The Mysterious Bell618 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 618

7 min read November 5, 2026

दीवार गरम थी।

मैंने हाथ नहीं हटाया। जैसे कोई ठंडी रात में अंगीठी के पास हाथ रखता है और हटाना नहीं चाहता, वैसे ही मैंने हथेली वहीं टिकाई रखी। हथेली के नीचे पीला प्लास्टर था, ऊपर की परत जगह-जगह उखड़ी हुई थी, और उसी उखड़ी परत के नीचे से आँच आ रही थी — जैसे दीवार के अंदर कोई चूल्हा अभी-अभी बुझा हो और बुझने के बाद भी उसकी गरमी बाकी हो।

फिर गरमी धीरे-धीरे खिसक गई।

जैसे किसी ने अंदर से हाथ खींच लिया हो।

"अंकुश।"

मीरा की आवाज़ पीछे से आई। मैंने हाथ हटाया और पलटा।

वो अपना कैमरा सीने से लगाए खड़ी थी। कैमरा बंद था। उसकी आँखें मेरी आँखों पर टिकी थीं, और उसमें जो सवाल था, वो मैंने कभी उसके चेहरे पर इतना साफ़ नहीं देखा था।

"गरम थी," मैंने कहा।

"क्या?"

"दीवार। गरम थी। अभी भी थोड़ी है।"

मीरा ने अपनी हथेली बढ़ाई, दीवार को छुआ, और तुरंत हाथ हटा लिया — जैसे बिजली के तार को छू लिया हो।

"ये तो…" उसने धीरे से कहा, "ये तो ऐसे है जैसे अंदर कोई बैठा है।"

"अंदर कोई नहीं है," उस्ताद ने कहा। वो अपनी सिलाई की कुर्सी पर बैठे थे, दोनों हाथ लाठी की तरह सीधे, और उनकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो सिर्फ़ उनके पास होती है — जिसमें डर नहीं होता, पर सावधानी बहुत होती है। "अंदर कुछ और है।"

"क्या?"

"वो जो अभी तुम्हारे नाम पर बात कर रहा है।"

बंसीलाल अपनी चारपाई के पास ज़मीन पर बैठे थे। उनके हाथ अब भी काले थे — कालिख से, राख से, किसी और चीज़ से — और मैंने देखा कि उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर वो काँपने को छिपाने के लिए हाथ जाँघों पर रगड़ रहे थे। जैसे कोई छोटा बच्चा अपने हाथ गंदे होने पर रगड़ता है और उम्मीद करता है कि गंदगी अपने आप निकल जाएगी।

"बंसीलाल भाई," मैंने कहा। "आपने हाथ ऐसे कैसे किए?"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें वो आँखें नहीं थीं जो मुझे फाटक पर मिली थीं। वो आँखें चौकन्नी थीं, तेज़ थीं, गिनती करने वाली थीं। ये आँखें थकी थीं, और उनमें वो चीज़ थी जो आदमी के चेहरे पर तभी आती है जब उसे अपने ही हाथों पर शक होने लगे।

"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा।

"क्या याद है?"

"बस इतना — मैं चारपाई पर बैठा था। फिर बत्तियाँ बुझीं। फिर मैं उठा और मुझे लगा कि मुझे कुछ सुनना है। जैसे कोई मेरा नाम ले रहा है।"

"किसका नाम?"

"अपना ही," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई। "बंसीलाल प्रसाद। पूरा नाम। तीस साल से किसी ने मेरा पूरा नाम नहीं लिया। सब बंसीलाल कहते हैं। कभी किसी ने नहीं कहा — बंसीलाल प्रसाद।"

वो चुप हो गए।

"और फिर मुझे लगा कि मुझे कुछ लिखना है," उन्होंने कहा।

"क्या?"

"मुझे नहीं पता। हाथ में कालिख लगी थी। बस इतना पता है।"

टिंकू ने जेब से वो माचिस का डिब्बा निकाला जो बबलू ने दिया था — तीन बत्तियाँ, वो कह गया था, टॉर्च बुझने पर काम आएँगी। उसने एक बत्ती जलाकर बंसीलाल के चेहरे के सामने पकड़ी।

दीवार के नीचे, ज़मीन पर, हम सब एक घेरे में बैठ गए। टिंकू की बत्ती की लौ हवा में नाच रही थी, और उसी हिलती रोशनी में मैंने अपने आस-पास के चेहरे देखे।

मीरा। उस्ताद। बंसीलाल। टिंकू। और सीढ़ी के मुँह पर चार छोटी परछाइयाँ — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू।

कोई और नहीं था।

मैंने बत्ती उस्ताद की तरफ़ बढ़ाई। उन्होंने ले ली। और फिर उन्होंने वो किया जो उन्होंने पहले भी किया था — उन्होंने बत्ती की लौ को धीरे-धीरे दीवार के उस हिस्से के पास ले जाकर रखा, जहाँ ताज़ी कालिख थी।

लौ एक इंच भर ऊपर उठी। फिर एक इंच और।

"देखो," उस्ताद ने कहा। "यहाँ हवा कम है।"

"मतलब?"

"मतलब, ये लिखने वाला घूम-फिरकर यहीं खड़ा था। इसी जगह।"

मेरी रीढ़ के नीचे से एक ठंडी सुई सी ऊपर गई। मैंने पीछे देखा — अस्पताल का खुला आँगन था, कुछ पुरानी बेंचें, एक टूटा पंखा दीवार पर, जालीदार खिड़कियाँ जिनके पीछे मरीज़ों के परिवार सो रहे थे।

"इनमें से कोई?" मैंने धीरे से पूछा।

"ना," उस्ताद ने कहा। "इनमें से कोई नहीं।"

"तो कौन?"

"जो हमारे सामने था," उन्होंने कहा। "और हमने नहीं देखा।"

रात बीतने लगी।

और सच कहूँ तो वो रात मेरी ज़िंदगी की सबसे लंबी रात थी। मैंने उसमें कुछ नहीं किया। मैं सिर्फ़ जागता रहा। मीरा जागती रही। टिंकू दो बार सिर टेककर सोया और दो बार झटके से उठा। उस्ताद ने एक बार भी आँख नहीं बंद की — उन्होंने बस अपनी कुर्सी पर सीधे बैठे रहना चुना और दीवार को देखते रहे, जैसे कोई बूढ़ा दरवाज़े पर नज़र रखता है।

रात के दो बजे डॉक्टर इसरानी एक बार बाहर आए, एक चम्मच में कुछ पीला तरल लेकर, और बिना कुछ कहे मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

"क्या है?"

"पानी है। चीनी और नमक। जो आज रात नहीं सोया, वो सुबह बेवकूफ़ी करता है।"

मैंने पी लिया। उन्होंने मीरा को भी दिया। टिंकू ने अपनी माचिस का डिब्बा गर्व से दिखाया और डॉक्टर ने उसे सिर पर हल्की थपकी दी, जैसे गली का कोई बच्चा हो।

तीन बजे कोई पीछे के फाटक की तरफ़ गया। मैंने कदमों की आवाज़ पहचानी — भारी नहीं, सधी हुई। बबलू।

वो फाटक के बाहर उसी पत्थर पर बैठा था, जहाँ शाम को बैठा था, और वो हिला नहीं। सिर्फ़ एक बार मेरी तरफ़ देखा और फिर अपनी जेब टटोली — वो आदत जो इस रात उसे बार-बार लगी थी।

चार बजे मैं उठकर गया। मैंने आँगन में एक चक्कर लगाया। मैंने गली की तरफ़ देखा — मोड़ पर एक छोटी लौ जल रही थी। पीपल के नीचे कोई तपेरी जला रहा था। और उस पीली रोशनी में मुझे एक हाथ दिखा, जो रिंच पकड़े था, और एक कंधा, जो झुका था।

पापा।

मैंने आवाज़ नहीं दी। मैं वापस लौट आया।

और सुबह आई।

सुबह हमेशा एक बात करती है — वो चुपचाप आती है, जैसे किसी ने आपकी कमीज़ के बटन बिना बोले बंद कर दिए हों। पहले आसमान का रंग बदला। फिर पीपल के पत्तों पर चिड़ियाँ बैठीं। फिर पीली दीवार पर वो सफ़ेद रोशनी फैली, जिसमें हर दाग़ और हर दरार साफ़ दिखती है।

और फिर — एक चीख़।

छोटी। दबी हुई। औरत की।

वो पहली मंज़िल की जालीदार खिड़की के पीछे से आई थी।

मैं दौड़ा। आँगन में पहले से पाँच-छह लोग जमा थे। एक बूढ़ी औरत हाथ में पुरानी पर्ची लिए दीवार की तरफ़ उँगली उठाए खड़ी थी — वही औरत जो तीन महीने से अपनी बहू का इलाज यहाँ करा रही थी, जिसका बेटा रात भर गलियारे की बेंच पर सिर नीचे करके बैठा रहता था।

"देखो," वो कह रही थी, "देखो ये क्या लिखा है। किसने लिखा?"

"क्या हुआ?" मैंने पूछा।

वो मेरी तरफ़ पलटी। उसकी आँखों में डर था, पर उससे बड़ा था गुस्सा।

"तुमने देखा नहीं? इस दीवार पर — "

"मैंने देखा है," मैंने कहा। "रात भर यहीं था।"

"तो तुमने किसी को रोका क्यों नहीं?"

"क्योंकि कोई था ही नहीं," मैंने कहा। और जब मैंने ये कहा, तो अपनी ही आवाज़ मुझे झूठी लगी।

क्योंकि कोई था। मुझे पता था। मीरा को पता था। उस्ताद को पता था।

बस हमने नहीं देखा।

वो औरत दीवार के सामने से हटी और सीधी सीढ़ी की तरफ़ बढ़ गई।

"मैं अपनी बहू को यहाँ से हटाऊँगी," उसने कहा। "आज ही।"

और जैसे उसने एक कील ठोक दी हो, दूसरा परिवार भी हिल गया। कंधे पर बच्चा सोने वाला आदमी उठा — वो वही आदमी था जिसके कंधे पर कल रात एक छोटा बच्चा सो रहा था — और उसने अपनी बोरी उठाई और बिना किसी से कुछ कहे सीढ़ियों की तरफ़ चल पड़ा।

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