The Mysterious Bell – Chapter 611
हबीब चाचा का सिर उठा।
"इमरान?" उन्होंने कहा। आवाज़ कर्कश थी, जैसे बहुत देर से इस्तेमाल न हुई हो।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"हाँ चाचा। इमरान ने साइट पर काम करते हुए नक़्शा उतारा था। उसने काला कमरा देखा था। वही अब गायब है।"
"तो —"
"तो," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कड़कपन आ गया जो रिपोर्टिंग में आता है, "तो सबसे पहले इमरान को निकालना होगा। और साथ ही पन्ना पकड़ना होगा। दोनों अलग नहीं हैं। एक बिना दूसरे के मतलब नहीं रखता।"
"कल रात तक पीली फाइल बाहर जानी है," मैंने कहा। "यानी आज रात।"
"आज रात," मीरा ने दोहराया। "और इमरान कल की सुबह तक शायद ज़िंदा बचे न बचे।"
कमरा फिर चुप हो गया। बल्ब ने एक बार झपककर खुद को सँभाला और मेज़ पर पड़ी केतली से भाप उठती रही।
फिर हबीब चाचा उठे।
धीरे। बैसाखी के सहारे नहीं, अपने काँपते हुए घुटनों के सहारे। उनकी आँखें अब भी सूखी थीं, पर वो सूखापन अब बोल रहा था।
"मैं जाऊँगा," उन्होंने कहा।
"कहाँ चाचा?"
"भारद्वाज भवन। अकेले।"
मैं खड़ा हो गया।
"चाचा —"
"सुनो," उन्होंने मेरी बात काटी। "तुम बच्चे हो। तुमने ज़िंदगी में जितने साल देखे हैं, मैंने उतने साल इमरान को बड़ा होते देखे हैं। मैं उसे नहीं खो सकता। अगर साहब को मेरी जान चाहिए, तो ले ले। पर बेटा वापस आए।"
उनकी आवाज़ टूटी। पर वो रुके नहीं।
"मैं उसके दफ़्तर जाऊँगा। हाथ जोड़ूँगा। कहूँगा — मेरा बेटा छोड़ दे। मैं तेरे सामने खड़ा हूँ। जो करना है कर।"
शबनम आपा ने कहा, "हबीब भाई —"
"नहीं," उन्होंने कहा। "तुम मत रोको। मैंने तीस साल इस गली में अपने बेटे की आवाज़ सुनी है। और आज —" उनका गला रुंधा — "आज तीन महीने से मैं उसकी आवाज़ सुन नहीं पाया। तुम नहीं समझोगे। जिस आदमी ने अपने बेटे की आवाज़ सुनी हो और फिर वो आवाज़ चली जाए, उस आदमी के लिए हर सुबह एक सज़ा है।"
मैं उनके पास गया। कमरे के उस कोने में जहाँ वो खड़े थे। मैंने उनका हाथ नहीं छोड़ा। पर मेरा हाथ उनके कंधे पर रखा और मैंने धीरे से दबाया — इतना धीरे कि वो बैठ जाएँ, चोट न लगे।
"चाचा," मैंने कहा, "बैठिए।"
"मैं नहीं बैठूँगा।"
"बैठिए," मैंने दोहराया, और इस बार आवाज़ में कुछ और था। "क्योंकि जो बात मैं कहने जा रहा हूँ, वो खड़े होकर नहीं कही जाती।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगे। मैंने उन्हें कुर्सी पर बैठाया। वो बैठ गए — इसलिए नहीं कि वो मान गए, इसलिए कि उनके घुटने अब और नहीं टिक रहे थे।
मैं उनके सामने बैठ गया। घुटनों के बल, ज़मीन पर। मेरी जीन्स के घुटने पर ग्रीस का पुराना दाग था, और उस वक़्त मुझे लगा कि वो दाग कोई ऐसा निशान है जो मुझे ज़मीन से जोड़े रखता है।
"चाचा," मैंने कहा, "अकेले जाने का रास्ता इस गली से बंद हो चुका है।"
"क्या मतलब?"
"मतलब ये कि जिस दिन से ये घंटी मेरी जेब में आई है, उस दिन से इस गली में कोई अकेले नहीं जाता। एक-एक आदमी जो अकेले गया, वो दब गया। जो साथ गया, वो लौटा। और मैं चाचा — मैं तुम्हें खोकर इमरान को नहीं लाऊँगा। मैं दोनों को लाऊँगा।"
उनकी आँखों में पानी आ गया। वो अब भी काँप रहे थे।
"पर मेरा बेटा —"
"तुम्हारा बेटा अब सिर्फ़ तुम्हारा नहीं है, चाचा। वो हम सबका है। जब वो साइट पर सीमेंट ढोता था, तो वो अपनी माँ के लिए ढो रहा था। पर जब वो नक़्शा उतार रहा था — तब वो इस गली के लिए उतार रहा था। और अब जब वो गायब है, तो वो सिर्फ़ तुम्हारा बेटा नहीं, हमारा भाई है।"
कमरे में कोई नहीं बोला।
तभी दरवाज़े पर खटखट हुई।
नहीं — खटखट नहीं। धमाका। जैसे कोई बच्चा अपनी पूरी ताक़त से दरवाज़े पर गिरा हो।
मैं पलटा।
दरवाज़ा खुला और उसमें से पाँच चेहरे एक साथ अंदर झाँक रहे थे — टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू।
"उस्ताद!" चिंटू ने कहा, और वो इतनी तेज़ी से बोला कि उसके शब्द आपस में टकरा गए। "उस्ताद ज़रूरी बात है!"
