The Mysterious Bell – Chapter 598
टिंकू ने तीली बुझा दी और टॉर्च की रोशनी में उसने अपना चश्मा ठीक किया।
"डरता हूँ," उसने कहा। "पर जब पेट में डर हो और हँसी भी आ रही हो, तो हँसी को आगे कर देना चाहिए। डर अपनी जगह रहता है, हँसी बाहर चली जाती है, और कमरा थोड़ा छोटा लगने लगता है।"
मैंने टिंकू के सिर पर हाथ रखा। छोटा सिर। बड़ी बात।
"चलो," मैंने कहा। "रजिस्टर बाद में। पहले देखें ये राख किसकी है।"
हम राख के उस गोले के पास गए। टॉर्च की रोशनी में मैंने देखा — राख के बीच एक लोहे का बक्सा था। छोटा, मज़बूत, जिसका ढक्कन आधा खुला था और जिसके किनारों पर पुरानी ज़ंग थी।
"इसे कोई यहाँ लाया," मीरा ने कहा। "आग से बचाने के लिए।"
"या आग लगाने के लिए," मैंने कहा।
बक्से का ढक्कन उठाया। अंदर सबसे ऊपर एक मैला कपड़ा था, जिसे खोलते ही कपड़े के महीन टुकड़े उड़ने लगे। उसके नीचे — काग़ज़।
मोटा। पीला। और हाथ से लिखा हुआ।
मीरा ने तुरंत अपनी कलम खोली।
मैंने काग़ज़ खोला और पहली लाइन पढ़ी।
"यह ज़मीन," मैंने पढ़ा, और मेरी आवाज़ कुछ अजीब लगी, "यह ज़मीन सिर्फ़ गरीबों के इलाज के लिए रहेगी। जो यहाँ रोगी आए, उससे कभी कुछ न माँगा जाए। न मोल, न रिश्वत, न अहसान।"
रुक गया।
"आगे," टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी।
"यह ज़मीन कभी बिकेगी नहीं," मैंने पढ़ा। "कभी गिरवी नहीं रखी जाएगी। कभी किसी ऐसे हाथ में नहीं जाएगी जो इसे दुकान या मकान बनाने के लिए ले। और अगर कोई ऐसा करे — तो इस ज़मीन की शर्त बोलेगी।"
"शर्त बोलेगी," मीरा ने कहा। उसने वही शब्द अपनी कलम से लिखे। "यही शब्द है जो रज़ा सलीम ने कहा था।"
मैंने आगे देखा। नीचे की तरफ़ हस्ताक्षर की जगह थी। और अंगूठों की जगह।
कुछ जगहों पर धुंधले निशान — नीली स्याही में, पुरानी, फीकी।
"इसमें से एक पन्ना गायब है," मीरा ने अचानक कहा।
मैंने उसके हाथ में देखा। वो काग़ज़ के किनारे को अपनी उँगली से सहला रही थी।
"कैसे पता?"
"सिलाई के छेद हैं," मीरा ने कहा। "देखो — तीन जगह, एक सीध में। और किनारे पर नीले धागे का एक रेशा बचा है। इसका मतलब यह काग़ज़ किसी सिली हुई फाइल में था, और इसे वहाँ से निकाला गया — पर पूरा नहीं निकाला। एक पन्ना पहले ही निकाला जा चुका था।"
"उस पन्ने पर क्या था?"
"शर्त," मीरा ने कहा। "और गवाहों के नाम।"
मेरे हाथ में काग़ज़ काँपा।
और फिर मैंने नीचे देखा — जहाँ हस्ताक्षर थे, वहाँ से थोड़ा ऊपर, बाईं तरफ़, एक नाम आधा कटा हुआ था।
पढ़ने लायक बचा था — "जगदीश या…"
मेरी आँखें उस आधे नाम पर जम गईं।
कमरे में सब चुप हो गए।
मैंने काग़ज़ को थोड़ा और ऊपर किया, जैसे बेहतर रोशनी से वो आधा नाम पूरा हो जाएगा।
नहीं हुआ।
"जगदीश यादव," मैंने बहुत धीमे कहा।
"अंकुश," मीरा ने कहा।
"यह मेरे दादा का नाम है," मैंने कहा। "और ये काग़ज़… ये काग़ज़ मेरे दादा के हाथ का लिखा हुआ लग रहा है।"
टिंकू ने एक क़दम आगे रखा।
"उस्ताद, आप पक्का कैसे कह रहे हैं?"
