The Mysterious Bell – Chapter 609
"हाँ," घंटी ने कहा। "और जो असली काग़ज़ है, वो इस टुकड़े को अपने पास बुला रहा है। टुकड़ा कहाँ जाएगा?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
मेरे अंदर कुछ हिला। मुझे समझ आया — अगर ये टुकड़ा असली दान-पत्र का हिस्सा है, तो कैसे इस टुकड़े पर सिर्फ़ दादा का नाम और शर्त है? बाक़ी नाम कहाँ गए?
और फिर बंसीलाल ने वो कहा जो मेरी सोच का जवाब था — वो शब्द जो उसने दबी आवाज़ में बोले, पर जो अस्पताल के पूरे बरामदे में गूँज गए।
"असली पन्ना साहब की पीली फाइल में है। और वो फाइल कल रात तक अस्पताल से बाहर जाने वाली है।"
मैंने अपना हाथ रोक लिया।
"तुम्हें कैसे पता?"
"सुबह," वो बोला, "मैं चारपाई पर बैठा था। सामने अस्पताल की नई पट्टी लगी थी। तभी एक टेम्पो आया। उसमें से मनोज उतरा, वो जो काग़ज़ लाया था और फिर गायब हो गया। उसने कहा कि साहब का हुक्म है — पीला फाइल बाक़ी काग़ज़ों से अलग निकालेगा, उसकी नकल नहीं बनेगी, उसकी फोटो नहीं बनेगी, और उसे कल रात बारह बजे से पहले अस्पताल से बाहर पहुँचाना है।"
"कल रात," मैंने दोहराया। "कल रात यानी आज रात।"
"हाँ," उसने कहा। "आज रात।"
मेरे अंदर कुछ चटका।
मीरा ने अपनी कलाई पर बँधी पापा की घड़ी देखी। वो घड़ी नहीं थी — वो मीरा के पापा की घड़ी थी, जो टूटी हुई थी, पर आज सुबह मीरा ने कहा था कि उसने उसे ठीक कराया है और अब सही वक़्त दिखाती है। उसने देखा और उसका चेहरा कस गया।
"अभी चार बजकर सैंतालीस मिनट हुए हैं," उसने कहा।
मैंने मीरा को देखा।
"आज रात तक मतलब सात-आठ घंटे," मैंने कहा। "और वो फाइल किसके पास है? कहाँ है?"
बंसीलाल ने अपना सिर हिलाया।
"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "पर एक बात जानता हूँ। मनोज जब आया था, वो अस्पताल के मुख्य दफ़्तर में गया था — टंकी के नीचे वाला कमरा, जहाँ डॉक्टर इसरानी बैठते हैं। वहाँ एक हरी अलमारी है, जिसके ऊपर पुराने काग़ज़ों के बंडल रखे हैं। और वो फाइल आज सुबह वहाँ नहीं थी।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तो कहाँ है?"
बंसीलाल ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गया, फिर अपने दोनों हाथ जोड़ लिए।
"एक बात है," उसने कहा। "पर उसके लिए तुम्हें मेरी एक बात माननी पड़ेगी।"
"कहो।"
"अगर तुम उस फाइल को लाने निकलो — तो तुम मेरे पास से जाओगे। अस्पताल की पिछली दीवार के साथ। वो रास्ता संकरा है, पर उस पर कोई नहीं आता जाता। मैं तीस साल से वहाँ से किसी को नहीं जाने दिया। आज तुम जाओगे।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो आज रात आएगा," उसने धीरे से कहा, "वो आगे के दरवाज़े से आएगा। और अगर तुम आगे से गए, तो वो तुम्हें देख लेगा।"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
"बंसीलाल जी," मैंने कहा, "तुमने ये सब इतने साल छिपाया। अब तुम खुलकर क्यों बोल रहे हो?"
वो हँसा — एक छोटी सी, टूटी हुई हँसी।
"क्योंकि तुमने वो किया जो मैं पंद्रह साल से नहीं कर पाया। तुमने चाबी देने से मना किया, जबकि तुम्हारे पास उनके जैसे दो आदमी आए थे। और मैं जानता हूँ कि तुमने क्यों किया — क्योंकि तुम्हारे पास कोई डरने का कारण नहीं था, और मेरे पास था। बेटी की शादी, नौकरी, बूढ़ी बीवी की दवा। पर तुमने देखा कि फर्क क्या है?"
"क्या?"
"तुम्हारे पास भी दवा का कारण था," उसने कहा। "तुम्हारी माँ. और तुमने फिर भी मना किया।"
मैं कुछ नहीं बोला।
क्योंकि अब मेरे पास कहने को कुछ नहीं था।
टिंकू ने मेरे हाथ को फिर पकड़ा। इस बार उसने धीरे से पकड़ा।
"उस्ताद," उसने कहा, "हम फाइल लाएँगे ना?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"हम सब लाएँगे," मैंने कहा। "यही तो हमारा काम है।"
मैंने अपनी जेब को टटोला। घंटी, माचिस, चॉक, टॉर्च, दादा का काग़ज़। और अब एक और चीज़ — बंसीलाल की उस पुरानी माचिस की डिब्बी, जिसे मैंने अपनी जेब में रख लिया था, क्योंकि ये डिब्बी अब वैसी नहीं थी। अब ये डिब्बी एक पुरानी जगह थी, जहाँ से निकला काग़ज़ अब मेरी जेब में था — और डिब्बी उस काग़ज़ की गवाह थी, किसी और नहीं।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"तुम्हारे पास रज़ा सलीम का नंबर है?"
