The Mysterious Bell – Chapter 594
"कल रात?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ भारी हो रही थी।
बंसीलाल ने मेरी तरफ़ देखा।
"कल रात मैंने इमरान को उसी सीढ़ी पर खड़ा देखा।"
टंकी के नीचे से हवा का एक झोंका आया और बोरी का कोना हिल गया।
"तीसरी सीढ़ी पर," बंसीलाल ने कहा। "वो खड़ा था, और वो हँस रहा था।"
मेरे पीछे हबीब चाचा की साँस टूटी। मैंने उनकी तरफ़ मुड़कर देखा — उनका हाथ मुँह पर था।
"हँस रहा था?" चाचा ने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी। "इमरान? मेरा इमरान?"
"हाँ, चाचा," बंसीलाल ने कहा। "हँस रहा था। जैसे कोई बच्चा हँसता है जब उसे कोई ऊँची जगह पर बिठा दे।"
मुझे कुछ ठंडा सा महसूस हुआ। मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी अब गरम भी नहीं थी, ठंडी भी नहीं थी। वो बस बैठी थी, जैसे कोई सुन रहा हो।
"और उसके पीछे?" मैंने पूछा।
बंसीलाल ने गला साफ़ किया।
"उसके पीछे एक आदमी खड़ा था," उन्होंने कहा। "जिसके पैरों में लकड़ी के जूते थे।"
उन्होंने सीटी को अपनी जेब में रख लिया और अपनी झुर्रियों वाली गर्दन ऊपर की।
"अब मैं बोल दिया," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो खालीपन था जो इंसान के अंदर से डर निकलने के बाद बचता है। "अब जो होगा, देख लेंगे।"
मैं उठा।
और उस वक़्त मेरी जेब से घंटी ने बिना बजे कहा —
"सवाल बदल गया है।"
मैंने धीरे से कहा, "क्या मतलब?"
घंटी ने कहा —
"अब इमरान को मत ढूँढ।"
"तो किसको?"
घंटी एक पल चुप रही।
फिर बोली, इतने धीमे स्वर में कि टंकी के नीचे की हवा भी उससे तेज़ लगी —
"उस आदमी को ढूँढ जो उसके पीछे खड़ा था। क्योंकि इमरान तेरे पास लौट आएगा। पर वो आदमी इमरान के साथ लौटेगा।"
॥
मैं कुछ देर वहीं खड़ा रह गया। पानी की टंकी के नीचे की हवा धीमी थी, और बंसीलाल की पुरानी बोरी का कोना एक-एक करके हिल रहा था, जैसे कोई उसे अंदर से खींच रहा हो। मेरे हाथ में लोहे की काली चाबी थी — वही जो सुबह उन्होंने मुझे दी थी — और अब उसका वज़न कुछ और बढ़ गया लगा।
घंटी जेब में बैठी थी। न बज रही थी, न गरम थी। बस बैठी थी, जैसे कोई बूढ़ा आदमी चबूतरी पर बैठकर सामने की गली देख रहा हो और सोच रहा हो कि क्या बोलूँ, कितना बोलूँ।
बंसीलाल ने पहले दाएँ देखा, फिर बाएँ। फिर फाटक की तरफ़ देखा, जहाँ से हम आए थे। फिर ऊपर फाटक के पीछे की दीवार की तरफ़, जहाँ से रात में किसी का साया दिख सकता था।
"यहाँ कोई नहीं है, बंसीलाल भाई," मैंने धीरे से कहा। "टिंकू फाटक पर खड़ा है। मीरा पीछे है। हबीब चाचा आपके सामने हैं। बस हम हैं।"
बंसीलाल ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें लाल थीं, और अब उनमें वो तेज़ी नहीं थी जो सुबह थी — चाबी देते वक़्त जो तेज़ी आई थी। अब बस थकान थी। बूढ़ी, घिसी हुई थकान।
"तुम जानते हो," उन्होंने कहा, "मेरी बेटी की शादी अगले महीने है?"
