The Mysterious Bell – Chapter 606
मैंने घंटी को जेब से निकाला। वो ठंडी थी, पर अब वो काँप नहीं रही थी। वो स्थिर थी। जैसे किसी ने उसे देख लिया हो और वो इंतज़ार कर रही हो कि मैं क्या करता हूँ।
"अंकुश," मीरा ने कहा। "मैं डर गई हूँ।"
उसकी आवाज़ सामान्य थी, और यही सबसे डरावना था। मीरा जब डरती थी, तो उसकी आवाज़ तेज़ हो जाती थी, कड़वी हो जाती थी। अब वो धीमी थी, और उसमें एक ईमानदारी थी जो मुझे चुभ गई।
"मैं भी," मैंने कहा। "पर डर का इलाज सिर्फ़ एक है — सामने जाना।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो अब भी मेरा हाथ पकड़े हुए था, पर उसकी पकड़ ढीली हो गई थी। उसके होंठ हिल रहे थे, जैसे वो कुछ गिन रहा हो।
"टिंकू," मैंने कहा। "तू क्या कर रहा है?"
"गिन रहा हूँ," उसने कहा।
"क्या?"
"सीढ़ियाँ," उसने कहा। "अट्ठाईस थीं। हमने उतरते वक़्त गिनी थीं। मैं सोच रहा हूँ कि अगर वो दो आदमी ऊपर आए हैं, तो वो भी अट्ठाईस ही उतरेंगे। और अगर वो अट्ठाईस उतरे, तो मुझे पता चल जाएगा कि वो कहाँ हैं।"
मैंने उसे देखा।
"तू," मैंने कहा, "कभी-कभी मुझे हैरान कर देता है।"
"माँ भी यही कहती है," उसने कहा। "पर वो इसलिए कहती है जब मैं स्कूल नहीं जाता।"
मैं फिर हँसा। थोड़ा सा। पर हँसी इस कमरे में अच्छी नहीं लगी। ये कमरा हँसी के लिए नहीं बना था।
"मीरा," मैंने कहा। "कैमरा फिर से निकाल।"
उसने कुछ कहना चाहा, पर मैंने हाथ उठा दिया।
"पर इस बार," मैंने कहा, "जब हम ऊपर जाएँ, तो तू सिर्फ़ तब रिकॉर्ड करना जब मैं कहूँ। और जब मैं न कहूँ, तो बंद कर देना।"
"क्यों?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "अगर वो दो आदमी ऊपर हैं, तो वो सबसे पहले यही देखेंगे कि कोई रिकॉर्ड कर रहा है। और अगर उन्हें लगेगा कि हम उनसे डरकर सब छिपा रहे हैं, तो वो ढीले पड़ जाएँगे।"
उसने सिर हिलाया।
"तू," उसने कहा, "अब कहानी की तरह सोचने लगा है।"
"नहीं," मैंने कहा। "मैं बस अब ऐसे सोचने लगा हूँ जैसे साहब सोचता है। और ये सबसे डरावना हिस्सा है।"
मैंने सीढ़ियों की तरफ़ देखा।
अंत में मैंने अपनी जेब को टटोला। घंटी, माचिस, चॉक, टॉर्च। सब कुछ था।
"चल," मैंने कहा। "पर एक बात।"
"क्या?" मीरा ने पूछा।
"अगर ऊपर जाकर हमें कुछ ऐसा दिखे जो हमारे नाम पर लिखा हो," मैंने कहा, "तो कोई भी उसे छूने से पहले मुझे बताएगा। सबने समझा?"
टिंकू ने सिर हिलाया।
मीरा ने सिर हिलाया और अपना कैमरा बैग में रख लिया।
मैंने अपना पहला कदम सीढ़ी पर रखा।
पत्थर ठंडा था। बहुत ठंडा, जैसे उस पर कभी धूप न आई हो। मैंने दूसरा कदम रखा, फिर तीसरा। मेरे पीछे टिंकू और मीरा आ रहे थे — उनके कदमों की आवाज़ मेरे कदमों से थोड़ी देर बाद आती थी, जैसे वो मेरे कदमों को सुनकर अपना कदम रख रहे हों, कि कहीं मैं गिर तो नहीं गया।
आधी सीढ़ियों पर पहुँचकर मैंने रुककर ऊपर देखा।
दरवाज़े से पीली रोशनी की एक पतली लकीर आ रही थी। रोशनी, जो पहले नहीं थी। जब हम नीचे आए थे, तब ऊपर वाला दरवाज़ा बंद था, और उसके नीचे से कुछ नहीं आ रहा था।
अब वो खुला था।
"उस्ताद," टिंकू ने धीरे से कहा। "दरवाज़ा खुला है।"
"दिख रहा है," मैंने कहा।
"हमने उसे बंद नहीं किया था," मीरा ने कहा। "जब हम नीचे आए, तब वो अपने आप बंद हो गया था।"
"पता है," मैंने कहा। "इसलिए तो बबलू ने कहा था — जो सुनोगे वो सच नहीं लगेगा।"
मैंने एक और कदम रखा।
तभी ऊपर से आवाज़ आई। पर ये बबलू की आवाज़ नहीं थी। ये कोई और था। कोई, जो मेरे नाम से बोल रहा था।
"अंकुश यादव," आवाज़ ने कहा। "जगदीश यादव का पोता। ठीक है। आ जाओ। तुम्हारा ही इंतज़ार था।"
मेरे पैर वहीं रुक गए।
टिंकू ने मेरी कलाई पकड़ ली।
मीरा ने कोई आवाज़ नहीं की, पर मैंने सुना कि उसने साँस रोक ली।
और मेरी जेब में घंटी ने, बिना बजे, बहुत धीरे से कहा —
"जो नाम उसने लिया, वो तेरा है। पर जो बुला रहा है, वो जानता है कि तू आएगा। इसलिए वो तेरा नाम जानता है और तेरे दादा का भी। अब सोच — उसे ये सब किसने बताया?"
