The Mysterious Bell – Chapter 595
उन्होंने एक पल रुककर मेरी तरफ़ देखा। फिर आवाज़ बिलकुल नीची करके बोले —
"पर एक शर्त है।"
मैंने सिर हिलाया।
"रात बारह बजे के बाद," उन्होंने कहा, "वो कमरा कभी मत खोलना। बस वो शर्त। रात बारह के बाद वो कमरा मत खोलना, अंकुश।"
"क्यों?"
बंसीलाल ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने बस टंकी के ऊपर देखा, जहाँ एक तार से बँधी बत्ती झूल रही थी, बंद। फिर उनकी आवाज़ और धीमी हो गई।
"क्योंकि रात बारह के बाद वो कमरा सिर्फ़ कमरा नहीं रहता," उन्होंने कहा।
चुप्पी।
पूरी चुप्पी, ऐसी कि पीछे मीरा के कैमरे की लाल बत्ती भी पल भर के लिए बुझी-सी लगी।
फिर बंसीलाल ने गला साफ़ किया, और मुझे लगा कि वो अब उठेंगे और चले जाएँगे। पर नहीं। वो बैठे रहे। और उन्होंने एक और बात कही, जिसके लिए मैं तैयार नहीं था।
"तुम्हारे पापा को जानता हूँ," उन्होंने कहा।
मैं एक पल सुनता रह गया।
"शंकर यादव। पाँच साल पहले, एक रात, मैंने उन्हें भी उसी सीढ़ी पर देखा था।"
मेरे अंदर कुछ होने लगा। कुछ अनजाना। कुछ ऐसा, जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी।
"उस रात वो रो रहे थे," बंसीलाल ने कहा, और उनकी आवाज़ में कोई तरस नहीं थी, बस एक सीधी सी बात थी। "मैं ऊपर खड़ा था। वो नीचे से ऊपर आए। उनका हाथ जला हुआ था।"
मैंने कुछ नहीं कहा। नहीं कह सका।
"दाहिना हाथ," बंसीलाल ने कहा। "और जब मैंने पूछा कि क्या हुआ, तो उन्होंने कहा — कुछ नहीं। बस काग़ज़ छू गया।"
जले काग़ज़ की गंध। वो बात जो बंसीलाल ने अभी ऊपर कही — रणवीर के कपड़ों से जले काग़ज़ की गंध आती है।
और पापा का दाहिना हाथ।
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। और मुझे वो सफ़ेद निशान याद आ गया जो पापा के हाथ पर है — दाहिने हाथ के पीछे, कलाई के नीचे, एक छोटा-सा सफ़ेद निशान। मैंने बचपन में कई बार पूछा था कि ये क्या है। और पापा हर बार कहते थे — लोहे से छू गया था।
लोहे से छू गया था।
अब मुझे कुछ और समझ आने लगा। धीरे-धीरे। जैसे अंधेरे कमरे में एक-एक करके बत्तियाँ जल रही हों।
"बंसीलाल भाई," मैंने धीरे से कहा, "उस रात वो किस चीज़ को छूने गए थे?"
बंसीलाल ने मेरी तरफ़ देखा। और पहली बार उस रात उनकी आँखों में मुझे कुछ और दिखा — सिर्फ़ डर नहीं, कुछ और भी था। कुछ जैसे अपराधबोध।
"मैंने कभी नहीं पूछा," उन्होंने कहा। "क्योंकि वो रात जब मैंने उनसे पूछने की हिम्मत की, तो वो ऐसे हँसे जैसे उनका दिल टूट गया हो। फिर वो ऊपर छत के रास्ते बाहर चले गए। और अगले दिन से… अगले दिन से वो सीढ़ी की तरफ़ नहीं आए।"
मैंने कुछ देर फाटक की तरफ़ देखा। टिंकू अब भी खड़ा था। उसकी टॉर्च की रोशनी ज़मीन पर पड़ रही थी और उसमें धूल के कण नृत्य कर रहे थे, जैसे किसी पुरानी फिल्म का दृश्य हो।
हबीब चाचा ने अपनी लाठी और ज़ोर से टिकाई।
"बस," उन्होंने कहा। "बंसीलाल भाई, अब देर नहीं करनी चाहिए। हमें कुछ करना है। मेरा इमरान… मेरा इमरान कहीं इसी सीढ़ी पर है।"
बंसीलाल ने चाचा की तरफ़ देखा। फिर धीरे से बोले — "मैं जानता हूँ, चाचा। और यही अफ़सोस है।"
तभी जेब में घंटी ने कहा। बहुत धीमे। इतने धीमे कि मुझे लगा मैंने ख़ुद सोचा है।
"दिन में जाओ।"
मैंने सिर हिलाया। और धीरे से बोला, "क्या?"
घंटी ने फिर कहा, उतने ही धीमे स्वर में —
"दिन में जाओ, अंकुश। रात में नहीं।"
मैंने आँखें मूँद लीं।
"क्यों?"
