The Mysterious Bell – Chapter 596
"बंसीलाल," उन्होंने कहा। "बंसीलाल प्रसाद। बत्तीस साल का चौकीदार। बेटी की शादी अगले महीने। दो हज़ार रुपये की ज़रूरत। और अब…" उन्होंने अपनी जेब को एक बार और टटोला, "…अब देखते हैं, इस नाम के साथ क्या होता है।"
वो फाटक की तरफ़ बढ़े, फिर रुके, और मुड़कर बोले — "अंकुश, सुनो।"
"हाँ?"
"तुम्हारे पापा ने उस रात मुझसे एक बात कही थी। मैंने अब तक किसी को नहीं बताया।"
मैंने साँस रोक ली।
"क्या बात?"
बंसीलाल ने एक गहरी साँस ली।
"उन्होंने कहा था — बंसीलाल भाई, अगर मेरा बेटा कभी इस सीढ़ी पर आए, उसे ऊपर न रोकना। उसे नीचे जाने देना। मगर उससे पहले… उससे पहले उसे अपने दादा का नाम याद दिला देना।"
मेरे अंदर कुछ टूटा। फिर जुड़ा। फिर फिर टूटा।
दादा का नाम। जगदीश यादव। जो मुझे पीतल की पट्टी पर मिला था, अस्पताल के पिछले प्लॉट के गड्ढे में, उस पीली पट्टी पर जिसे बत्तीस साल किसी ने नहीं छुआ था। और जिस पट्टी में मेरे गले की चाबी तीन चौथाई तक फिट हो गई थी।
घंटी जेब में बजी। बहुत धीमे। इतने धीमे कि जैसे कोई मेरे कान के बहुत पास फुसफुसा रहा हो।
"अब जाना है," उसने कहा। "दिन में। धूप में। सीढ़ी पर, धूप के साथ।"
मैंने सिर हिलाया।
"कल?" मैंने पूछा।
घंटी ने कहा — "कल नहीं। आज। आज दोपहर। जब धूप टंकी के ऊपर आए।"
मैंने फाटक की तरफ़ देखा। टिंकू अब भी खड़ा था। मीरा अब भी मेरे पीछे थी। हबीब चाचा अब भी सामने।
और उस वक़्त मुझे महसूस हुआ कि ये एपिसोड कुछ और नहीं — ये सिर्फ़ एक बात का एपिसोड भी नहीं है। ये उस सीढ़ी की तरफ़ उतरने से पहले वाला आख़िरी सुकून है। जो अब खत्म हो रहा है।
मैंने बंसीलाल की तरफ़ देखा।
"आप आज दोपहर साथ चलोगे?"
बंसीलाल ने एक पल सोचा। फिर उन्होंने सिर हिलाया। "बस फाटक तक," उन्होंने कहा। "उससे आगे नहीं। मेरी हिम्मत वहीं तक है।"
"बहुत है," मैंने कहा।
उस रात जब मैं लौटा, तो टंकी के नीचे की ज़मीन पर बंसीलाल की बोरी का एक कोना बचा रह गया था — रात की हवा में हिलता हुआ, जैसे अभी भी कोई उसे बाँधकर रखे हुए हो।
मैं घर पहुँचा, तो छत पर पापा बैठे थे। बिना किसी काम के। सिर्फ़ बैठे हुए। उनके हाथ में पुरानी रिंच थी, और वो उसे घुमा नहीं रहे थे — बस पकड़े हुए थे।
मैं उनके पास बैठ गया। कुछ देर कुछ नहीं बोला।
फिर मैंने कहा, "पापा, आपका वो दाहिने हाथ का निशान… वो उस सीढ़ी पर आया था, न?"
पापा ने रिंच पर अपनी पकड़ कस ली।
और बिना मेरी तरफ़ देखे, उन्होंने एक ही वाक्य कहा — "कल दोपहर, बारह बजे के बाद चलना। धूप में। अंधेरे में नहीं।"
और मैंने कुछ नहीं पूछा। क्योंकि अब मुझे समझ आ गया था कि पापा उस सीढ़ी के बारे में सब कुछ जानते हैं। सब कुछ।
बस बोलना नहीं चाहते।
॥
दोपहर के ठीक बारह बजे, धूप टंकी की छत पर चढ़ गई थी।
मैंने देखा — पहले टंकी का किनारा चमका, फिर पूरा लोहा गरम लोहे जैसा दिखने लगा। और उसी वक़्त घंटी ने जेब में एक छोटी सी हरकत की। बजी नहीं। बस हिली। जैसे कोई कहे — अब।
बंसीलाल भाई फाटक से लगभग पंद्रह कदम दूर खड़े थे। उन्होंने अपनी बोरी साफ़ की, चारपाई की तरफ़ देखा, फिर हमारी तरफ़। उनके हाथ में वही पीतल की सीटी थी जो सीढ़ी पर मिली थी, और जिसे उन्होंने अब तक जेब में नहीं रखा था — नीचे की तरफ़ पकड़े हुए थे, जैसे पकड़ने में ही उससे दूरी बनी रहे।
मीरा ने अपना कैमरा उठाया। फिर नीचे किया। फिर दोबारा उठाया।
"चलेगा?" मैंने पूछा।
"बैटरी एक आख़िरी बार लगी है," उसने कहा, "और वो भी उधार की। तीन मिनट से ज़्यादा नहीं चलेगी।"
"तीन मिनट काफ़ी हैं," मैंने कहा। "बस तीन मिनट में मुझे कोई लात नहीं मिल जाए, बाक़ी देख लेंगे।"
मीरा हँसी। पर उसकी हँसी में वो आवाज़ थी जो हँसते वक़्त भी अंदर गिनती करती रहती है।
टिंकू ने अपना काला एक काँच वाला चश्मा ठीक किया। कल का दुपट्टा अब भी उसके गले में लिपटा था, और उस पर धूल की एक सीधी लकीर बन गई थी, जैसे उसने दुपट्टे से ज़मीन साफ़ की हो।
"उस्ताद," उसने कहा, "चाबी दोनों हैं ना?"
"हैं," मैंने कहा। "एक बंद कमरे की, एक उस दीवार के पीछे वाली अलमारी की।"
"और तीसरी?"
"तीसरी क्या?"
"मतलब… स्कूल के छत वाले ताले की तीसरी।" टिंकू ने अपना मोज़ा टटोला। "वो तो मेरे पास है। सोचा, तीन चाबियाँ साथ रहें तो किस्मत भी साथ चलेगी।"
बंसीलाल ने उसे घूरकर देखा।
"बेटा," उन्होंने कहा, "किस्मत चाबी से नहीं चलती। नाम से चलती है।"
टिंकू ने चश्मे के ऊपर से उन्हें देखा। "कौन सा नाम, बंसीलाल काका? पूरा वाला या छोटा वाला?"
"पूरा," बंसीलाल ने कहा, और उनकी आवाज़ सूख गई। "पूरा नाम बोलकर जाना। तीनों। ज़ोर से।"
यही वो बात थी जो वो इस पूरे आधे घंटे में चौथी बार कह रहे थे।
कभी वो कहते — "नाम बोलकर जाना।" कभी कहते — "सीढ़ी पर पैर रखने से पहले।" कभी कहते — "अंदर जाकर जो पूछे, उसे अपना पूरा नाम बताना, आधा नहीं।" और एक बार, बहुत धीमे उन्होंने कहा था — "मैं तीन साल से सो नहीं पाया, बेटा। तुम्हें नींद से जगाने के लिए नहीं भेज रहा, खुद के साथ जोड़ रहा हूँ।"
मीरा ने अपना पर्स टटोला और निकाला — एक नीली स्याही वाली पुरानी कलम।
"ये किसलिए?" टिंकू ने पूछा।
"जब भी कोई चीज़ मिले," मीरा ने कहा, "उसी वक़्त लिख लेंगे। नाम, तारीख़, कहाँ मिली। मुझे पाँच साल पहले यही सीख मिली थी — देर से लिखी बात आधी बात होती है।"
मैंने अपनी जेब से सफ़ेद चॉक का टुकड़ा निकाला।
"मैं सीढ़ियाँ गिनूँगा," मैंने कहा। "हर पाँचवीं पर चॉक का निशान। अगर रास्ता पलटे या दीवार बदल जाए, निशान बता देंगे।"
बंसीलाल ने एक लंबी साँस ली।
"सीढ़ियाँ अट्ठाईस हैं," उन्होंने कहा। "तुम्हारे पापा ने भी गिनी थीं। मुझे उस रात याद है — उन्होंने मेरे हाथ पर उँगली से गिनकर कहा था, बंसीलाल भाई, अट्ठाईस, सही।"
मेरे हाथ में चॉक थोड़ा काँपा।
"आपने मुझे यह पहले क्यों नहीं बताया?" मैंने पूछा।
"इसलिए," उन्होंने कहा, "क्योंकि तब तुम्हारा नाम पूरा बोलने लायक नहीं था। अब है।"
फाटक की तरफ़ से हम बढ़े।
रास्ता वही था जो कल रात मैंने घंटी की रोशनी में देखा था — दीवार के साथ सूखी नाली, टूटी बाउंड्री, और उसके बाद लोहे का पुराना फाटक, जिसकी कई पट्टियाँ अब भी किसी के धक्के से अंदर की तरफ़ मुड़ी हुई थीं। फाटक के बाएँ पाए के नीचे, उमस में चिपकी पड़ी, टेढ़ी काई लगी ईंट थी — जिसके नीचे आठवाँ पन्ना बताया जाता था, और जिसे अकेले खोदने से रजिस्ट्री का बूढ़ा मना कर गया था।
मैंने उस ईंट को देखा और आगे बढ़ गया। खुदाई अगले काम की चीज़ थी। पहले दरवाज़ा।
दरवाज़ा वहाँ था — लोहे का, काले रंग का, जिसका रंग ऊपर से उतर चुका था और नीचे से ज़ंग में बदल गया था। उसके बीच में एक पुराना कुंडा था। और उस कुंडे के नीचे, कल रात की धूल में, वही निशान — ज़ंग लगे नाखून जैसा, जैसे किसी ने उँगली से दबाकर धक्का दिया हो।
मैंने बंसीलाल की दी हुई काली चाबी जेब से निकाली। छल्ले पर लाल धागा बँधा था। चाबी पुरानी थी, दाँते घिसे हुए, और उसकी गर्दन पर एक जगह चमक बची थी — वह जगह जहाँ बत्तीस साल में किसी ने उसे बहुत बार घुमाया था।
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