The Mysterious Bell602 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 602

6 min read November 5, 2026

"और तुम सो गए?" मैंने पूछा।

"मैं रोज़ सोता हूँ," उसने कहा। "पर मेरी नींद नींद नहीं होती। वो डर होता है जो आँख बंद करके भी जागता है।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।

"उस्ताद," उसने धीरे से कहा। "फिर तो… हमें बक्सा वापस रखना पड़ेगा। अगर बबलू भाई कह रहे हैं कि भूल जाओ, तो मतलब कुछ तो है उसमें।"

"हाँ," मैंने कहा। "कुछ है। और वो कुछ हमारे हाथ में है, इसीलिए बबलू भाई इतने डरे हुए हैं।"

मैं बबलू की तरफ़ मुड़ा।

"बबलू भाई," मैंने कहा। "मैं तुमसे एक बात कहूँ?"

उसने सिर उठाया।

"मैं बक्सा नहीं भूलूँगा," मैंने कहा।

उसका चेहरा बदला।

"मैं नहीं भूलूँगा," मैंने दोहराया, "क्योंकि जो बक्सा तुमने देखा है और भूल गए, वो अब भी उसी राख में पड़ा है। और जो काग़ज़ उसमें है, उस पर मेरे दादा की लिखाई है। तुम्हें पता है, मेरे दादा की लिखाई में 'ग' नीचे से टूटता था? मैंने वो आज देखा। और मेरा हाथ काँपा।"

बबलू ने मुझे देखा।

"तू अपने पापा की बात सुनकर काँपा है," उसने कहा।

"हाँ," मैंने कहा। "वो भी।"

"तो फिर," बबलू ने कहा, "तू उस काग़ज़ को वापस क्यों नहीं रख देता? ताकि तेरे पापा को कोई दिक्कत न हो।"

मैंने एक गहरी साँस ली।

"बबलू भाई," मैंने कहा। "तुमने कभी सोचा है कि मेरे पापा ने पाँच साल में एक बार भी मुझे क्यों नहीं बताया कि मेरा नाम उस काग़ज़ पर है?"

उसने कुछ नहीं कहा।

"क्योंकि वो मुझे बचाना चाहते थे," मैंने कहा। "पर उन्होंने जो किया, वो बचाना नहीं था। वो बस छुपाना था। और छुपाने से कुछ ठीक नहीं होता। मैं अब वो काग़ज़ उठाने आया हूँ — ताकि मैं उसे खुद देख सकूँ, और उसके बाद जो करना है, खुद सोच सकूँ।"

बबलू ने अपना सिर हिलाया।

"पर तू समझता नहीं," उसने कहा। "वो काग़ज़ सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है।"

"तो क्या है?"

"वो," बबलू ने कहा, और उसकी आवाज़ लड़खड़ाई, "वो मेरा नाम भी है।"

मैं चौंका।

"तेरा नाम?"

"मेरा नाम उस काग़ज़ पर है," बबलू ने कहा। "बीस साल पहले मैं उस दुकान का काग़ज़ उठाने गया था। मुझे पता नहीं था कि क्या लिखा है। सिर्फ़ इतना पता था कि साहब कहेगा और मैं उठा लाऊँगा। और मैंने उठा लिया।"

वो फिर अपना सिर झुकाकर हाथों में ले लिया।

"तो अब," मैंने कहा। "तू उस काग़ज़ पर अपना नाम देखकर डर रहा है।"

"हाँ," उसने कहा। "क्योंकि अगर वो काग़ज़ किसी को मिल जाए, तो मैं भी अंदर जाऊँगा। और मैंने सुना है कि साहब की गाड़ियाँ जिनको ले जाती हैं, वो लौटकर नहीं आते।"

मैं उसके सामने झुका।

"बबलू," मैंने कहा — धीरे से, बिना किसी ताने के — "मैं तुझे एक बात कहूँ? बीस साल से तू उस काग़ज़ पर अपना नाम लिए घूम रहा है। आज वो काग़ज़ हमारे हाथ में है। अगर तू चाहे, तो हम इसे ऐसे इस्तेमाल कर सकते हैं कि तेरा नाम तेरे फ़ायदे में आए।"

बबलू ने सिर उठाया।

उसकी आँखों में कुछ बदला।

"कैसे?" उसने पूछा।

"ये अभी नहीं," मैंने कहा। "पहले तुझे मेरे साथ आना पड़ेगा। और मेरे साथ आने का मतलब है — मुझसे कुछ छिपाना नहीं।"

वो कुछ देर मेरी आँखों में देखता रहा।

फिर उसने एक लंबी साँस छोड़ी।

"ठीक है," उसने कहा। "मैं आऊँगा। पर मैं तुझे एक बात बताता हूँ।"

"क्या?"

"अब घंटी किसके पास रहेगी वाली पर्ची," बबलू ने कहा, "वो मेरे रूमाल में मैंने रखी थी। और सुबह वो नहीं थी।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तो?"

