The Mysterious Bell591 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 591

7 min read November 5, 2026

पीली पीतल, पुरानी, घिसी, छोटे छल्ले पर लाल धागा बँधा हुआ। सीढ़ी के पत्थर पर एकदम सीधी रखी, जैसे किसी ने जान-बूझकर रखी हो।

बंसीलाल नहीं थे। चारों तरफ़ सिर्फ़ अंधेरा था, और उस अंधेरे में फाटक की तरफ़ जाती हवा की एक पतली सरसराहट।

मेरी छाती धड़कने लगी।

"बंसीलाल भाई!" मैंने ज़ोर से पुकारा।

कोई जवाब नहीं।

"बंसीलाल भाई!"

सिर्फ़ हवा।

मीरा ने टॉर्च घुमाई — सीढ़ी के नीचे, ऊपर, बगल के गलियारे में। कहीं कोई परछाईं नहीं। कोई पैर का निशान नहीं। जैसे कोई कभी वहाँ था ही नहीं।

मैंने धीरे से सीटी उठाई।

वो ठंडी थी। और उस पर वही पुरानी धूल थी — जो सीढ़ी के पत्थर पर बरसों से जमी थी। मतलब वो सीटी वहाँ बहुत देर से नहीं रखी गई थी। या तो वो बंसीलाल के हाथ से गिरी थी, या फिर…

"भैया," टिंकू ने धीरे से कहा। "पीछे।"

मैंने मुड़कर देखा।

और मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

सीटी — मेरे हाथ में थी। मैं उसे पकड़े हुए था। और वो…

बज रही थी।

अपने आप। न मेरे फूँकने से, न हिलने से। बस एक पतली, लंबी सीटी — जैसे दूर किसी पहाड़ी पर कोई रेलगाड़ी सीटी दे रही हो।

मैंने सीटी को नीचे किया।

सीटी बंद हो गई।

मैंने फिर ऊपर उठाया।

फिर बजी।

"अंकुश," मीरा ने धीरे से कहा। "ये सीटी—"

"मुझे पता है," मैंने कहा। "ये मेरे हाथ से बज रही है। पर मैं फूँक नहीं रहा।"

"फिर कौन फूँक रहा है?"

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।

घंटी अब और गरम थी। इतनी गरम कि मुझे लगा कि कपड़ा जल जाएगा।

"घंटी," मैंने धीरे से कहा। "कह क्या रही है?"

घंटी ने फुसफुसाया — इतना धीमे कि मुझे लगा शायद सिर्फ़ मैंने ही सुना।

"जो सीटी बजा रहा है," घंटी ने कहा, "वो सीढ़ी पर नहीं है।"

मैंने गला सूखता महसूस किया।

"तो कहाँ है?"

घंटी रुकी।

फिर बोली, इतने ठंडे स्वर में कि लगा खुद भी डर गई हो —

"दीवार के पीछे।"

मैंने पीछे देखा — वो दीवार, जिस पर वो चौकोर निशान था। जिसके पीछे से तीन खटखटाहटें आई थीं।

और उसी वक़्त, सीटी फिर बजी — इस बार सिर्फ़ एक झटका। फिर दो। फिर तीन। तीन लंबी सीटियाँ, जैसे कोई अंदर से मदद माँग रहा हो। या जैसे कोई अंदर से कह रहा हो कि अभी मैं यहाँ हूँ, और तुम अभी बाहर।

टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा।

"भैया," उसने धीरे से कहा। "मुझे घर जाना है।"

मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। मेरा हाथ भी काँप रहा था। पर मैंने मुस्कुराकर कहा —

"टिंकू, एक बात याद रख।"

"क्या?"

"अगर यहाँ कोई मदद माँग रहा है, तो मतलब वो हमारा दुश्मन नहीं है। दुश्मन मदद नहीं माँगता। दुश्मन सिर्फ़ चुप रहकर गोली चलाता है।"

सीटी फिर बजी — इस बार बहुत धीमी। जैसे थक गई हो।

और फिर, सीढ़ी के नीचे के अंधेरे में, मुझे कुछ सुनाई दिया। कोई धीरे-धीरे रेंग रहा था। किसी के शरीर का भार पत्थर पर सरक रहा था। धीरे। बहुत धीरे। जैसे कोई घायल हो, पर जान छोड़ने को राज़ी न हो।

मीरा ने टॉर्च उस आवाज़ की तरफ़ घुमाई।

और बंसीलाल की आवाज़ आई — हाँफ़ती, टूटी, पर ज़िंदा —

"अंकुश… यहाँ मत आना। वो सीटी मेरी नहीं है। मेरी सीटी तुम्हारे हाथ में है।"

और उसी पल, मेरे हाथ में जो सीटी थी, उसने एक और सीटी दी — लंबी, पतली, और इस बार…

इस बार उसमें से एक आवाज़ निकली।

बहुत दूर से। धीमी। पर इतनी साफ़ कि मैंने उसे पहचान लिया।

वो आवाज़ पापा की थी।

और पापा कह रहे थे —

"बेटा, वो सीटी फेंक दे। वो मेरी नहीं है। वो तेरी माँ की है।"

॥

सीटी मेरे हाथ में ठंडी हो गई।

पापा की आवाज़ गई, और उसके साथ वो लंबी पतली सीटी भी चली गई, जैसे किसी ने दूर जाकर दरवाज़ा बंद कर दिया हो।

