The Mysterious Bell – Chapter 610
"तुम यहाँ रहो। अगर कोई और आए — कोई भी आए — तुम कुछ मत बोलना। तुम बस चुप रहना।"
"और अगर वो फिर चाबी माँगें?"
"तो कहना — चाबी अंकुश के पास है।"
"और अगर वो तुम्हें पकड़ लें?"
मैं मुस्कुराया।
"तो मुझे पकड़े हुए थोड़ा वक़्त लगेगा," मैंने कहा।
वो मेरी बात नहीं समझा।
वो समझता भी कैसे? वो नहीं जानता था कि मेरी जेब में एक घंटी है जो मेरी सबसे बड़ी ताक़त भी है और मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी।
मैंने अपने दादा के काग़ज़ को जेब में ऊपर सरकाया — जहाँ घंटी थी, उसके ठीक बगल में।
और मेरे अंदर एक अजीब सी बात हुई।
मुझे लगा कि मेरी कमीज़ की जेब का वज़न कुछ बढ़ गया है।
मुझे लगा कि मैं आज कुछ ढो रहा हूँ।
पर ये ढोना अब पहले जैसा नहीं था।
ये ढोना अब अकेले का नहीं था।
क्योंकि अब मेरे साथ मेरे दादा का अंगूठा भी था।
और जब आदमी के साथ उसके बुज़ुर्गों का अंगूठा चलने लगे, तो उसके कदम जितने भी धीमे हों, किसी गली के मुँह तक पहुँच ही जाते हैं।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"चल," मैंने कहा।
"कहाँ?"
"पहले पीछे वाले बरामदे वाला कोना। फिर तय करेंगे कि आज रात कौन सा दरवाज़ा पहले खोलना है।"
टिंकू ने सिर हिलाया।
और जब हम पलटे, तब मेरे कान में घंटी ने, बहुत ही धीमे से, वो कहा जो मैंने अब तक नहीं सुना था।
"तेरे दादा का अंगूठा तेरी जेब में है। और तेरे दादा की आवाज़ कोई और सुन रहा है।"
मैंने पूछा, "कौन?"
घंटी ने कहा, "आज रात पता चलेगा।"
और वो चुप हो गई।
मैं एक और कदम चला।
अस्पताल की पिछली दीवार की तरफ़।
जहाँ से रास्ता संकरा था, और जहाँ से शायद कोई वापस नहीं आता।
पर मैं आ जाऊँगा — ये मैंने अपने आप से कहा।
क्योंकि अब मेरे पास दादा का अंगूठा था, घंटी थी, टिंकू था, मीरा थी, और सबसे बढ़कर — वो कोना था, जहाँ से पिछली दीवार दिखती थी पर कोई नहीं देखता।
और आज रात मुझे उस कोने से वो फाइल निकालनी थी।
चाहे वो किसी की भी पीली फाइल हो।
॥
अस्पताल की पिछली दीवार के साथ जो संकरा रास्ता था, वो सच में संकरा था — इतना कि मुझे कंधे तिरछे करके चलना पड़ा। दीवार से सटी सीमेंट की पुरानी परत, ऊपर टपकता पानी, और नीचे ज़मीन पर सूखी नाली में पड़े टूटे ईंट के टुकड़े — जैसे किसी ने जान-बूझकर यहाँ कुछ छिपाया हो और फिर भूल गया हो।
टिंकू मेरे पीछे-पीछे आ रहा था, हाथ में छोटी टॉर्च। उसकी रोशनी दीवार पर पड़ रही थी और दीवार हर कदम पर और ऊँची होती जा रही थी।
"उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "यहाँ तो कुछ नहीं है।"
"है," मैंने कहा। "बस हमें दिख नहीं रहा।"
तभी मेरे कान में घंटी बोली। बहुत धीमे से, जैसे किसी ने पास आकर फुसफुसाया हो।
"अब नहीं।"
मैं रुका।
"क्या मतलब अब नहीं?"