मैंने सिर हिलाया। बोला नहीं।
"दो हज़ार रुपये की बात है," उन्होंने कहा। "बस दो हज़ार। मेरे पास नहीं हैं। तीस साल यहाँ चौकीदारी की, और शादी पर दो हज़ार नहीं हैं।" वो हँसे — एक छोटी, खोखली हँसी, जो गले से ज़्यादा आगे नहीं गई। "और ये साहब, ये रणवीर भारद्वाज, इनके पास इतना पैसा है कि इनके जूते की धूल खरीद लूँ। मगर यहाँ एक बात कहने के लिए — बस एक छोटी बात — मुझे तीस साल लग गए।"
वो टंकी की छाया में, बोरी पर सरका और बैठ गए। मैं भी पास में चबूतरी के कोने पर बैठ गया। हबीब चाचा दो कदम पीछे खड़े रहे — न बैठे, न बोले। उनका हाथ अपनी लाठी पर था, और उनकी आँखें बंसीलाल पर।
"अब सुनो," बंसीलाल ने कहा। "और सुनते वक़्त मेरी तरफ़ मत देखना। सामने देखना। मेरी आवाज़ में कुछ निकलता हो तो तुम उसे देख मत लेना।"
मैंने नज़र फाटक की तरफ़ कर दी।
"रात," बंसीलाल ने कहा। "वो कई रातों से नीचे जाता है। हर बार वो सीने से एक पीली फाइल चिपकाए होता है — मोटी, किनारे से फटी हुई। और जब नीचे उतरता है, तो सीढ़ी पर उसके क़दम की आवाज़ ऐसी आती है जैसे कोई बोझ उठाए जा रहा हो। फिर नीचे अंधेरा हो जाता है। बिलकुल। मैं ऊपर सुनता रह जाता हूँ कि कब कुछ आवाज़ आए।"
"कुछ आती है?" मैंने पूछा।
बंसीलाल ने गला साफ़ किया।
"कभी काग़ज़ पलटने की आवाज़," उन्होंने कहा। "कभी बक्सा खुलने की। और कभी… कभी ऐसी आवाज़ जैसे किसी की लंबी साँस छूट रही हो। एक बार मैंने सुना कि वो नीचे किसी से बोल रहा है। पर उस कमरे में उसके सिवा कोई नहीं होता। मैंने भगवान की कसम खाई है, उस कमरे में उसके सिवा कोई नहीं होता।"
मेरे पीछे हबीब चाचा ने अपनी लाठी ज़मीन पर थोड़ी सी टिकाई, और वो टिक-टिक की आवाज़ उस रात की चुप्पी में बहुत तेज़ लगी।
"और जब ऊपर आता है?" मैंने पूछा।
"जब ऊपर आता है," बंसीलाल ने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी हो गई, "तो उसके कपड़ों से जले काग़ज़ की गंध आती है।"
मैंने अपनी घुटने पर रखा हाथ कस लिया।
"जले काग़ज़ की?"
"हाँ," बंसीलाल ने कहा। "मैं जानता हूँ वो गंध। हमारे यहाँ गाँव में… पुराने ज़माने में काग़ज़ कोयले के चूल्हे पर सुखाते थे। वो गंध कभी नहीं भूलती। एक बार मैं उसके जूतों पर भी देखा था — काली राख की पतली लकीरें थीं, जैसे किसी ने जूते से राख कुचल दी हो।"
मैंने धीरे से साँस ली। घंटी जेब में सरकी, बस सरकी — बजी नहीं।
"फाइल में क्या होता है?" मैंने पूछा।
बंसीलाल ने सिर हिलाया — दुखी ढंग से, जैसे अफ़सोस हो कि ये सवाल जवाब नहीं जानता।
"कभी देखा नहीं," उन्होंने कहा। "एक बार बस दूर से झलक मिली थी। पीले काग़ज़, कुछ लाल स्याही, और… और ऊपर जो पहला काग़ज़ था, उस पर कुछ लिखा था, पर पढ़ नहीं सका। पर जब वो उसे लेकर जाता है, तो वो पीली फाइल जैसी नहीं लगती। वो जैसे लाल लगती है। मुझे नहीं पता कैसे, पर उस फाइल को देखकर लगता है कि उसका रंग बदल गया है। जैसे उसने ख़ून लिया हो।"
फाटक पर टिंकू खड़ा था, और मैंने उसकी तरफ़ देखा — वो बिलकुल ठंडा नहीं लग रहा था। बच्चा है, अभी तेरह साल का, उसके हाथ से टॉर्च फिसलने को थी।
मैंने नज़र फिर बंसीलाल पर की।
"और चाबी?" मैंने कहा। "मैंने सुबह वो चाबी ली है। वो क्या है?"
बंसीलाल ने अपनी जेब में हाथ डाला। धीरे से, ऐसे जैसे कोई जानवर को काबू में ले रहा हो। फिर उन्होंने एक और काली चाबी निकाली — लोहे की, छोटी, घिसे हुए दाँते, और छल्ले पर लाल धागा।
"ये," उन्होंने कहा, और चाबी उनकी हथेली पर रख दी, "ये असली वाले कमरे की चाबी नहीं है। ये उस कमरे की बगल में, दीवार के अंदर छिपाई गई एक लकड़ी की अलमारी की है। बत्तीस साल पहले जब ये कमरा सील हुआ था, तब एक बूढ़ा चौकीदार यहाँ था — बिस्मिल्लाह खान, अल्लाह उसे जन्नत दे। उसने ये मुझे दी थी और कहा था — ये वो कमरा नहीं खोलेगी, ये उस काग़ज़ की तरफ़ ले जाएगी जो उस कमरे से पहले है।"
मैंने हाथ बढ़ाया, और उन्होंने चाबी रख दी।
जैसे ही मेरी उँगलियों पर चाबी आई, जेब में घंटी एक बार हल्की सी काँपी।
"कौन सा काग़ज़?" मैंने कहा।
"मुझे नहीं पता," बंसीलाल ने कहा। "बिस्मिल्लाह ने बस यही कहा था — जब वक़्त आए, इस अलमारी में वो काग़ज़ मिलेगा जो सबको साफ़ कर देगा। और सबका मतलब उसने बाद में समझाया था — मेरा, तुम्हारा, ऊपर वाले साहब का, और उस आदमी का भी जो अब दिन में सीढ़ी पर नहीं दिखता।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno