The Mysterious Bell – Chapter 601
"बबलू भाई," मैंने कहा। "तुम ये बात किसके डर से कह रहे हो?"
उसने जवाब नहीं दिया।
"मैंने तो सुना था," मैंने कहा, "तुम वो हो जो दूसरों को डराता है। आज तुम्हारी आवाज़ क्यों काँप रही है?"
बबलू ने अपना एक हाथ उठाया। मुझे लगा वो मुझे धमकाने के लिए पकड़ने आ रहा है। पर उसने कुछ और किया — उसने अपना हाथ सामने फैला दिया और देखा।
उसका हाथ काँप रहा था।
और वो खुद अपने हाथ को देखकर ऐसे चौंका जैसे पहली बार देखा हो।
"मैं डर नहीं रहा," उसने खुद से कहा, जैसे मुझसे नहीं, खुद से बात कर रहा हो। "मैं डर नहीं रहा। मैंने तो देखा है।"
"क्या देखा?" मीरा ने पीछे से पूछा।
बबलू ने जवाब नहीं दिया। उसने अपना हाथ नीचे किया और उसे कोट की जेब में घुसा दिया, जैसे छिपाना चाहता हो।
"तुम्हारे हाथ में रूमाल था," मैंने कहा। "कल। पीपल पर। जब तुम बिना चेन के आए थे।"
बबलू ने मेरी तरफ़ देखा।
"वो रूमाल चला गया," उसने कहा।
"कहाँ गया?"
"पता नहीं," उसने कहा। "पता नहीं। मैंने उसे सोते समय किसी से बँधवाया था, और सुबह उठा तो… नहीं था। सिर्फ़ मेरी हथेली पर ये निशान था।"
उसने अपना हाथ फिर निकाला और मुझे दिखाया। हथेली के किनारे पर एक उभरी हुई लाल लकीर थी, जैसे कोई धागा रात भर बँधा रहा हो और अब उसकी छाप छोड़ गया हो।
"बबलू भाई," मैंने कहा। "तुम ऐसे आदमी नहीं हो।"
"मैं क्या आदमी हूँ," उसने कहा। "मुझे खुद नहीं पता।"
वो सीढ़ियों पर बैठ गया। बैठा भी नहीं, गिरा। उसका मोटा शरीर धड़ाम से सीढ़ी के पत्थर पर बैठ गया और उसने अपना सिर दोनों हाथों में पकड़ लिया।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया — रुको।
मैं बबलू के सामने बैठ गया।
"सुनो," मैंने कहा। "तुम कल से यही कह रहे हो — तुमने बक्सा देखा है। अब साफ़ बोलो। क्या देखा?"
बबलू ने सिर उठाया।
उसकी आँखों में पानी था। जी हाँ। बबलू पांडे की आँखों में पानी था, वो आदमी जो मुझे कल गुमटी पर गला पकड़कर उठा लिया था।
"तुम्हारे पापा," उसने कहा।
मैं सकपका गया।
"क्या?"
"तुम्हारे पापा," उसने फिर कहा। "पाँच साल पहले। शंकर यादव। मैंने उन्हें देखा था।"
"कहाँ देखा?"
"यहाँ नहीं," बबलू ने कहा। "ऊपर। भारद्वाज भवन में। चंद्रेश सक्सेना के दफ़्तर में।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा और मेरे भीतर कुछ ऐसा उठा जो बहुत समय से दबा हुआ पड़ा था।
"मुझे बताओ," मैंने कहा।
बबलू ने गला साफ़ किया।
"मैं उस रात वहाँ था," उसने कहा। "पर मैं उस कमरे में नहीं था। मैं बाहर, गलियारे में था। मुझे साहब ने कहा था कि दरवाज़े पर खड़े रहना। अंदर कोई आए तो मुझे बुलाना। मैंने दरवाज़े से झाँका। तुम्हारे पापा वहाँ बैठे थे और सक्सेना उनसे कुछ कह रहे थे।"
"क्या कह रहे थे?"
"मैं पूरा नहीं सुना," बबलू ने कहा। "पर जितना सुना, वो यह था — यादव, तुम्हारा अंगूठा लगेगा तो तुम्हारी औरत का इलाज चलेगा। नहीं तो तुम्हारी औरत को कल अस्पताल से निकाल देंगे।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"फिर?" मैंने कहा।
"फिर," बबलू ने कहा, "तुम्हारे पापा ने काग़ज़ उठाया। उनके हाथ काँप रहे थे। वो देख रहे थे जैसे कोई आदमी ये तय न कर पा रहा हो कि गिर जाऊँ या खड़ा रहूँ।"
"और फिर उन्होंने अंगूठा लगा दिया," मैंने कहा।
"नहीं," बबलू ने कहा।
मैंने सिर उठाया।
"क्या?"
"नहीं," बबलू ने दोहराया। "उन्होंने अंगूठा नहीं लगाया। उन्होंने काग़ज़ वापस मेज़ पर रख दिया और कहा — मैं अपने बेटे के नाम से कुछ नहीं लिखूँगा।"
मैं स्तब्ध रह गया।
"क्या कहा तुमने?"
