The Mysterious Bell605 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 605

7 min read November 5, 2026

"क्या?"

"एक बक्सा," मैंने कहा।

उसने मेरी तरफ़ देखा।

"तुमने देखा?"

"नहीं," मैंने कहा। "पर जगह बोल रही है। ये धूल आकार में चौकोर है। कोई चीज़ इस पर बैठी थी, बहुत दिन तक। और अब वो नहीं है।"

मैंने घुटने के बल बैठकर उस जगह को उँगली से छुआ। धूल मेरे उँगली पर चिपक गई। सूखी, बहुत सूखी, जैसे बरसों से किसी ने उसे हवा से बचाकर रखा हो।

"अंकुश," मीरा ने कहा। "वो बात जो बबलू ने कही थी। बक्सा यहाँ नहीं।"

मैंने सिर हिलाया।

"हाँ," मैंने कहा। "पर मुझे ये समझना है कि वो यहाँ नहीं है, कि वो यहाँ था। दोनों में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है।"

मैं उठा। मैंने दीवार वाली छिपी अलमारी की तरफ़ देखा, जिसका ताला अब टूटा खुला था। फिर उस बड़ी काली लोहे की आलमारी की तरफ़, जिससे तीन खटखटें आई थीं।

वो अब भी खड़ी थी। चुप। जैसे जानती हो कि उसकी बारी भी आएगी, पर अभी नहीं।

मैं कुछ कहने ही वाला था कि ऊपर से आवाज़ आई।

लकड़ी के जूतों की आवाज़।

टक। टक। टक।

तेज़, हाँफती हुई।

तीनों ने एक साथ ऊपर देखा। सीढ़ियों की तरफ़।

फिर बबलू दरवाज़े पर आकर रुक गया।

वो अंदर नहीं आया। दरवाज़े के चौखट पर ही खड़ा रह गया। उसका एक कदम अंदर था, पर तीन बाहर। उसकी साँस फूली हुई थी, और उसका चेहरा — पसीने से भीगा हुआ, और उस पसीने में काली धूल की लकीरें थीं।

"बबलू भाई?" मैंने कहा। "तू तो ऊपर गया था।"

"गया था," उसने कहा। फिर बात को काटकर, जैसे उसे ज़्यादा नहीं कहना था, "बंसीलाल ऊपर नहीं है।"

"क्या?"

"वहाँ," उसने हाँफते हुए कहा, "उसकी चारपाई पर दो आदमी खड़े थे। लकड़ी के जूते। और बंसीलाल की चारपाई खाली थी।"

टिंकू का हाथ मेरी कलाई पर और कस गया।

मीरा ने फौरन अपनी जेब से कलम निकाली। पर उसने लिखा नहीं।

बबलू ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में अब वो पुरानी चालाकी नहीं थी, बस एक आदमी की थकान थी।

"अंकुश," उसने कहा। "मैंने तुझसे कहा था — बक्सा अब अस्पताल में नहीं है।"

"तो कहाँ है?"

वो चुप रहा। उसकी नज़र एक बार कमरे के कोने की तरफ़ गई, जहाँ अंधेरा सबसे ज़्यादा काला था, फिर वापस मेरे चेहरे पर आई।

"जहाँ सबसे ज़्यादा शोर होता है," उसने कहा, "वहाँ सबसे गहरा सन्नाटा रखा जाता है। ये साहब की आदत है। वो चीज़ें उस जगह रखता है जहाँ कोई ढूँढने की ज़हमत नहीं करता।"

"इसका मतलब?"

"इसका मतलब," उसने कहा, "कि वो बक्सा यहाँ नहीं है। यहाँ सिर्फ़ उसकी जगह है। और उस जगह को देखकर ही साहब को पता चल गया है कि कोई उसे ढूँढ रहा है।"

मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ। वो ठंडक जो गुस्से से पहले आती है।

"तू ये सब मुझे क्यों बता रहा है, बबलू?" मैंने पूछा। "कल तक तू साहब का हाथ था।"

वो हँसा। छोटी, सूखी हँसी।

"क्योंकि," उसने कहा, "आज सुबह साहब ने मेरे घर का पता भी लिया है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तेरे घर का?"

"मेरे घर का," उसने कहा। "और ये कोई नई बात नहीं है उसके लिए। ये उसकी आदत है। जो लोग साहब के रास्ते में आते हैं, उनके घर के बाहर एक गाड़ी खड़ी हो जाती है। कोई उतरता नहीं। कोई बात नहीं करता। बस खड़ी रहती है। और फिर एक दिन आदमी को अपने ही घर में लगने लगता है कि वो कोई और है।"

टिंकू ने मेरा हाथ और मज़बूती से पकड़ लिया। मैंने उसे देखा। उसका चेहरा पीला पड़ गया था, और उसकी आँखें बड़ी हो गई थीं। उसने कुछ कहना चाहा, पर मुँह खुला रह गया, आवाज़ नहीं निकली।

मीरा ने कैमरा जेब में रख दिया।

"मैं ये रिकॉर्ड नहीं करूँगी," उसने कहा। "ये बात जो तू अभी कह रहा है, ये कैमरे के लिए नहीं है। ये गली के बाहर की बात है।"

बबलू ने उसकी तरफ़ देखा।

"तू समझ गई," उसने कहा।

"मैं पत्रकार हूँ," मीरा ने कहा। "मुझे समझने में देर नहीं लगती। पर मैं ये भी जानती हूँ कि जो बात कोई डरकर कहता है, उसकी आवाज़ कभी पूरी नहीं होती।"

बबलू ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपनी जेब से रूमाल निकाला — सफ़ेद रूमाल, जिस पर गुलाबी दाग अब सूख चुके थे — और अपना माथा पोंछा।

"बंसीलाल ऊपर अकेला है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब भारी थी। "वो दो आदमी उससे चाबी के बारे में पूछने आए हैं। कौन सी चाबी, मुझे नहीं पता। पर बंसीलाल कुछ नहीं बोल रहा। वो उनके सामने अपना मुँह नहीं खोल रहा।"

"और तू?" मैंने पूछा। "तू उनसे कैसे बचकर आया?"

"मैं नहीं बचा," उसने कहा। "उन्होंने मुझे देखा और छोड़ दिया। जान-बूझकर।"

"क्यों?"

"ताकि मैं तुम्हें बता दूँ," बबलू ने कहा। "यही उनका तरीक़ा है। वो किसी को मारते नहीं। वो उससे खबर बनवाते हैं।"

मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई। बहुत ठंडी, जैसे बर्फ़ का टुकड़ा।

और फिर उसकी आवाज़ आई — वो आवाज़ जो अब मुझे पहचानती थी, जो मेरी जेब के कपड़े से भी आर-पार आ जाती थी।

"डर अब बाहर नहीं है," घंटी ने कहा।

मैंने उसे जेब में दबाया, पर वो बोलती रही।

"डर सीढ़ी पर खड़ा है," उसने कहा। "और वो तेरे ही कदम गिन रहा है।"

मेरी रीढ़ से एक ठंडी सुई ऊपर उठी। मैंने एक बार सीढ़ियों की तरफ़ देखा — कुछ नहीं दिखा, पर मुझे लगा कि अंधेरे में कोई खड़ा है, बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई सीढ़ी की दसवीं पत्थर पर पैर रखकर साँस रोके हो।

"बबलू," मैंने कहा। "तू ऊपर जा और बंसीलाल को बोल कि वो उन दोनों को कुछ न बताए। और तू खुद उनके सामने कुछ न कहना।"

"और अगर वो मुझसे पूछें कि मैं नीचे क्या कर रहा था?"

"तो कह देना," मैंने कहा, "कि तू मुझसे डरकर भाग रहा था।"

बबलू ने एक पल मुझे देखा। फिर उसके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो बहुत दिनों के बाद आया था — लगभग एक मुस्कुराहट।

"ये सच भी है," उसने कहा।

"हाँ," मैंने कहा। "इसीलिए तो कह रहा हूँ। सच जो हो, वो ही बोलना सबसे आसान है।"

वो हँसा। फिर उसने एक कदम पीछे किया — दरवाज़े से बाहर की तरफ़ — और जैसे ही उसका पैर सीढ़ी की पहली पत्थर पर पड़ा, उसका चेहरा फिर बदल गया।

"अंकुश," उसने कहा, और अब उसकी आवाज़ में वो पुरानी चालाकी नहीं थी, बल्कि कुछ और था — जैसे कोई आदमी अपनी आख़िरी बात कह रहा हो।

"क्या?"

"मैंने तुझसे कहा था," उसने कहा, "कि जब ऊपर जाओगे, तो जो सुनोगे वो सच नहीं लगेगा, और जो देखोगे वो तुम्हारे नाम पर लिखा होगा।"

"हाँ," मैंने कहा। "तूने कहा था।"

"अब जब ऊपर जाओ," उसने कहा, "तो ये भी याद रखना — जो सुनोगे, वो तुमसे कहेगा कि वो तुम्हारा है। और जो देखोगे, वो तुमसे कहेगा कि वो तुम्हारा हो चुका है। दोनों झूठ बोलेंगे। पर एक बात सच होगी।"

"कौन सी?"

"ये," उसने कहा। "कि जो तुम्हारे नाम पर लिखा है, वो तुम्हारा नहीं है। वो उसका है जिसने तुम्हारा नाम लिखवाया था। और वो अब भी तुम्हारे नाम का इस्तेमाल कर रहा है, क्योंकि वो जानता है कि तुम्हारा नाम गली में सबसे ज़्यादा बोला जाता है।"

वो सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

"बबलू!" मैंने पुकारा।

वो रुका, पर पलटा नहीं।

"तू अभी भी मुझे बचाने वाला ढूँढ रहा है?" मैंने पूछा।

"नहीं," उसने कहा। "अब मैं खुद को बचाने का रास्ता ढूँढ रहा हूँ। और शायद वो रास्ता तुझसे ही होकर जाता है।"

वो चला गया।

टक, टक, टक — और फिर आवाज़ धीमी पड़ गई। फिर बंद।

कमरे में सिर्फ़ हम तीन बचे थे। और वो खिंचती आवाज़, जो अब बंद हो गई थी। जैसे कमरे को अंदाज़ा हो गया हो कि अब हम उसकी बात सुनने को तैयार हैं, और उसने अपनी चुप्पी को और गहरा कर लिया।

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