The Mysterious Bell – Chapter 597
"रुको," बंसीलाल ने कहा।
हम रुके।
"तीनों अपने पूरे नाम बोलो। ज़ोर से। जैसे गली में किसी को बुलाते हो।"
मीरा ने पहले कहा। उसकी आवाज़ में वो कड़कपन था जो खबर लिखते वक़्त आता है — "मीरा तिवारी।"
टिंकू ने दूसरे नंबर पर कहा, पर पहले वो सीना तानकर खड़ा हुआ, जैसे स्कूल में हाज़िरी लगा रहा हो — "टिंकू!"
"पूरा नाम," बंसीलाल ने कहा।
टिंकू का चेहरा एक पल के लिए उतरा। फिर उसने सीना और ताना और कहा — "टिंकू। बस टिंकू। बाक़ी लोग टिंकू ही बुलाते हैं, काका।"
बंसीलाल ने उसे देखा। मीरा ने उसे देखा। और मैंने देखा कि टिंकू की आँखों में कुछ ऐसा था जो वो इस वक़्त नहीं खोलना चाहता था — कि उसके नाम की दो कड़ियाँ कहीं और दबी पड़ी हैं, जो घर में पड़े किसी काग़ज़ पर लिखी हैं और जो अब किसी को याद नहीं।
"ठीक है," बंसीलाल ने कहा। "टिंकू ही सही। पर पूरे मुँह से बोला है, इसलिए गिना जाएगा।"
फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
मैंने साँस ली।
"अंकुश यादव," मैंने कहा। "जगदीश यादव का पोता। शंकर यादव का बेटा।"
बंसीलाल ने आँखें बंद कर लीं।
"अब खोलो," उन्होंने कहा।
चाबी कुंडे में गई। पहले वो अटकी। फिर दो मिलीमीटर आगे गई, फिर अटकी, फिर मैंने थोड़ा ज़ोर लगाया — और अंदर कुछ ऐसा टूटा कि पूरे ताले से एक लंबी, दुबली आवाज़ निकली, जैसे कोई बूढ़ा आदमी उठते वक़्त कराह रहा हो।
दरवाज़ा खुला।
और जो पहली चीज़ बाहर आई, वो रोशनी नहीं थी। गंध थी।
जले काग़ज़ की गंध।
एक ऐसी गंध जो पुरानी राख की होती है — न तेज़, न ताज़ी। बस दबी हुई। जैसे किसी ने बहुत पहले यहाँ कुछ जलाया था, फिर दरवाज़ा बंद कर दिया, और वो गंध चारदीवारी में बैठकर बत्तीस साल से इंतज़ार कर रही थी कि कोई दरवाज़ा खोले तो वो बाहर निकले।
मैंने पीछे मुड़कर बंसीलाल को देखा। वो फाटक से सटकर खड़े थे, दोनों हाथ पीतल की सीटी पर।
"मैं यहीं हूँ," उन्होंने कहा। "बस यहीं तक।"
"ठीक है," मैंने कहा।
फिर हम तीनों अंदर गए।
अंदर पहले तो कुछ नहीं दिखा। सिर्फ़ अंधेरा, और अंधेरे में धूल जो रोशनी की पतली लकीर में चल रही थी। मैंने काजल की टॉर्च जलाई। उसकी रोशनी बहुत तेज़ नहीं थी, पर इतनी थी कि सीढ़ियों का पहला हिस्सा दिख जाए।
सीढ़ियाँ लकड़ी की नहीं, पत्थर की थीं। और उन पर बत्तीस साल की धूल इतनी बैठी थी कि पहला क़दम रखते ही पैर फिसलने लगा।
"रुको," मीरा ने कहा। "मैं गिनती लिखती हूँ।"
"तुम गिनती लिखो," मैंने कहा, "मैं चॉक लगाता हूँ।"
टिंकू सबसे पीछे था। वो एक क़दम उतरा, फिर रुका, फिर बोला — "उस्ताद?"
"हाँ?"
"अगर नीचे कुछ ऐसा हो जो बोले, तो हम क्या करेंगे?"
"जवाब देंगे," मैंने कहा।
"और अगर वो हमारा नाम पूछे?"
"तो पूरा नाम बताएँगे," मैंने कहा। "और अगर वो अपना नाम बताए, तो लिख लेंगे। मीरा के पास कलम है।"
टिंकू ने कुछ सोचा। फिर उसने कहा — "उस्ताद, मुझे लगता है आप डर को भी हिसाब में लिखवा लेंगे।"
"लिखवा लेंगे," मैंने कहा। "डर भी एक काग़ज़ है। जिस दिन उसका हिसाब लग जाए, वो बेकार हो जाता है।"
हम उतरते गए।
हर पाँचवीं सीढ़ी पर मैं चॉक से दीवार पर एक छोटी लकीर खींचता। आवाज़ बहुत हल्की थी — जैसे कोई चूहा दीवार खुरच रहा हो। पर हर लकीर के साथ मुझे एक अजीब सा सुकून मिलता कि मैं वापस आ सकता हूँ।
चौथी सीढ़ी पर गंध और गहरी हो गई।
आठवीं पर ऐसा लगा कि नीचे कहीं कोई बैठा पानी उबाल रहा है — पर वो पानी नहीं थी। वो सीलन थी, जो पत्थर में बैठकर कभी-कभी फुसफुसाती है।
बारहवीं पर टिंकू ने कहा, "उस्ताद, मेरे पैर के नीचे कुछ चटका।"
"क्या?"
"लगता है काँच।"
मैंने टॉर्च नीचे की। हाँ। काँच का एक छोटा टुकड़ा, जो धूल में चमक रहा था। और उसके पास ही एक और, और उसके पास एक और।
"टॉर्च कराने से लगता है," मीरा ने कहा, "यहाँ कुछ गिरा था। तस्वीर का काँच?"
"या खिड़की का," मैंने कहा।
पर मुझे पता था। बंद कमरे में मैंने टूटे काँच वाली तस्वीर देखी थी — जिसमें जवान जगदीश यादव, जवान उस्ताद और जवान सलीम, तीनों काली साइकिल के साथ खड़े थे। ये काँच उसी तस्वीर के टूटने की आवाज़ नहीं थी। ये उस तस्वीर के टूटने के बाद की चुप्पी थी, जो बत्तीस साल में ज़मीन पर पड़ी रही।
सोलहवीं सीढ़ी पर हवा बदल गई। ऊपर की गरम, सूखी हवा चली गई और नीचे से एक ठंडी, भारी हवा आई, जिसमें धूल और राख दोनों थे।
बीसवीं पर मीरा ने कहा — "अंकुश।"
"हाँ?"
"मैंने पहले कभी इतनी पुरानी चुप्पी नहीं सुनी।"
"कैसी चुप्पी?"
"ऐसी," उसने कहा, "जैसे कोई बहुत ज़ोर से चिल्लाया हो और फिर बीच में रुक गया हो। इस कमरे की चुप्पी में चिल्लाहट का हिस्सा बचा है।"
मैं रुक गया। मीरा की बातें कभी-कभी बहुत सीधी होती थीं। इतनी सीधी कि आदमी को सँभलने का वक़्त नहीं मिलता।
"तो हम चिल्लाहट वापस पूरी करेंगे," मैंने कहा। "आधी नहीं छोड़ेंगे।"
चौबीसवीं सीढ़ी के बाद अंधेरा घना हुआ और फिर, बाईस सीढ़ियों के बाद, नीचे का फ़र्श दिखा।
अट्ठाईसवीं सीढ़ी पर मैंने पैर रखा, और मेरे जूते के नीचे कुछ ऐसा चरचराया जो सिर्फ़ काग़ज़ नहीं था। राख थी।
"रुको," मैंने कहा। "कोई जल्दी न करे।"
टॉर्च की रोशनी में मैंने ज़मीन देखी।
फ़र्श पर एक जगह गोल सी काली परत थी — जैसे किसी ने यहाँ काग़ज़ों का ढेर जलाया हो और फिर राख को पैर से बराबर कर दिया हो। राख के बीच काग़ज़ की सींकें अब भी बची थीं — पतली, काली, किसी की छोड़ी हुई लकीरें।
और उसी राख के किनारे पर, गिरी हुई कुर्सियाँ थीं।
कम से कम आठ-दस कुर्सियाँ। कुछ की टाँगें बाहर, कुछ का पीछा अलग, कुछ पूरी तरह टूटकर दो हिस्सों में। सब पर धूल। और उनके बीच में — रजिस्टर।
बहुत सारे रजिस्टर।
इतने कि पहले तो मुझे लगा यहाँ कोई दफ़्तार चलता था। फिर मैंने करीब जाकर देखा — रजिस्टर एक जैसे नहीं थे। कुछ मोटे, कुछ पतले। कुछ की जिल्द लाल थी, कुछ की भूरी, कुछ की काली। कुछ के कोने जले हुए थे तो कुछ के सिरेफ़े साफ़, जैसे किसी ने उन्हें छुआ ही न हो।
टिंकू ने एक रजिस्टर उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, और उसी वक़्त उसकी जेब से माचिस निकलकर गिरी।
"अरे," उसने कहा, और उसे उठाकर अपने सामने देखा।
फिर उसने एक तीली जलाई।
पीली रोशनी कमरे में फैली, और मैंने देखा कि टिंकू का चेहरा उस रोशनी में काला-पीला लग रहा है, पर उसकी आँखों में डर नहीं था। उसमें खोज थी।
"उस्ताद," उसने कहा, "देखिए, यहाँ के चूहे भी शायद रजिस्टर में हिसाब रखते हैं।"
"क्यों?"
"क्योंकि —" उसने एक रजिस्टर की तरफ़ इशारा किया जिस पर कीड़े की लकीरें बनी थीं — "इस पर इतनी सफ़ाई से कुतरा है कि मुझे लगता है यहाँ का चूहा भी गली का ही था। हिसाब लीक से हटकर नहीं लिखा।"
मीरा ज़ोर से हँसी।
और उस हँसी के साथ कमरे में कुछ बदला। मुझे ऐसा लगा जैसे इस कमरे में बत्तीस साल बाद पहली बार हँसी आई है, और वो हँसी दीवारों से टकराकर लौटकर हम पर आ रही है।
"टिंकू," मीरा ने कहा, "तुम्हें पता है, तुम जब भी कुछ गलत बोलते हो, तुम्हारी आवाज़ दुगनी सच्ची हो जाती है?"
"क्योंकि मैं गलत कम बोलता हूँ," टिंकू ने कहा।
"नहीं," मीरा ने कहा। "क्योंकि तुम गलत बोलते वक़्त डरते नहीं।"
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