The Mysterious Bell599 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 599

7 min read November 5, 2026

और ठीक उसी वक़्त, बड़ी आलमारी से एक चौथी आवाज़ आई।

पर यह खटखटाहट नहीं थी।

यह किसी चीज़ के खिसकने की आवाज़ थी। जैसे अंदर कोई बैठा हो और अपनी जगह बदल रहा हो।

टिंकू ने एक लंबी साँस छोड़ी और फिर — मुझे यक़ीन नहीं हुआ — हँस दिया।

एक छोटी, सूखी हँसी।

"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।

"कुछ नहीं," टिंकू ने कहा। "बस सोच रहा हूँ — जब हम बाहर निकलेंगे, तो सबको बताऊँगा कि मैंने एक बार एक आलमारी को करवट बदलते देखा था।"

मीरा ने उसके सिर पर हल्की चपत लगाई। "सोच समझकर बोलना।"

"सोचकर ही बोला," टिंकू ने कहा। "अब बताइए, उस्ताद — पहले कौन सा ताला खुलेगा? दीवार वाली अलमारी का, या इस बड़ी काली वाली का जो अभी जागी है?"

मैंने दोनों चाबियाँ हाथ में उठाईं।

"दीवार वाली का," मैंने कहा। "क्योंकि वो शांत है। और जो शांत है, वो पहले सच बोलता है।"

मैंने दीवार वाली अलमारी की तरफ़ क़दम बढ़ाया।

और पीछे, अंधेरे में, बड़ी काली आलमारी फिर चुप हो गई। इतनी चुप कि मुझे लगा वो हमारी बातें सुन रही है, और अपनी साँस गिन रही है।

और जेब में घंटी ने एक आख़िरी बात कही —

"तेज़ चल। धूप अभी टंकी पर है। जब ढलेगी, तो ये कमरा बोलेगा।"

॥

मैंने दीवार वाली अलमारी की तरफ़ क़दम बढ़ाया और मेरे जूते के नीचे राख फिर चरचराई। वो आवाज़ इतनी अजीब थी न — जैसे कोई बहुत पुराना आदमी करवट बदल रहा हो और उसकी हड्डियाँ बोल रही हों।

तीन क़दम। बस तीन ही क़दम थे।

और फिर मैं उसके सामने खड़ा था।

जिसे घंटी ने दीवार कहा था, वो दीवार नहीं थी। मैंने टॉर्च उस पर सीधी की और मुझे अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं हुआ। पत्थर के जिस हिस्से को मैंने अभी तक सिर्फ़ सीलन भरी दीवार समझा था, उस पर एक लकड़ी का चौखटा था। इतना पुराना कि उसका रंग दीवार के रंग में मिल गया था। ऊपर से कोई चित्रकारी नहीं, कोई नक्काशी नहीं। बस सादा लकड़ी, जिस पर बरसों की धूल इतनी मोटी जमी थी कि वो भी पत्थर लगती थी।

और उस चौखटे के बीच में एक ताला था।

छोटा सा, काला, मोटा। जिस पर ज़ंग इतनी चढ़ी थी कि लगता था ताला नहीं, ज़ंग का ही एक गोला टँगा है।

मैंने जेब से बंसीलाल की दी हुई दूसरी काली चाबी निकाली।

"रुको," मीरा ने कहा।

मैंने हाथ रोक लिया।

"क्या?"

"पहले मैं रिकॉर्ड कर लूँ," उसने कहा। "बैटरी तीन मिनट की है। मैं चाहती हूँ कि जो अगला दरवाज़ा खुले, वो कैमरे में हो। ठीक बीच में।"

मैं हँस पड़ा। जगह देखकर हँसी नहीं आई, पर आ गई।

"तू ठीक है न?" मैंने पूछा।

"नहीं," मीरा ने कहा। "बिल्कुल ठीक नहीं हूँ। पर कैमरा ठीक है, और इस वक़्त मुझे कैमरे पर ज़्यादा भरोसा है।"

टिंकू ने मेरी जेब से टॉर्च छीन ली और अपनी तरफ़ से रोशनी दीवार पर डाल दी। उसकी रोशनी में चौखटा और साफ़ दिखने लगा।

"उस्ताद," उसने कहा। "आपने देखा? इस लकड़ी पर कोई खुदाई नहीं है। कोई नाम नहीं, कोई फूल नहीं। ऊपर वाला दरवाज़ा था, उस पर भी कुछ नहीं था। ये लोग चीज़ें छिपाते तो थे, पर उन्हें बताते नहीं थे कि छिपा क्या है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तू ठीक कह रहा है," मैंने कहा। "जो लोग नाम नहीं लिखते, वो डरते हैं कि नाम पढ़ लिया जाएगा।"

टिंकू ने अपनी जेब में हाथ डाला।

"उस्ताद," उसने कहा। "एक चीज़ दिखानी है।"

"अब?"

