The Mysterious Bell – Chapter 607
और उसकी आँखों में जो था, वो मैंने पहली बार देखा। बंसीलाल — तीस साल का चौकीदार, जो दिन में दो बार मुझे बताता था कि इस गली का पानी इतना ठंडा है कि बरसात में भी प्यास नहीं बुझती — उसकी आँखों में इतना डर था कि मुझे लगा कि किसी ने उसके अंदर के बंसीलाल को कुएँ में धकेल दिया है।
"ये लो," सफ़ेद कुर्ते वाले ने फिर कहा, "मैं तुम्हें ये कहता हूँ। चाबी दे दो, और हम भूल जाओ कि हम कभी आए थे। घर जाओ, चाय पियो, बेटी की शादी की तैयारी करो। अगले महीने है ना? मुझे पता है। मैं हर चीज़ जानता हूँ, बंसीलाल। यही तो मेरा काम है।"
बंसीलाल ने कुछ नहीं कहा।
तभी मैंने आगे कदम बढ़ाया।
"चाबी तो मेरे पास है।"
मेरी आवाज़ मुझे भी अजीब लगी। इतनी साफ़, इतनी ठंडी। जैसे कोई और बोल रहा हो, और मैं सिर्फ़ सुन रहा हूँ।
दोनों सफ़ेद कुर्ते वाले घूमे। उनकी गर्दन एक साथ घूमी, इतने तालमेल से कि लगा कोई रिहर्सल करके आया है।
मैंने टिंकू का हाथ अपनी कलाई से धीरे से छुड़ाया और आगे बढ़ा। मीरा मेरे पीछे थी, और मैं सुन सकता था कि उसने अपना बैग खोला — वो खोल जिसकी चेन चार बार टूट चुकी है — और कैमरा निकाला।
"अरे," मैंने कहा, जैसे कोई पुराना दोस्त मिल गया हो, "तुम लोग इतनी दूर से आए हो, चाय तक नहीं पी। ये क्या बात हुई?"
एक सफ़ेद कुर्ते वाले ने मुझे देखा। उसकी आँखों में कुछ नहीं था — गुस्सा नहीं, हैरानी नहीं, सिर्फ़ एक पतली सी लकीर, जैसे उसने मेरी शक्ल देखकर अपने दिमाग़ में कोई पन्ना पलटा हो और फिर बंद कर दिया हो।
"तुम अंकुश यादव हो," उसने कहा। और ये सवाल नहीं था। ये बयान था। जैसे कोई काग़ज़ पढ़कर बता रहा हो।
"हाँ," मैंने कहा। "और तुम्हारे काग़ज़ पर मेरा नाम लिखा है, ये मुझे पता है। बस एक बात साफ़ कर लो — मेरा नाम तुमने लिखा है या किसी और ने लिखवाया है?"
उसने मेरी बात सुनी, फिर बंसीलाल की तरफ़ मुड़ा, जैसे मैं बोला ही न हो।
"बंसीलाल जी, आख़िरी बार।"
"नहीं," मैंने कहा। "आख़िरी बार मैं कहूँगा।"
और मैं उनके बीच में खड़ा हो गया। सीधा। मेरी पीठ बंसीलाल की तरफ़ थी और मेरा सीना उन दोनों की तरफ़।
अब मैं आस-पास नहीं देख रहा था। मैं आगे देख रहा था।
मैंने अपना हाथ जेब में डाला और वो घंटी, जो अब भी मेरी जेब में ठंडी पड़ी थी, उँगलियों में पकड़ी। मैंने उसे बजाया नहीं। मैंने सिर्फ़ उसे पकड़ा — पीतल की वो गोलाई, वो जानी-पहचानी परत, वो तीन छोटे गड्ढे जो मेरे अँगूठे की आदत बन चुके हैं।
"देखो," मैंने कहा, "तुम्हारी बात सुन ली। अब मेरी सुनो। ये चाबी, जो तुम्हें चाहिए — ये तुम्हें नहीं मिलेगी। इसलिए नहीं कि हम तुमसे लड़ेंगे। इसलिए कि अब यहाँ का हिसाब अकेला कोई नहीं रखेगा।"
"हिसाब?" दूसरे सफ़ेद कुर्ते वाले ने पहली बार बोला। उसकी आवाज़ पहले वाले से भारी थी, जैसे किसी पुराने दरवाज़े की चरचराहट में शब्द डाल दिए गए हों।
"हाँ, हिसाब," मैंने कहा। "तीस साल का हिसाब, पाँच साल का हिसाब, बत्तीस साल का हिसाब। और ये सब — मेरे अकेले का नहीं है। जिस गली में तुम आए हो, वहाँ का है।"
तभी मेरे पीछे मीरा की आवाज़ आई।
"कैमरा ऑन है।"
मैंने पलटकर देखा। मीरा दोनों हाथों से अपना छोटा कैमरा उठाए खड़ी थी, और कैमरे की लाल बत्ती जल रही थी — वो छोटी, गोल, चुभती हुई लाल बत्ती।
"देखिए," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कड़क थी जो उस वक़्त आती है जब वो सच में गुस्से में होती है, "ये नूर अस्पताल का पिछला बरामदा है। ये सार्वजनिक जगह है। यहाँ आने-जाने की, साँस लेने की, इलाज कराने की जगह है। और यहाँ जो पूछताछ होगी — वो सबके सामने होगी। मैं बंद कमरे में बात नहीं करती। मैं यही कैमरा लेकर खड़ी हूँ, और जो कुछ भी आज इस बरामदे में बोला जाएगा, वो मेरे चैनल पर जाएगा — बिना काटा, बिना छिपाया।"