मैंने आँखें बंद कीं।
"किसी ने नहीं," मैंने धीरे से कहा। "उसने देखा है। यानी वो उस काग़ज़ पर है, जिस पर मेरा नाम लिखा है।"
"हाँ," घंटी ने कहा। "और अब वो तुझे उसी काग़ज़ के बहाने अंदर बुला रहा है।"
मैंने साँस ली।
"तो चल," मैंने कहा। "जब काग़ज़ ही बुला रहा है, तो काग़ज़ से मिल ही लें।"
मैंने आख़िरी सीढ़ी पर कदम रखा, और ऊपर की तरफ़ बढ़ने लगा।
मेरे पीछे टिंकू ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया। और मेरे पीछे मीरा के कदमों की आवाज़ आई — धीमी, पर रुकी हुई नहीं।
मुझे नहीं पता था कि ऊपर क्या है। मुझे सिर्फ़ इतना पता था कि जो भी है, वो मेरे नाम पर लिखा हुआ है — और मुझे उसे पढ़ना है, चाहे वो मुझे कितना भी काटे।
क्योंकि मेरे दादा ने एक बार कहा था — जो चीज़ तेरे नाम पर लिखी हो, उसे तूने खुद लिखा हो या न लिखा हो, तेरे ही नाम पर लौटकर आती है।
और आज वो मेरे नाम पर लौटकर आई थी।
॥
आख़िरी सीढ़ी पर पैर रखते ही मुझे लगा कि हवा बदल गई। नीचे तहखाने की हवा में जो सीलन थी, जो दबी हुई सड़ांध थी, वो ऊपर आते ही छूमंतर हो गई। ऊपर सीढ़ी के मुँह पर सिर्फ़ मिट्टी की गंध थी, धूप में तपी हुई मिट्टी की, और उसमें थोड़ी-थोड़ी सी उबटन लगी हुई चाय की महक। पीछे कहीं कोई चाय बना रहा था, जैसे दुनिया अपने हिसाब से चल रही हो, जैसे नीचे जो कुछ हुआ, वो हुआ ही न हो।
पर जैसे ही मेरा पैर सीढ़ी के आख़िरी पत्थर पर पड़ा, मेरी आँखों ने वो देखा जो मैं नहीं देखना चाहता था।
अस्पताल का पिछला बरामदा। वो लंबा, टूटी बेंचों वाला, धूल भरा बरामदा जहाँ से पिछली दीवार दिखती है। और वहाँ — ठीक बंसीलाल की चारपाई के पास — दो आदमी खड़े थे।
सफ़ेद कुर्ता। सफ़ेद धोती। कंधे पर मोटा सफ़ेद गमछा। दोनों एक जैसे, जैसे किसी दुकान से एक ही थान के कपड़े से कटे हों।
और उनके बीच में, चारपाई के कोने पर, बंसीलाल बैठा था। उसकी गमछा उतर चुका था, कंधों पर पड़ा था, और उसके दोनों हाथ उसकी गोद में थे — कसकर भींचे हुए, जैसे वो अपनी ही उँगलियों को पकड़कर बैठा हो, कि कहीं कोई उँगली उठाकर कुछ कह न दे।
उसका चेहरा सफ़ेद था। बिल्कुल सफ़ेद, जैसे चूने की दीवार को पत्थर से रगड़ दिया गया हो।
एक सफ़ेद कुर्ते वाला झुका हुआ था, बंसीलाल के ठीक सामने, और उसकी उँगली उसके सीने की तरफ़ थी। उसकी आवाज़ मीठी थी। इतनी मीठी कि मेरी जीभ पर कड़वाहट आ गई।
"बंसीलाल जी," वो कह रहा था, "हम तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं। तुम तीस साल से यहाँ हो। तीस साल। सोचो, तुमसे ज़्यादा इस अस्पताल को कौन जानता है? हम सिर्फ़ एक चाबी माँग रहे हैं। एक छोटी सी चाबी। जो तुम्हारी है भी नहीं — जो तुम्हें मिली थी, सिर्फ़ रखने को।"
दूसरा, जो सीधा खड़ा था, बोला नहीं। वो सिर्फ़ हाथ पीछे बाँधे खड़ा था और बंसीलाल को ऐसे देख रहा था जैसे कोई तराज़ू वाला बोरी को देखता है — कि इस बोरी में कितना दाना निकलेगा।
बंसीलाल ने कुछ कहने की कोशिश की। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। सिर्फ़ एक खुरखुरी, सूखी साँस निकली, जैसे पुराने पंप में पानी सूखने पर आवाज़ आती है।
उसकी नज़र उठी। मेरे ऊपर पड़ी।
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