मैं सीढ़ी पर खड़ा रह गया। हाथ में पीतल का वो छोटा टुकड़ा, जो अभी तक मेरे हाथ में बज रहा था, अब चुप था। बिल्कुल चुप। जैसे कभी बजा ही न हो।

"भैया," टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची। "नीचे कोई है।"

मैंने कान लगाया।

हाँ। कोई था। कोई रेंग रहा था। किसी के घुटने पत्थर पर सरक रहे थे। धीरे। बहुत धीरे। जैसे कोई घायल जानवर हो, जिसे पता हो कि अगर वो रुका, तो मर जाएगा।

"बंसीलाल चाचा," मैंने नीचे की तरफ़ आवाज़ दी। "आप हैं?"

रेंगने की आवाज़ रुकी।

फिर बंसीलाल की आवाज़ आई — हाँफ़ती हुई, टूटी हुई, पर ज़िंदा।

"अंकुश… यहाँ मत आना।"

"क्यों?"

"क्योंकि जो नीचे है, वो मेरी सीटी से बोल रहा है। और जो मेरी सीटी से बोलता है, वो मेरी आवाज़ नहीं है।"

मीरा ने टॉर्च नीचे की तरफ़ की। रोशनी सीढ़ियों पर फिसलती हुई नीचे गई, और फिर मैंने देखा — सीढ़ी के नीचे, आख़िरी पत्थर पर, एक हाथ था। सिर्फ़ हाथ। झुर्रियों वाला, काँपता हुआ हाथ, जिसकी उँगलियाँ ज़मीन को पकड़े हुए थीं, जैसे ज़मीन ही उसका आख़िरी सहारा हो।

"चाचा, अपना हाथ ऊपर करो," मैंने कहा।

"नहीं।"

"चाचा —"

"नहीं, अंकुश। मैं ऊपर नहीं आऊँगा। मैं ऊपर आया तो वो मेरी नौकरी ले लेगा। और नौकरी गई तो बेटी की शादी किससे करूँगा?"

मैंने एक गहरी साँस ली।

इमरान मेरे पीछे बैठा था, सीढ़ी के कोने पर, दोनों हाथ गोद में रखे। उसकी आँखें खुली थीं, पर कुछ देख नहीं रही थीं। मीरा ने उसे पानी पिलाया था, और उसने पिया था, और फिर वो वापस वहीं बैठ गया था, जैसे बैठना उसने कहीं से सीखा हो।

"इमरान," मैंने धीरे से कहा। "तुम ठीक हो?"

उसने मेरी तरफ़ देखा।

फिर उसने वो कहा जो मुझे आज तक नींद नहीं लेने देगा।

"अंकुश भाई… अंदर एक आदमी था। वो मुझसे पूछ रहा था — तेरा नाम क्या है। मैंने कहा, इमरान। उसने कहा, पूरा नाम। मैंने कहा, इमरान हबीब अली।"

वो रुका।

"और फिर… फिर मुझे अपना नाम याद नहीं आया।"

टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

"मैं अपना नाम भूल गया था, अंकुश भाई," इमरान ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो बच्चों की आँखों में होता है, बड़ों के शब्दों में नहीं। "मैं वहाँ बैठा था और सोच रहा था — मैं कौन हूँ। मुझे सिर्फ़ इतना याद था कि मेरे बाप का एक आँगन है और उस आँगन में एक सूखा हैंडपंप है।"

मीरा ने अपना दुपट्टा उतारकर उसके कंधों पर रख दिया। इमरान ने उसे पकड़ लिया, जैसे ठंड लगी हो। पर उस शाम गली में गर्मी थी।

"चलो, ऊपर चलते हैं," मैंने कहा।

हम ऊपर आए। बंसीलाल नीचे से नहीं आए। मैंने कई बार आवाज़ दी। आख़िरी बार सिर्फ़ इतना सुनाई दिया — "मैं अपने आप आ जाऊँगा। तुम अपना काम देखो।" और फिर सीढ़ी के नीचे सन्नाटा।

ऊपर बरामदे में हमने इमरान को बंसीलाल की चारपाई पर बिठाया। वो बैठा, और फिर वो धीरे से कहने लगा — "काला। काला। काला।" एक ही शब्द, बार-बार, जैसे कोई पुराना रेडियो एक ही स्टेशन पर अटक गया हो।

मीरा मेरे पास आई।

"इसे घर भेजना पड़ेगा," उसने कहा।

"मैं खुद छोड़कर आता हूँ," मैंने कहा। "तू यहीं रुक, मैं बंसीलाल चाचा को भी देख लेता हूँ।"

मैंने मुड़कर देखा।

चारपाई खाली थी।

इमरान का पीला हेलमेट चारपाई पर पड़ा था, और चारपाई के पास की ज़मीन पर पानी गिरा था, जैसे कोई जल्दी में उठकर भागा हो।

टिंकू दौड़कर फाटक तक गया, फिर लौटा, हाँफता हुआ।

"भैया, बाहर कोई नहीं।"

मैंने आसमान की तरफ़ देखा। रात खत्म हो रही थी। पूरब में वो मैली सी लकीर आ रही थी जो हमारी गली में सुबह कहलाती है।

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