The Mysterious Bell – Chapter 612
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि आवाज़ इमरान की नहीं थी।
आवाज़ किसी और की थी।
किसी ऐसे की जो उस कमरे के अंदर है और जो जानता है कि हम क्या खोज रहे हैं।
फिर घंटी बोली। और इस बार उसकी आवाज़ में वो धीमापन नहीं था जो पिछली आवाज़ों में था। इस बार आवाज़ साफ़ थी और कड़ी।
"आज रात। अभी। पीली फाइल कल तक नहीं रुकेगी।"
मैंने घंटी को जेब से निकाला और मेज़ पर रख दिया। उसकी पीतल की चमक अब भी वैसी ही थी, पर मुझे लगा कि वो मेरी नहीं — किसी और की है।
"टिंकू," मैंने कहा।
"हाँ उस्ताद?"
"माचिस का डिब्बा निकाल।"
उसने जेब से निकाला। बबलू का दिया हुआ वो माचिस का डिब्बा, जिसमें तीन बत्तियाँ थीं।
"इसमें बत्तियाँ हैं," उसने कहा।
"आज रात काम आएँगी," मैंने कहा। "और तेरी टॉर्च भी।"
"और चाक?"
"चाक भी।"
मैंने सबकी तरफ़ देखा। माँ, पापा, उस्ताद, शबनम आपा, हबीब चाचा, टिंकू, शबनम आपा के पीछे बैठी रज़िया आपा, और मीरा।
"आज रात," मैंने कहा, "हम अस्पताल जाएँगे। पर जाने से पहले एक बात तय कर लो — कौन अंदर जाएगा और कौन बाहर रहेगा।"
"मैं अंदर जाऊँगा," टिंकू ने तुरंत कहा।
"तू नहीं जाएगा," मैंने कहा।
"उस्ताद —!"
"तू बाहर रहेगा," मैंने कहा, "क्योंकि तेरे पास वो चीज़ है जो शायद हममें से किसी के पास नहीं — तेरी उम्र। अगर अंदर कुछ गड़बड़ हुई, तो तू इतनी तेज़ी से भाग सकता है जितनी तेज़ी से मैं नहीं भाग सकता। और तू सबको बता सकता है। तेरे पास वो आवाज़ है जिसे कोई बंद नहीं कर सकता।"
उसने मुँह बनाया। फिर मान गया।
"पर मैं पीछे नहीं रहूँगा," उसने कहा। "मैं सीढ़ी के मुँह पर रहूँगा।"
"ठीक है," मैंने कहा।
उस्ताद ने अपनी मशीन की तरफ़ देखा। फिर कहा —
"मैं साथ चलूँगा।"
"उस्ताद —"
"मैं साठ साल पहले इस घंटी को चला चुका हूँ," उन्होंने कहा। "और मैं जानता हूँ कि इसे अंधेरे में कैसे पकड़ना है। तू अकेले पकड़ेगा, तो उँगली जल जाएगी।"
मैं कुछ नहीं बोला। क्योंकि जब कोई बुज़ुर्ग अपनी उम्र की फिक्र छोड़कर साथ चलने की बात कहे, तो उसे मना करना उसका अपमान करना होता है।
"ठीक है," मैंने कहा।
पापा आगे आए। पहली बार उस रात उन्होंने मुँह खोला।
"मैं और सलीम बक्श पीछे वाले फाटक पर रहेंगे," उन्होंने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"पर पापा —"
"जो आदमी एक बार झुक जाए," उन्होंने कहा, "उसके लिए दोबारा खड़ा होना सबसे मुश्किल होता है। मुझे खड़े होने का मौका दे।"
मैंने उनकी आँखों में देखा। और उस वक़्त मुझे वो पापा दिखे जो तीस साल पहले थे — जब वो साइकिल की दुकान चलाते थे, जब उनकी कमर झुकी नहीं थी।
"ठीक है," मैंने कहा।
मीरा उठी। उसने अपना बैग उठाया और कंधे पर टाँगा।
"मैं अंदर चलूँगी," उसने कहा। "क्योंकि अगर ये फाइल मिली और कोई कैमरा नहीं रहा, तो वो फाइल घर नहीं आएगी। ये मेरा काम है।"
"और तेरी जान?"
"मेरी जान," उसने कहा, "पहले से ही किसी और के हिसाब में लिखी है। मैंने पाँच साल पहले रमा मैडम की खबर छापकर अपनी आत्मा बेच दी थी। अब वो वापस कमानी है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो सीधी खड़ी थी।
"ठीक है," मैंने कहा।
फिर मैंने उन बच्चों की तरफ़ देखा। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू।
"तुम लोग —"
"हम?" सानिया ने कहा, जैसे उसे बुरा लगा हो। "हम पीछे रहेंगे। पर हम रास्ता देखेंगे। आज शाम हमने देखा है — कौन सा रास्ता खाली है और कौन सा भरा है।"
"कौन सा है?"
