है। वो आदमी आज नहीं है। वो आदमी आज सिर्फ़ एक डरे हुए इंसान की तरह अपनी जेब टटोल रहा है, जिसे लगता है कि उसके नाम का काग़ज़ कहीं खुला पड़ा है और हवा उसे दूर तक उड़ाकर ले जाएगी।
"बबलू भाई," मैंने कहा। "तुम्हारे पास वो काग़ज़ है?"
"नहीं।"
"तो कहाँ है?"
उसने ऊपर आसमान की तरफ़ देखा। फिर उसने मुझे देखा।
"जहाँ से वो बक्सा गया," उसने कहा। "वहीं गया काग़ज़। और वो जगह मुझे पता है। पर मुझे यक़ीन नहीं है कि वहाँ जाकर मैं वापस आऊँगा।"
॥
बबलू ने मेरी कलाई पकड़ी और खींचकर पानी की टंकी के पीछे ले गया।
टंकी के पीछे धूल ज़्यादा थी और हवा कम। वहाँ बंसीलाल की पुरानी बोरी पड़ी थी, एक टूटी बाल्टी औंधी पड़ी थी, और दीवार से सटी एक जगह पर पिछले किसी मज़दूर का चप्पल छोड़ा हुआ था। बबलू दीवार के सहारे धड़ाम से बैठ गया। बैठा तो नहीं, गिरा। जैसे उसके घुटनों ने काम करना बंद कर दिया हो।
मैंने उसे देखा। तीन महीने पहले तक यही आदमी गली में स्कूटर घुमाता था, सोने की मोटी चेन गले में, पान का बर्तन जेब में, और किसी की दुकान का शटर उठाते वक़्त उसकी आवाज़ इतनी ऊँची होती थी कि पीपल के पत्ते हिल जाते थे।
आज वो दीवार के सहारे बैठा था, बिना चेन, बिना पानदान, बिना आवाज़।
"बबलू भाई," मैंने कहा और उसके सामने बैठ गया। "साँस लो।"
"ले रहा हूँ।"
"नहीं ले रहे हो।"
"अंकुश," उसने कहा, और उसकी आवाज़ कुछ ऐसी थी जैसे रेडियो की बैटरी अंतिम बार घूम रही हो, "मैं चार साल से ठीक से नहीं सोया।"
मैं चुप हो गया।
"हर रात," उसने कहा। "हर रात कोई आवाज़ आती है। लकड़ी के जूतों की। धीमी। सीढ़ी पर चढ़ती हुई। फिर रुक जाती है मेरे बिस्तर के पास, और मैं — मैं आँख बंद किए पड़ा रहता हूँ। बंद किए हुए। क्योंकि अगर खोल दी, तो जो भी खड़ा है, वो मुझे देख लेगा। और फिर वो हमेशा के लिए रुक जाएगा।"
"ये कब शुरू हुआ?"
"तू पूछ रहा है कब शुरू हुआ?" उसने मुँह उठाया। "अंकुश, वो साला काग़ज़ मैंने खुद खोला था। अपने हाथों से। साहब ने कहा था — बबलू, रात को जाकर देख आ, बक्से में क्या है।"
"क्यों?"
"क्यों — " उसने अपनी ओर मेरी तरह देखा, जैसे मैंने कोई बहुत मुश्किल सवाल पूछ लिया हो। "अंकुश, तू साहब को जानता है? नहीं जानता। तू सोचता है साहब आदमी पर भरोसा करते हैं? साहब हर आदमी की एक सीमा जानते हैं। मेरी सीमा थी कि मैं डरपोक हूँ। और उन्हें पता था। जिस रात उन्होंने कहा, मैं बिना पूछे चला गया। सोचा कोई काग़ज़ होगा, किसी का नाम होगा, फाड़ के ले आऊँगा, साहब खुश होंगे।"
"और बक्सा?"
"बिजलीघर के पीछे के कमरे में था। पीछे वाला कमरा — तू जानता है, वो जहाँ ट्रकों वाला बक्सा रखा है साहब।" उसने पानी की टंकी की तरफ़ इशारा किया, फिर वापस मेरी तरफ़। "मैं रात ग्यारह बजे गया था। मेरे साथ कोई नहीं था। सिर्फ़ एक टॉर्च और — और अपनी जेब में घुसा हुआ डर।"
"क्या देखा?"
"बक्सा बड़ा था। लोहे का। नीला रंग अब उतर गया था। उस पर ऊपर एक ढक्कन और ढक्कन पर एक सीसे की मोहर — आधी टूटी हुई। जैसे कोई बहुत पहले खोल चुका था और फिर ठीक से बंद नहीं कर पाया।" उसने अपना गला साफ़ किया। "मैंने लोहे की छड़ मारी, ढक्कन उठा।"
वो रुका।
मैं चुप रहा। पूरी गली में किसी ने एक शब्द नहीं कहा था, ऐसा लगा। दूर आँगन से एक औरत के हाथ से कोई बर्तन गिरा था और वो आवाज़ भी अब खत्म हो चुकी थी।
"फिर?" मैंने कहा।
"ओह," उसने कहा, और उसका पूरा शरीर काँप गया, जैसे अभी भी वो धुआँ उसके अंदर से गुज़र रहा हो, "फिर अंदर से धुआँ निकला।"
"धुआँ?"
"हाँ," उसने कहा। "ठंडा धुआँ।"
मैंने देखा उसकी तरफ़।
"बबलू भाई, धुआँ गरम होता है।"
"नहीं," उसने पूरी शक्ति से सिर हिलाया। "नहीं, अंकुश। वो गरम नहीं था। वो ठंडा था, बर्फ़ जैसा ठंडा। वो निकला और मेरे मुँह से सीधे अंदर गया, जैसे — जैसे किसी ने मेरे अंदर एक उल्टी साँस खींच दी। और मैं वहाँ खड़ा रह गया, जम हुआ, और मुझे लगा कि मेरे पीछे कोई खड़ा है।"
"कौन?"
"पता नहीं," उसने कहा। "बस खड़ा था। और उसका जूता लकड़ी का था। मुझे कभी नहीं दिखा, पर मुझे हर रोज़ सुनाई देता है।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।
घंटी वहीं थी। ठंडी थी, बिल्कुल वैसे जैसे सुबह की सभा के बाद से हो रही थी। मैंने उस पर हाथ रखा तो वो थोड़ी हिली। नहीं बजी। बस हिली।
"अंदर क्या था?" मैंने पूछा।
"मैंने टॉर्च मारी," उसने कहा। "और अंदर सबसे पहले एक चीज़ चमकी। काग़ज़। पीला। मुड़ा हुआ। मैंने उठाया।"
"और उस पर?"
"जगदीश यादव," उसने धीरे से कहा, और मुझे लगा उसने वो नाम इतने आदर से लिया जैसे किसी पुराने मंदिर का ताला खोल रहा हो। "तेरे दादा का नाम। साफ़। नीली स्याही में। और उसके नीचे — "
वो रुक गया।
"नीचे क्या?" मैंने कहा।
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