"उन्होंने कहा," बबलू ने कहा, आवाज़ भर्राई हुई थी, "मैं अपने बेटे के नाम से कुछ नहीं लिखूँगा। बेटा बड़ा होकर मेरे काग़ज़ों से शर्मिंदा न हो।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरे गले में कुछ भर गया।
"पर उनका अंगूठा उस काग़ज़ पर है," मीरा ने पीछे से कहा — धीरे से, बहुत धीरे से।
"हाँ," बबलू ने कहा। "वो बाद में आया।"
"कब?" मैंने पूछा।
"उसी रात," बबलू ने कहा। "दो घंटे बाद। अलग कमरे में। सक्सेना ने उन्हें दूसरे कमरे में बुलाया। वहाँ गोविंद भाई थे, मुनीम। और उनके अलावा… एक और आदमी था।"
"कौन?"
बबलू ने अपना सिर उठाया और मेरी आँखों में देखा।
"काले कोट में," उसने कहा। "और उसकी उँगली में एक काली अंगूठी थी।"
मैं खड़ा हो गया।
मैं नहीं जानता क्यों खड़ा हो गया। शायद इसलिए कि बैठकर सुनना अब मुश्किल हो रहा था। शायद इसलिए कि मेरे घुटने काँप रहे थे और मैं उन्हें छिपाना चाहता था।
"वो आदमी," मैंने कहा। "क्या वो ही था जिसने पापा से अंगूठा लगवाया?"
बबलू ने सिर हिलाया।
"उसने कहा," बबलू ने कहा, "यादव जी, तुम्हारी औरत की जाँच में जो आया है, वो सब ठीक है। बस एक काग़ज़ में तुम्हारा नाम आ रहा है। हम उसे ठीक कर देंगे। बस तुम 'यहाँ' अंगूठा लगा दो।"
"और पापा ने लगा दिया?"
"नहीं," बबलू ने कहा। "पहली बार नहीं। उन्होंने कहा — मुझे पहले पूरा काग़ज़ दिखाओ।"
मैंने साँस रोक ली।
"तो?"
"तो वो आदमी हँसा," बबलू ने कहा। "और उसने काग़ज़ सामने रख दिया। और मैंने… मैंने देखा कि उस काग़ज़ पर दो नाम थे।"
मेरे भीतर कुछ ठहर गया।
"कौन से दो नाम?" मीरा ने पूछा। वो मेरे पीछे आ गई थी और उसकी आवाज़ बहुत साफ़ थी।
बबलू ने उसकी तरफ़ देखा।
"एक शंकर यादव," उसने कहा। "और दूसरा अंकुश यादव।"
उस कमरे में हवा जैसे रुक गई।
"मेरा नाम?" मैंने कहा।
"हाँ," बबलू ने कहा। "तुम्हारे पापा ने जब ये देखा, तो उन्होंने काग़ज़ वापस मेज़ पर पटक दिया। उन्होंने कहा — मेरा बेटा उन्नीस साल का है। तुम उसका नाम कैसे लिख सकते हो? उसने तो कोई काग़ज़ देखा भी नहीं।"
"फिर?" मीरा ने पूछा।
"फिर वो आदमी उठा," बबलू ने कहा। "और उसने कहा — यादव जी, उसका नाम इसलिए लिखा है क्योंकि ये चीज़ बेटे के नाम पर है। ये तुम्हारी गली वाली दुकान नहीं है। ये तुम्हारे बेटे की दुकान है। शंकर यादव का नाम तो बस ऊपर लिखा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्या?" मैंने कहा।
बबलू ने मेरी आँखों में देखा।
"उसने यही कहा था," बबलू ने कहा। "और तुम्हारे पापा ने… उन्होंने कोई लड़ाई नहीं की। वो बैठ गए। उन्होंने अपना हाथ मेज़ पर रखा और बस रो दिए।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
"और फिर उन्होंने अंगूठा लगाया?" मीरा ने पूछा, बहुत सावधानी से, जैसे फ़र्श पर बहुत धीरे क़दम रख रही हो।
"उन्होंने कहा," बबलू ने कहा, "कि मेरी औरत के इलाज के बदले मेरा अंगूठा ले लो। पर मेरे बेटे की लाइन खाली छोड़ दो।"
"और वो आदमी?"
"वो नहीं माना," बबलू ने कहा। "उसने कहा कि दोनों नाम रहेंगे या कोई नहीं।"
मैंने पीछे मुड़कर मीरा को देखा। उसके हाथ में कैमरा अभी भी चालू था, पर उसकी लाल बत्ती काँप रही थी, जैसे बैटरी जवाब दे रही हो।
"अंकुश," मीरा ने कहा। "तू ठीक है?"
"हाँ," मैंने कहा।
झूठ बोला।
मैं ठीक नहीं था।
मैंने अपना हाथ दीवार पर रखा, इसलिए नहीं कि मुझे सहारा चाहिए था — इसलिए कि मुझे कुछ ऐसा छूना था जो हिले नहीं, और मेरे भीतर सब कुछ हिल रहा था।
"बबलू भाई," मैंने कहा। "तुमने ये बात आज तक किसी को क्यों नहीं बताई?"
बबलू कुछ देर चुप रहा।
"क्योंकि," उसने कहा, "उस कमरे से निकलते वक़्त उस आदमी ने मेरा कंधा थामा और कहा — जो तुमने देखा है वो तुम्हारी नींद में ही रहना चाहिए। सो जाओ, बबलू।"
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