"टंकी के पीछे वाला रास्ता खाली है," उसने कहा। "और पीछे वाले फाटक पर दो लकड़ी के जूते वाले आदमी खड़े हैं। हमने देखा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। ये बच्ची… ये तेरह साल की बच्ची मुझसे ज़्यादा देख रही थी।
"सानिया," मैंने कहा, "तू मेरी आँखें है।"
उसने सिर हिलाया। और उसकी आँखों में वो चमक आई जो बड़े होने पर किसी इंसान में कम ही आती है — वो चमक जो कहती है कि मुझ पर भरोसा किया गया है।
मैं उठा। कमरे में सब उठे।
मैंने देखा — माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। उन्होंने सब सुना था। उनकी आँखें में कुछ था जो पहले कभी नहीं था — डर नहीं, बल्कि वो डर जो समझ में बदल गया हो।
"अंकुश," उन्होंने कहा।
"हाँ माँ।"
वो मेरे पास आईं। बैसाखी के सहारे, धीरे-धीरे। फिर मेरे सामने रुकीं और अपनी ऊँगली उठाकर मेरे माथे पर रखी — जैसे कोई पुराना टीका लगा रही हों।
"जो गली की छत के नीचे खड़ा हो," उन्होंने कहा, "उसे किसी की परछाईं से नहीं डरना चाहिए।"
"हाँ माँ," मैंने कहा।
उन्होंने अपनी हथेली मेरे सिर पर रखी। एक पल। और उस एक पल में मुझे लगा कि मैंने जो सब पिछले कुछ महीनों में किया — वो सब सही किया।
फिर वो पलटीं और पापा के पास चली गईं। धीरे से उनका हाथ पकड़ा। और पापा ने — पहली बार — उनका हाथ थामकर रखा।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी और दादा का काग़ज़, दोनों वहीं थे।
और जब मैं बाहर निकला, तो गली में हवा ठंडी हो चुकी थी। दूर कहीं अस्पताल की पीली दीवार पर एक लालटेन जल रही थी। कोई चल रहा था — धीमे कदमों से — पिछली दीवार की तरफ़।
मेरा फोन फिर बजा।
इस बार स्क्रीन पर कोई नंबर नहीं था। बस एक लाइन चल रही थी — "कॉल चल रही है।"
मैंने सुना।
दूसरी तरफ़ से तीन खटखटें फिर आईं। फिर एक आवाज़ — वही धीमी, वही बिना जल्दबाज़ी के।
"तेरे दादा का नाम अभी भी उस काग़ज़ पर है। सोच ले — उसे बचाना है या उसके साथ जलना है।"
लाइन कट गई।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"चल," मैंने कहा। "हमारे पास एक रात है और उसमें से आधी तो पहले ही बीत चुकी है।"
और हम चले — अस्पताल की पिछली दीवार की तरफ़।
जहाँ से रास्ता संकरा था, और जहाँ से शायद कोई वापस नहीं आता।
पर मैं आ जाऊँगा।
ये मैंने अपने आप से नहीं कहा।
ये मैंने अपने दादा से कहा — जिनका अंगूठा मेरी जेब में था।
॥
रात ग्यारह बजे मैं अस्पताल के पिछले फाटक पर पहुँचा तो देखा कि सब मुझसे पहले आ चुके थे।
ये बात मेरे लिए नई थी। आम तौर पर मैं वो आदमी हूँ जो सबसे पहले पहुँचकर दूसरों का इंतज़ार करता है, चाय बनाता है, और फिर शिकायत करता है कि लोग वक़्त पर नहीं आते। पर आज पूरी गली मुझसे पहले आ गई थी। यानी डर सबको एक ही वक़्त पर जगा देता है।
फाटक के पास पीली रोशनी में उस्ताद अली बक्श खड़े थे। उनके हाथ में अपनी सिलाई की दुकान की वही पुरानी लकड़ी की कुर्सी थी जिस पर वो रोज़ बैठते हैं। मैंने देखा और मुझे हँसी आ गई।
"उस्ताद," मैंने कहा, "कुर्सी भी लाए हो?"
"हाँ," उन्होंने कहा, बिल्कुल गंभीर। "जिस चीज़ पर आदमी रोज़ बैठता है, फ़ैसला वही साफ़ करती है। मेरी कुर्सी ने पचास साल में एक भी झूठ नहीं बोला।"
मीरा ने अपना कैमरा कंधे पर टाँगा और पापा की टूटी घड़ी कलाई पर बाँधी। घड़ी रुकी हुई थी, पर वो उसे बाँध रही थी, जैसे वक़्त सही चलने की ज़िद कर रही हो।
"घड़ी तो रुकी है," टिंकू ने कहा।
"पता है," मीरा ने कहा। "इसीलिए बाँधी है। जो घड़ी रुकी हुई है, वो कम से कम झूठ नहीं बोलती कि कितना वक़्त बचा है।"
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