"हाँ।"
"कल दस बजे वो रजिस्टर ला रहा है। पर आज रात बारह बजे कुछ और होगा। और हमें उससे पहले फाइल निकालनी है।"
मीरा ने सिर हिलाया।
"तो अब क्या?" उसने पूछा।
मैंने एक पल सोचा। फिर मैंने बंसीलाल की तरफ़ देखा।
"तुम्हारे पास कोई जगह है जहाँ हम बैठ सकें? ऐसी जगह जहाँ से पिछली दीवार का रास्ता दिखे, पर दिखे भी नहीं?"
बंसीलाल ने सोचा।
"पीछे वाला बरामदा," उसने कहा। "वहाँ से दिखता है। और वहाँ से कोई नहीं देखता क्योंकि वहाँ दवा की खिड़की है, सब वहीं ताकते हैं। पर उसके पीछे एक कोना है — जहाँ सीढ़ी के नीचे पुराने डिब्बे रखे हैं। वहाँ से पूरी दीवार दिखती है।"
"तो चलो," मैंने कहा।
हम पलटे।
तभी बंसीलाल ने मेरा हाथ फिर पकड़ा।
"बेटा," उसने कहा, "एक बात और। आज मैंने तुम्हें जो काग़ज़ दिया… वो पूरा नहीं है। पर जो असली पन्ना है — उस पर सिर्फ़ तुम्हारे दादा का नाम नहीं है। सात नाम हैं। और सातों में से एक आज भी ज़िंदा है।"
मैं रुक गया।
"कौन?"
"यही तो मैं नहीं जानता," उसने कहा। "मैं पढ़ नहीं पाया। पर मनोज ने उस दिन टेम्पो में बैठे-बैठे अपने आदमी से एक नाम लिया था। उसने सिर्फ़ एक नाम लिया। और मैंने सुना — हकीम।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"हकीम," मैंने धीरे से दोहराया।
"हाँ," बंसीलाल ने कहा। "पर वो हकीम कौन है, ये मुझे नहीं पता।"
मैंने घंटी को हथेली पर पकड़ा।
"घंटी," मैंने धीरे से कहा, "सुन रही है?"
"हाँ," घंटी ने कहा। "हकीम अली का नाम। पर हकीम अली तो मर चुका। तो ये दूसरा हकीम है। और जो दूसरा हकीम है, वो उसी काग़ज़ पर है — उसी नाम के साथ जो तुझे अभी तक नहीं मिला।"
मैंने गहरी साँस ली।
"तो चल," मैंने कहा। "पहले फाइल, फिर हकीम।"
और मैं पलटा।
पर जब मैं पलटा, तब मेरी नज़र अस्पताल की पिछली दीवार पर पड़ी। और मैंने वहाँ कुछ देखा — जो अभी तक मैंने नहीं देखा था।
दीवार पर एक नया बोर्ड लगा था। पीला, बड़ा। और उस पर साफ़ शब्दों में लिखा था — "भारद्वाज कंस्ट्रक्शन। अस्पताल के काम का आख़िरी दिन। तारीख़ — कल।"
मेरा दिल धक्क से रह गया।
"बंसीलाल," मैंने कहा, "ये बोर्ड कब लगा?"
वो मेरी नज़र से देखने लगा। फिर उसका चेहरा फिर सफ़ेद पड़ गया।
"आज सुबह," उसने कहा। "मैंने इसे पहले नहीं देखा। पर ये अभी लगा है।"
और मैंने देखा — बोर्ड के नीचे, ज़मीन पर, अभी भी ताज़ा सीमेंट के छींटे थे।
किसी ने इसे अभी लगाया था। हमारे नीचे होने के दौरान।
मेरी जेब में घंटी ने कहा —
"अब सवाल ये नहीं कि कल क्या होगा। सवाल ये है कि आज रात से पहले तुझे क्या करना है।"
मैंने घंटी को जेब में रखा।
"मीरा," मैंने कहा। "तुम्हारी कार स्टेशन पर है ना?"
"नहीं," उसने कहा। "मैं पैदल आई हूँ।"
"तो अभी जाओ और ले आओ।"
"क्यों?"
"क्योंकि आज रात हमें कुछ साथ ले जाना पड़ेगा। और मुझे नहीं लगता कि वो कुछ गली की साइकिल पर आएगा।"
मीरा ने कुछ सोचा। फिर उसने सिर हिलाया।
"मैं आधे घंटे में लौटूँगी," उसने कहा।
"इससे पहले आ जाओ," मैंने कहा।
वो गई।
मैंने बंसीलाल की तरफ़ देखा।
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