"अरे," मैंने कहा, "साँस ले।"
"नहीं लूँगा! पहले सुनो!"
"क्या?"
चिंटू ने एक कदम आगे बढ़ाया और अपने पैर फैलाकर खड़ा हो गया — एक बड़ा-सा पेट निकाला, गाल फुलाए, और चलने लगा जैसे कोई जान-बूझकर धीरे-धीरे, बड़ी-बड़ी डग भर रहा हो। फिर उसने कहा — "बेटा, तूने साहब की बात नहीं मानी —" और अपनी कलाई घुमाकर पान चबाने की नक़ल की।
कमरे में हँसी फूट पड़ी।
शबनम आपा की हँसी सबसे पहले आई। वो ऐसी हँसीं कि उनका पूरा शरीर हिलने लगा। हबीब चाचा के चेहरे पर भी एक पल के लिए कुछ ढीला हुआ। माँ ने अपनी बैसाखी की तरफ़ देखकर मुँह छिपाया, पर उनके कंधे हिल रहे थे।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"बबलू," सानिया ने कहा। उसकी आवाज़ में गंभीरता वापस आ गई थी। "मैंने उसे मंदिर के पीछे देखा। वो वहाँ बैठा था।"
"क्या कर रहा था?"
सानिया ने चारों तरफ़ देखा, जैसे ये बात बड़ों को बताने से पहले सोचना हो।
"रो रहा था," उसने कहा।
चिंटू की नक़ल की हँसी एकदम रुक गई। जैसे किसी ने बल्ब बुझा दिया हो।
"रो रहा था?" मैंने कहा।
"रो रहा था," सानिया ने कहा। "और वो अपनी जेब टटोल रहा था। जैसे कुछ खो गया हो।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और बिना कुछ बोले हम दोनों एक ही चीज़ सोच रहे थे।
बबलू — जो हमेशा सबको डराता था — वो खुद डरा हुआ है।
और जब डरा हुआ आदमी अकेले रोता है, तो समझ लो कि डर उसके अंदर से बड़ा हो चुका है।
तभी मेरी जेब से एक आवाज़ आई। बहुत धीमी।
"जिसके हाथ खाली हों, वही सबसे ज़्यादा खतरनाक होता है।"
मैंने घंटी के काग़ज़ पर हाथ रखा। उसे थाम लिया।
फिर हबीब चाचा की तरफ़ देखा। उनकी आँखें भर आई थीं — अब सूखी नहीं थीं। वो अब बह रही थीं।
"चाचा," मैंने कहा। और ये दो शब्द इतने धीरे निकले कि शायद मैंने कभी किसी को इतने धीरे से नहीं बुलाया था।
मैंने उनका हाथ थाम लिया। उनकी हथेली ठंडी थी। मैंने अपनी दोनों हथेलियों के बीच थामा और रगड़ा।
"मैं तुमसे वादा नहीं करता," मैंने कहा। "क्योंकि वादा करके तोड़ना मुझे नहीं आता। पर मैं इतना कहता हूँ — जिस दिन इमरान वापस आएगा, उस दिन वो खुद तुम्हारे आँगन के हैंडपंप से पानी पिएगा। और जो हत्था उसने तोड़ा था, वो वो खुद जोड़ेगा। ये मेरा वादा है।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगे। एक लंबी नज़र। फिर उन्होंने सिर हिलाया। एक छोटा-सा हिलाना। पर वो काफ़ी था।
तभी कमरे में सन्नाटा आ गया। मेरा मोबाइल बज उठा।
पहले तो मैंने सोचा कि मीरा का कोई मैसेज होगा। फिर देखा — नंबर।
इमरान का नंबर।
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। क्योंकि मीरा ने सुबह ही कहा था कि इमरान का नंबर अब किसी के नाम पर नहीं है। ऐसे नंबर से कॉल आ ही नहीं सकती।
मैंने अंगूठा स्क्रीन पर नहीं रखा। मैंने कमरे में सबकी तरफ़ देखा। टिंकू ने भी अपनी साँस रोक ली थी।
मैंने कॉल उठाई।
"हेलो?"
दूसरी तरफ़ से कोई आवाज़ नहीं आई।
फिर — तीन आवाज़ें।
खट। खट। खट।
धीमी, बराबर, जैसे किसी ने दीवार पर तीन उँगलियाँ टिकटिकाई हों।
और उसके बाद एक आवाज़ आई। इतनी धीमी कि मुझे शब्द नहीं, छाया सुनाई दी।
"काला कमरा।"
लाइन कट गई।
मैंने फोन को देखा। स्क्रीन अब खाली थी। मीरा की तरफ़ देखा — वो पहले से अपनी कलम से कुछ लिख रही थी। टिंकू ने धीरे से कहा, "उस्ताद, वो इमरान भैया की आवाज़ थी?"
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