"शाम को। जब सब हों। तू अकेला नहीं खोलेगा ये दरवाज़ा।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो अपनी टॉर्च से मेरा चेहरा देख रहा था।
"क्या हुआ?" उसने पूछा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "अभी पलटते हैं।"
"पर —"
"टिंकू," मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा, "घंटी कह रही है। और जब घंटी बोलती है, तो मैं सुनता हूँ। तूने भी से सीखना चाहिए — जल्दबाज़ी में लिए गए फ़ैसले बाद में चुकाए जाते हैं।"
हम पलटे और वापस उसी संकरी गली से बाहर आए। पीछे मुड़कर देखा तो दीवार का वो कोना अंधेरे में डूबा हुआ था, जैसे कोई बंद आँख वाला आदमी चुपचाप हमें देख रहा हो।
शाम को मैंने दुकान के पीछे वाला कमरा खोला। ट्रंक से गंदे कपड़े हटाए, पुरानी चारपाई पर एक साफ़ चादर बिछाई और बल्ब जला दिया। वो बल्ब आज भी वैसे ही गुनगुना रहा था जैसे बरसों से रहता आया है — कभी पूरी तरह जलता नहीं, कभी बुझता नहीं। बस इतनी रोशनी देता है कि आदमी अपनी उँगलियाँ देख सके और ये भूल जाए कि बाहर अंधेरा कितना गहरा है।
सब आ गए।
उस्ताद अली बक्श सबसे पहले — अपनी सिलाई की दुकान की कुर्सी खींचकर लाए थे, क्योंकि उनका कहना है कि जिस चीज़ पर आदमी रोज़ बैठता है, वही चीज़ उसके फ़ैसले भी साफ़ करती है। शबनम आपा आईं — हाथ में थाली में सिली हुई मिट्टी की केतली की चाय और दो प्लेट समोसे। कह गईं कि आज चाय का पैसा नहीं लेंगी, क्योंकि आज चाय की नहीं, सच की ज़रूरत है।
हबीब चाचा कमरे के कोने में चुपचाप बैठ गए। उनकी आँखें सूखी थीं, पर वो सूखापन जिसमें आदमी रोज़ मरता है और किसी को पता नहीं चलता। उनके हाथ में इमरान का वो पुराना रूमाल था जो उन्होंने आज सुबह गाँठ बाँधकर दिया था। रूमाल जैसे किसी दुआ का सहारा पकड़े बैठा था।
माँ आईं — बैसाखी के सहारे, आँगन तक। दरवाज़े पर रुकीं, मुझे देखा, और बिना कुछ बोले अंदर आ गईं। उनका आना ही काफ़ी था। कुछ माँएँ ऐसे ही आती हैं — बिना बोले, बिना पूछे, और आदमी को लगता है कि दुनिया में एक जगह ऐसी भी है जहाँ उसे साबित नहीं करना पड़ता कि वो ठीक है।
पापा आए। चुपचाप आए, दरवाज़े के पास खड़े रहे। उन्होंने कोई कुर्सी नहीं माँगी। मैंने उनकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा। पिछले कुछ हफ़्तों में मैंने उनसे जितनी बातें की थीं, उतनी शायद पूरी ज़िंदगी में नहीं की थीं। और अब भी हम दोनों के बीच वो चुप्पी थी जिसे तोड़ने के लिए शब्द नहीं, हिम्मत चाहिए थी।
मीरा आई — कार स्टेशन से लेकर। पहले बाहर आवाज़ आई कि कार कहाँ खड़ी करूँ, फिर अंदर आई। हाथ में एक पुरानी लिफ़ाफ़े की फाइल, कंधे पर फटा बैग, और आँखों में वो चमक जो मुझे अब पहचानने लगी थी। वो चमक कहती थी — मैंने कुछ पकड़ा है।
"मिल गई?" मैंने पूछा।
"मिल गई," उसने कहा। "पर पहले तुम बताओ — उस्ताद क्या देख रहे हैं?"
उस्ताद मेज़ पर झुके हुए थे। ट्रंक से निकाला वो पीला पुराना काग़ज़ — जो बंसीलाल की माचिस की डिब्बी से आया था — उन्होंने रोशनी में उठाकर पकड़ा था। और उनके हाथ काँप रहे थे।
"उस्ताद," मैंने धीरे से कहा। "क्या है?"
उन्होंने काग़ज़ को मेज़ पर रखा और अपना मोटा चश्मा उतारकर पोंछा। फिर कहा —
"ये काग़ज़ टुकड़ा है। आधा कटा हुआ। पर इसमें जो लिखा है, वो बत्तीस साल पुरानी एक बात कह रहा है।"
"कौन सी बात?"
उस्ताद ने कुर्सी खींचकर बैठकर कहा।
"जिस ज़मीन पर ये अस्पताल खड़ा है, वो ज़मीन किसी एक की नहीं थी। वो गली के लोगों ने मिलकर दी थी। बत्तीस साल पहले। एक दान-पत्र लिखा गया था — जगदीश यादव की मौजूदगी में।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा उतरा।
"दादा?" मैंने कहा।
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "तेरे दादा। और उस दान-पत्र में शर्त लिखी थी — ये ज़मीन कभी बेची नहीं जाएगी। न बेची जाएगी, न गिरवी रखी जाएगी। इलाज के लिए दी है, तो इलाज के लिए ही रहेगी। बस।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"पर —" शबनम आपा ने कहा, "पर साहब के काग़ज़ों में ये ज़मीन बिक रही है।"
"इसीलिए," उस्ताद ने कहा, "पीली फाइल में वो असली दान-पत्र नहीं है। उसमें उसकी नक़ल है, या फिर उसका वो हिस्सा है जिसमें शर्त नहीं छपी। और असली पन्ना — जिस पर सात अंगूठे हैं — वो अभी कहीं छिपा है। साहब उसी को निकाल रहा है।"
मीरा ने अपनी कलम निकाली और हाथ में पकड़ी रही। उसने कुछ नहीं लिखा, बस काग़ज़ पकड़े रही।
"तो मतलब," उसने कहा, "अगर असली पन्ना साबित हो जाए, तो पूरा सौदा टूट जाता है।"
"पन्ना चाहिए," उस्ताद ने कहा। "और पन्ने को उस जगह से निकालना है जहाँ साहब उसे रखता है। और वो जगह कहाँ है, ये इमरान जानता है।"
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