"तो ये मत सोचना," बबलू ने कहा, "कि सिर्फ़ मैं तुम्हारे पीछे हूँ। उस कमरे में कोई और भी है जो तुम्हारी घंटी के पीछे है। और वो, मेरी जान, बहुत जल्दी आएगा।"

उसकी आवाज़ गिर गई और वो सीढ़ियों पर अपना सिर टिकाकर बैठ गया।

मैंने पीछे मुड़कर दरवाज़े को देखा।

आधा खुला दरवाज़ा। वो अंधेरा, जो अब थोड़ा और गहरा लग रहा था। और उससे आती सीलन भरी गंध।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने अपना कैमरा बंद कर दिया था और उसकी बैटरी खत्म होने की लाल बत्ती बुझ रही थी।

"तीन मिनट पूरे," उसने कहा। "अब बस यादें हैं।"

टिंकू ने अपना पेचकस अपनी जेब में डाल लिया और मेरे पास आया।

"उस्ताद," उसने कहा। "मैं एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

"उस दरवाज़े के पीछे," उसने कहा, "हम तीन लोग जा रहे हैं। पर अगर वहाँ कोई और हो, तो उसे कैसे पता चलेगा कि हम तीन हैं, और हम उससे कम या ज़्यादा हैं?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुराया।

"उसे पता नहीं चलेगा," मैंने कहा। "क्योंकि हम ऐसे जाएँगे कि लगे कोई आया ही नहीं।"

टिंकू ने सिर हिलाया।

"अच्छा," उसने कहा। "ये ठीक है। मुझे बुरा लग रहा था कि सिर्फ़ मैं डर रहा हूँ। पता चला, तुम भी डर रहे हो।"

मैंने उसे घूरा।

"तू बहुत बोलता है," मैंने कहा।

"माँ भी यही कहती है," उसने कहा। "पर बोलने से ही तो पता चलता है कि आदमी ज़िंदा है।"

मैंने उसके सिर पर हाथ रखा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।

और फिर मैंने सीढ़ियों की तरफ़ देखा, जहाँ बबलू बैठा था। उसने अपना सिर उठाया और मेरी तरफ़ देखा — बिना हँसी, बिना चालाकी। सिर्फ़ एक आदमी की तरह, जो बहुत बरसों बाद सच बोलकर थका हुआ है।

"बबलू भाई," मैंने कहा। "तुम ऊपर जाओ और बंसीलाल से कहो कि दरवाज़ा खुल गया है। और अगर तुम मेरी बात मानो, तो अपना स्कूटर भी वहाँ से हटा दो।"

बबलू ने पूछा, "क्यों?"

"क्योंकि," मैंने कहा, "अगर वो कमरा बोलेगा, तो पहले बाहर वालों को बुलाएगा। और मुझे नहीं लगता कि उसे तेरी गाड़ी पसंद आएगी।"

बबलू ने मुझे देखा। फिर खड़ा हुआ, एहतियात से, जैसे उसकी टाँगें भी अब साथ न दे रही हों।

और जाते-जाते उसने अपनी जेब से कुछ निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

एक माचिस का डिब्बा।

"इसमें," उसने कहा, "वो काग़ज़ नहीं है। बस ज़रूरत का सामान है। तीन बत्तियाँ हैं। अगर अंदर टॉर्च बुझे, तो काम आएँगी।"

मैंने माचिस ली।

"बबलू," मैंने कहा। "ये तूने कब रखा था?"

"आज सुबह," उसने कहा। "जब मुझे लगा कि मैं शायद इस बार किसी की मदद कर सकता हूँ।"

वो सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

मैंने दरवाज़े की तरफ़ मुड़कर देखा।

दरवाज़े के पीछे से अब भी वही गंध आ रही थी, और साथ में एक नई आवाज़ — बहुत धीमी, बहुत लंबी, जैसे कोई काग़ज़ का पन्ना फर्श पर खिंच रहा हो।

"मीरा," मैंने कहा।

"हाँ?"

"तेरी कलम," मैंने कहा। "नीली स्याही वाली। जब हम अंदर जाएँ, तू हर चीज़ के नाम, तारीख़ और जगह उसी वक़्त लिखती जाना। काग़ज़ न मिले तो अपनी हथेली पर लिखना। पर लिखना।"

उसने अपनी जेब से कलम निकाली और मेरी तरफ़ देखा।

"तू मुझे बता," उसने कहा। "क्या तुझे अंदर जाने से डर लग रहा है?"

"बहुत," मैंने कहा।

"अच्छा," उसने कहा और कलम खोल ली। "मुझे भी। अब चल।"

मैंने दरवाज़ा ज़ोर से धक्का दिया।

दरवाज़ा खुला।

और अंदर, अंधेरे में, जेब में घंटी ने अपनी आख़िरी बात कही —

"अंदर जो है, वो तेरा नाम नहीं पूछेगा। वो तेरे दादा का नाम पूछेगा। और उसे बोलना पड़ेगा ठीक वैसे ही जैसे वो बोलते थे — नहीं तो वो तुझे तेरे नाम से भी नहीं पहचानेगा।"

॥

दरवाज़ा जितना खुला, उतना ही अंधेरा बाहर आया।

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