"अब," उसने कहा, और एक काग़ज़ की मोड़ी हुई पुरानी पर्ची निकाली।

वो पर्ची पीली पड़ चुकी थी, किनारों से चुभोई हुई यानी बहुत ज़्यादा खोली-बंद हुई थी। उस पर बच्चों की बड़ी लिखाई में कुछ लिखा था। टिंकू ने टॉर्च नीचे की और मुझे वो पर्ची पढ़ने को दी।

मैंने पढ़ा।

और मेरे भीतर कुछ ठंडा सा उतर गया।

उस पर लिखा था — जो नीचे जाएगा, वो ऊपर नहीं आएगा।

"ये कहाँ से आई?" मैंने पूछा।

टिंकू ने कंधे उठाए।

"सानिया ने दी," उसने कहा। "उसने शाम को स्कूल के स्टोर में एक डिब्बे के नीचे से निकाली थी। उस पर कोई तारीख़ नहीं, कोई नाम नहीं। बस यही लाइन।"

मीरा ने पर्ची अपने हाथ में ली और दोनों तरफ़ से देखी, फिर पलटकर पीठ देखी।

"पीठ पर कुछ नहीं," उसने कहा। "सिर्फ़ ये धब्बा है, जैसे किसी ने गीला हाथ रखा हो।"

टिंकू ने हाथ आगे किया।

"वापस दो," उसने कहा। "मैं इसे सम्भालकर रखूँगा।"

"क्यों?" मीरा ने पूछा।

"क्योंकि," टिंकू ने कहा — और उसकी आवाज़ में एक अजीब सा संजीदा भाव आ गया, जो बच्चों की आवाज़ में नहीं आना चाहिए — "अगर कल कोई कहे कि ऐसी पर्ची कभी थी ही नहीं, तो मैं इसे दिखा दूँगा।"

फिर उसकी आवाज़ वापस हल्की हो गई।

"और मैंने वैसे भी वापसी का टिकट नहीं लिया," उसने कहा। "माँ के पास पैसे नहीं थे।"

मीरा ने उसे घूरा।

"ये मज़ाक का वक़्त नहीं है," उसने कहा।

"पता है," टिंकू ने कहा। "इसीलिए मज़ाक कर रहा हूँ। जब मज़ाक नहीं करूँगा, तब तुम समझ जाना कि मैं डर गया हूँ।"

मीरा कुछ कहती, उससे पहले ही मैंने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया।

"छोड़," मैंने कहा। "ये ठीक कह रहा है।"

मैंने दीवार पर वापस ध्यान दिया। चाबी हाथ में थी। ताला सामने था।

मैं झुका और ताले को देखा।

मेरा हाथ ताला छूने ही वाला था कि मीरा ने कहा —

"रुको। पहले मैं पीछे देख लूँ।"

"पीछे?" मैंने कहा। "अलमारी के पीछे?"

"हाँ," उसने कहा और बिना मेरा जवाब सुने वो अलमारी की तरफ़ बढ़ गई।

अलमारी दीवार से बहुत थोड़ी दूर हटी थी। इतनी कम जगह कि इंसान तो क्या, बच्चा भी ठीक से घुस न पाए। पर मीरा ने अपना बैग ज़मीन पर रखा, और बिना किसी लाग-लपेट के घुटनों पर बैठ गई।

"लाइट," उसने कहा।

टिंकू ने टॉर्च उसकी तरफ़ की।

मीरा ने सिर झुकाया, गाल दीवार से सटाया, और आँख एक अंधेरे कोने में डाल दी, जो दरवाज़े और दीवार के बीच था।

फिर उसने एक लंबी साँस ली।

"अंकुश," उसने कहा। "यहाँ कुछ है।"

मैंने हाथ डाला। पर मेरा हाथ वहाँ तक नहीं गया। मेरी कलाई मोटी हो गई थी — या जगह उतनी नहीं थी।

"रुक," मीरा ने कहा। "मैं निकाल लेती हूँ।"

उसने अपनी कलाई अंदर डाली और कुछ देर बाद वो बाहर लाई।

एक दस्ताना।

पुराना, फटा हुआ, गंदा दस्ताना।

कपड़े का दस्ताना, जिसका एक उँगली वाला हिस्सा पूरा टूटा हुआ था, और बाक़ी कपड़ा जगह-जगह से उधड़ा हुआ था। उस पर धूल नहीं, सीमेंट की सफ़ेद परत जमी थी।

टिंकू ने टॉर्च उस पर सीधी की।

"ये इमरान का है," मैंने कहा।

मैंने कैसे कहा? मुझे खुद पता नहीं। शायद इसलिए कि दस्ताने की कलाई पर जो पीली रस्सी या धागे जैसा लिपटा था, वो वही दिख रहा था जो साइट पर काम करने वाले लोग पहनते हैं।

"पक्का?" मीरा ने पूछा।

"नहीं," मैंने कहा। "पर ऐसे दस्ताने दूसरे कौन पहनता है? यहाँ के किसी आदमी का नहीं है। ये साइट का है। और इमरान साइट पर काम करता है।"

टिंकू ने दस्ताना अपने हाथ में लिया और उसे पलटकर देखा।

"उस्ताद," उसने कहा। "अंदर की तरफ़ देखिए।"

मैंने देखा।

दस्ताने के अंदर, कलाई के पास, किसी पतली चीज़ से कुछ खुरचा हुआ था। बहुत महीन, बहुत छोटा। जैसे किसी सुई से लिखा गया हो।

मैंने आँखें सिकोड़ी।

"ये क्या है?" मैंने पूछा।

"नाम का पहला अक्षर लगता है," मीरा ने कहा। "पर मैं पक्का नहीं कह सकती। दस साल से ज़्यादा पुराना नहीं हो सकता, कपड़ा नया है। पर लिखाई ऐसी है जैसे किसी ने जल्दी में की हो।"

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