घंटी एक पल चुप रही। फिर बोली —
"क्योंकि जो रात में उस सीढ़ी पर उतरा, वो ऊपर वापस वो नहीं होता जो वो था।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा सा फैल गया। और मैंने उस ठंडे को अपने अंदर बैठने दिया, क्योंकि उसे डर कहते हैं, और डर घंटी की आवाज़ में आज पहली बार साफ़ था।
मैंने बंसीलाल की तरफ़ देखा — वो उठने की तैयारी कर रहे थे। अपनी बोरी समेट रहे थे। और उसी वक़्त मुझे पीछे अंधेरे में कुछ हिलता दिखा।
एक काला धुआँ। जैसे कोई बहुत पुराना धुआँ, जो कई साल किसी दबे हुए काग़ज़ के अंदर बंद था, और अब बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हो। वो बंसीलाल के पीछे, पानी की टंकी की दाईं तरफ़, अंधेरे और फाटक के बीच से सरकता हुआ आगे आ रहा था। तंग, ऊँचा, धीमा। जैसे कोई पुराना धुआँ सीधी लकीर में ऊपर उठता है।
बंसीलाल ने वो देखा।
उनका शरीर एक पल में बदल गया। वो बोरी पर बैठे थे, और अब उठने लगे — पर उठे नहीं। बस अपनी जेब पर अपनी काँपती उँगलियाँ रख दीं और उसे कसकर पकड़ लिया। मुझे लगा वो चाबी वाली जेब नहीं पकड़ रहे — वो अपनी ज़िंदगी वाली जेब पकड़ रहे हैं।
"बंसीलाल भाई," मैंने धीरे से कहा। "क्या हुआ?"
वो बोले नहीं।
पर उनके होंठ हिल रहे थे, और उनकी आँखें अंधेरे में उस काले धुएँ पर टिकी थीं, जो अब टंकी की छाया के किनारे पर पहुँच गया था और रुक गया था — जैसे कोई शिकार को देख रहा हो।
मीरा पीछे से आई और मेरे कंधे पर हाथ रख दिया।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा, "मुझे वो धुआँ बंद कमरे के दरवाज़े के नीचे से आता दिखा था। जब हम उतरे थे। मुझे लगा आँख का धोखा है।"
मैंने हाथ उठाया। बोला नहीं। बस इशारा किया कि चुप रहे।
काला धुआँ टंकी की छाया के किनारे पर रुक गया, और धीरे-धीरे अपने आप अंदर की तरफ़ सिकुड़ गया — जैसे कोई साँप दरार में लौट रहा हो। और फिर वो गया। बिलकुल गया। जैसे हो ही नहीं था।
मैं साँस लेने लगा।
बंसीलाल ने अपनी आँखें बंद कर लीं और फिर खोल दीं।
"अब तुमने भी देख लिया," उन्होंने कहा। "इसलिए दिन में जाओ। दिन में ये नहीं आता। ये सिर्फ़ रात में आता है।"
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"मैं नहीं जानता," बंसीलाल ने कहा। "मैं बस इतना जानता हूँ कि ये उसी कमरे से आता है जिसकी मैं तुम्हें चाबी नहीं दे रहा। और ये तब आता है जब कोई उस कमरे के दरवाज़े के करीब आता है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखें अब सीधी थीं, बिना झिझक।
"दो बातें याद रखो, अंकुश," उन्होंने कहा। "पहली — दिन में जाओ, जब धूप सीधी छत से टंकी तक आए। दूसरी… और ये सबसे ज़रूरी है…"
वो रुके। उन्होंने गला साफ़ किया। उनकी उँगलियाँ जेब पर और कस गईं।
"दूसरी — रात बारह बजे के बाद अगर वो कमरा खुला रह गया, अगर किसी वजह से वो दरवाज़ा खुला रह गया, तो जो अंदर है, वो बाहर आ जाएगा।"
मैंने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, पर वो मुझे बोलने नहीं दिए। उन्होंने अपना हाथ उठाया और मेरे सीने के सामने रोक दिया।
"और," उन्होंने कहा, और अब उनकी आवाज़ में वो थकान गायब थी, सिर्फ़ एक पतला, ठंडा डर बचा था, "और जब वो बाहर आएगा, तो अकेला नहीं आएगा। वो अपने साथ किसी का नाम भी लेकर आएगा।"
आस-पास की हवा रुक गई।
"किसका नाम?" मैंने पूछा।
बंसीलाल ने मेरी तरफ़ देखा।
"जो उस कमरे से सबसे ज़्यादा जुड़ा हो," उन्होंने कहा। "जो सबसे पहले उस कमरे में गया हो। जो सबसे पहले उससे मिला हो।"
और वो खड़े हो गए।
मैं भी खड़ा हो गया। पीछे हबीब चाचा ने अपनी लाठी सीधी की। मीरा ने अपना कैमरा बंद कर दिया, और उसकी लाल बत्ती जो बुझी, तो अंधेरा और गहरा लगा।
"बंसीलाल भाई," मैंने कहा, "आपका नाम?"
बंसीलाल ने पहले मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने कुछ ऐसा किया जो मुझे उम्मीद नहीं थी — वो हँसे। एक अजीब सी हँसी, जिसमें डर था, पर साथ में एक अजीब सी बेफ़िक्री भी थी।
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