दोनों सफ़ेद कुर्ते वाले कैमरे की तरफ़ देखने लगे।
ये वो पल था जब मुझे याद आया कि अगर तुम दिखावे से डरते हो, तो तुम्हारे पास देखने को कुछ नहीं है। पर अगर तुम्हारे पास दिखाने की शक्ति है, तो तुम्हारी सबसे बड़ी ताक़त एक कैमरा है।
पहला सफ़ेद कुर्ता वाला हिला नहीं। दूसरा ज़रूर हिला — एक छोटी सी हरकत, गर्दन के नीचे, जैसे कोई चीज़ उसकी शर्ट के कॉलर में धंस गई हो।
"ये क्या बकवास है?" पहले वाले ने कहा।
"ये बकवास नहीं है," मीरा ने कहा। "ये सवाल है। तुम्हें क्या चाहिए, यहाँ से क्यों खड़े हो, किसके कहने पर खड़े हो, और ये चाबी तुम्हें क्यों चाहिए — सब कैमरे में बोलो।"
दोनों आदमियों ने एक-दूसरे को देखा।
और मैंने देखा — वो देखा जो कुछ भी देखता है। उनके बीच एक आँख का इशारा चला। दो सेकंड से भी कम का। पहले वाले ने आँख से कुछ कहा, दूसरे ने होंठ से नहीं, पलक से कुछ जवाब दिया।
फिर पहला वाला एक कदम आगे आया और उसने वो कहा जो हर वो आदमी कहता है जो जानता भी है कि यहाँ मुझे हार मिली है, पर हार माननी नहीं है।
"साहब का नाम बेकार मत लेना।"
उसने ये धीरे से कहा। सिर्फ़ मेरे लिए। मेरे कान के पास, इतना पास आकर कि मैं उसकी साँस में मिट्टी और तेल जैसी कोई गंध सूँघ सकूँ।
"वो नाम तुम्हें पहले तुम्हारे काम नहीं आया," मैंने भी धीरे से कहा, सिर्फ़ उसके लिए, "और आज भी नहीं आएगा।"
"हम देखेंगे," उसने कहा।
और फिर वो हट गया। दूसरे वाले ने भी कदम पीछे रखे। उन्होंने बंसीलाल की तरफ़ आख़िरी बार देखा — कोई धमकी नहीं, कोई लालच नहीं, सिर्फ़ एक पल के लिए उसके चेहरे को देखा, जैसे किसी तस्वीर को दिमाग़ में बंद कर रहे हों — और फिर वो गली के मुँह की तरफ़ बढ़ गए।
उनके जाने की आवाज़ नहीं आई। सफ़ेद धोती के कोने हवा में थोड़े हिले, वो इतनी सहजता से चले जैसे वो कभी आए ही न हों, रास्ते में किसी दरवाज़े को हाथ नहीं लगाया, किसी चीज़ को छुआ नहीं, कोई निशान नहीं छोड़ा।
जब वो गली के मोड़ पर मुड़े और गायब हुए, तब मैंने अपनी साँस को बाहर जाने दिया।
और तभी मेरे पीछे से एक आवाज़ आई।
बंसीलाल रो रहा था।
बिना आवाज़ के रो रहा था। उसका शरीर काँप रहा था, पर उसके मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी — जैसे उसने सालों पहले सीख लिया हो कि रोना भी एक चुप्पी है।
उसने अपना हाथ बढ़ाया और मेरी कलाई पकड़ ली।
उसकी पकड़ मज़बूत थी। काम करने वाले आदमी की पकड़ — जिसने तीस साल तक बाल्टियाँ उठाई हों, सीढ़ियाँ चढ़ी हों, बोरियाँ खींची हों।
"बेटा," उसने कहा। उसकी आवाज़ रूखी थी, फटी हुई। "बेटा, मैंने आज तक किसी से कुछ नहीं छिपाया। नौकरी में, घर में, कहीं। मैं चौकीदार हूँ, मेरा काम पहरा देना है। पर आज…"
"आज कुछ नहीं हुआ," मैंने कहा। "तुमने कुछ नहीं छिपाया। तुम गलत नहीं हो।"
"मैं गलत नहीं हूँ," उसने दोहराया, जैसे ये बात उसे मेरे मुँह से सुननी थी। "मैं गलत नहीं हूँ।"
वो उठा। धीरे, पर उठा। उसने अपना गमछा उठाया और मुँह पोंछा। फिर वो घूमा और मेरे सामने सीधा खड़ा हो गया।
"मेरे पास एक चीज़ है," उसने कहा।
"क्या?"
"आज सुबह जब तुम नीचे गए थे, मैं ऊपर बैठा था। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने सोचा — बंसीलाल, पंद्रह साल से तूने ये बात नहीं बताई, आज मत बता। पर जब वो दोनों आए, तब भी मैंने नहीं बताया। तब मैं सिर्फ़ डरा हुआ था। और अभी…"
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