"पता नहीं," मैंने कहा। "बस जानता हूँ।" मैंने अपनी उँगली उस लिखाई पर रखी। "मेरे दादा की लिखाई में जो 'ग' आता था, वो नीचे से हल्का टूटता था। यहाँ देख — जगदीश का ग। टूटा हुआ है।"
मेरे गले में एक गाँठ बन गई।
मैंने काग़ज़ नीचे किया और एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं।
सामने अंधेरे में मुझे अपने दादा दिखे — जिन्हें मैंने कभी नहीं देखा। सिर्फ़ सुना था। बुखार में गए थे, दवा देर से आई थी, और यही बात मेरी माँ के घर में किसी भी बात से ज़्यादा भारी थी। दादा जिनकी साइकिल की घंटी अब मेरी जेब में धागे से बँधी है।
जेब में घंटी हिली।
और उसने कहा, बहुत धीमे, करीब से — "यहाँ टूटा इंसान नहीं है। वादा टूटा है।"
मैंने आँखें खोलीं।
"क्या कहा?" मीरा ने पूछा। वो मेरे चेहरे को देख रही थी।
"घंटी," मैंने कहा। "कह रही है — यहाँ इंसान नहीं टूटा। वादा टूटा है।"
मीरा ने एक गहरी साँस ली और काग़ज़ पर झुक गई।
"फिर वो वादा जोड़ना पड़ेगा," उसने कहा। "और वादा जोड़ने के लिए दो इंसान चाहिए, अंकुश। एक नहीं।"
मैंने सिर हिलाया।
"पता है," मैंने कहा। "यही तो सबसे मुश्किल हिस्सा है।"
हमने उस काग़ज़ को सावधानी से बक्से के ऊपर रखा और आस-पास देखने लगे। राख का गोला, टूटी कुर्सियाँ, रजिस्टरों के ढेर — और अब बाईं तरफ़ की दीवार, जिस पर टॉर्च की रोशनी जाने पर एक लंबी, पतली, सीधी आकृति दिखी।
"मीरा," मैंने कहा। "वहाँ रोशनी कर।"
रोशनी गई।
दीवार में एक लकड़ी की अलमारी थी। छोटी, पर चौड़ी। उसका दरवाज़ा बंद था और उस पर एक पुराना ताला लगा था, जो इस कमरे के बाक़ी सामान से ज़्यादा देखा-भाला लग रहा था। साफ़। जैसे किसी ने हाल में उसे पोंछा हो।
"यही है," मैंने कहा। "बंसीलाल की दूसरी चाबी।"
मैंने जेब से दूसरी काली चाबी निकाली — वो जिस पर भी लाल धागा बँधा था, पर थोड़ा हल्का। ये छोटी थी, दाँते और घिसे हुए, और उसकी गर्दन पर एक पुराना निशान था — जैसे किसी ने उसे बहुत बार अलमारी में घुमाया हो।
पर मैं अभी ताले तक नहीं पहुँचा।
क्योंकि उसी वक़्त कुछ हुआ।
कमरे के कोने में, उस अलमारी के पीछे की तरफ़, एक और लोहे की आलमारी थी — बड़ी, दो पटों वाली, जिसका रंग काला था और जिस पर ज़ंग के फूल खिले हुए थे। वो अंधेरे में इतनी मिली हुई थी कि टॉर्च की रोशनी उस पर पहली बार पड़ी।
और उसी बड़ी आलमारी से — बहुत धीमी, बहुत सोची हुई — तीन खटखटाहटें आईं।
ठक।
ठक।
ठक।
टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
मीरा ने अपनी कलम रोक दी और एक कदम पीछे हटी। मैंने उसकी तरफ़ देखा — उसके चेहरे पर एक भी हरकत नहीं थी, जो बहुत अजीब बात थी, क्योंकि मुझे पता था वो अंदर से काँप रही थी।
मैंने टॉर्च उस आलमारी की तरफ़ सीधी की।
तीन खटखटों के बाद कमरा एक अजीब तरह की चुप्पी में चला गया। न राख हिल रही थी, न धूल। जैसे कमरे ने भी अपनी साँस रोक ली हो।
और तभी जेब में घंटी बजी।
पहले बहुत धीमे, फिर साफ़, और फिर उसकी आवाज़ में वो रूखापन आ गया जो हमेशा सच बोलते वक़्त आता है।
उसने कहा — "अब जो जगा है, वो सोने का नाटक कर रहा है।"
मैंने चाबी को हाथ में कस लिया।
"क्या मतलब?" मैंने धीरे से पूछा।
"मतलब," घंटी ने कहा, "अभी तक जो सोया था, वो जाग गया है। और जागकर आँख बंद करके बैठा है, ताकि तुझे लगे कि वो कभी था ही नहीं।"
मैंने आलमारी की तरफ़ एक क़दम रखा।
टिंकू ने मेरा हाथ और कसा।
"उस्ताद," उसने कहा। "मैं डरा हुआ हूँ।"
"मैं भी," मैंने कहा।
"आप भी?"
"हाँ," मैंने कहा। "पर देख — डर के साथ मैं जा क्यों रहा हूँ? क्योंकि डर के पीछे कुछ बैठा है जो मुझे नाम से बुलाना चाहता है। और अगर वो मेरे नाम से बुलाना चाहता है, तो मुझे उसका नाम भी सुनना पड़ेगा।"
मीरा ने अपनी कलम की छोटी सी ढक्कन वापस लगाई और जेब में रखी।
"अंकुश," उसने कहा। "मैं रिकॉर्ड नहीं कर रही। बैटरी जवाब दे रही है। पर जो अभी बोलेगा, मैं याद रखूँगी। और मुझे याद रखने की आदत है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके माथे पर पसीना था, पर उसकी आँखें साफ़ थीं।
"यही काफ़ी है," मैंने कहा।
मैंने एक और क़दम रखा। राख चरचराई। मेरा जूता काग़ज़ की एक आधी जली पट्टी पर पड़ा और वो लिपट गई।
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